अल-अनफाल · 70/75
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अनफाल
يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّمَن فِي أَيْدِيكُم مِّنَ الْأَسْرَىٰ إِن يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِّمَّا أُخِذَ مِنكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ۝٧٠
Yaaa aiyuhan Nabiyyu qul liman feee aideekum minal asraaa iny-ya lamillaahu fee quloobikum khairany yu`tikum khayram mimmaaa ukhiza minkum wa yaghfir lakum; wallaahu Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
ऐ रसूल जो कैदी तुम्हारे कब्जे में है उनसे कह दो कि अगर तुम्हारे दिलों में नेकी देखेगा तो जो (माल) तुम से छीन लिया गया है उससे कहीं बेहतर तुम्हें अता फरमाएगा और तुम्हें बख्श भी देगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अल-अस्रा: बंदी, क़ैदी।
  • ख़ैर: भलाई, नेकी, ईमान और सच्ची नीयत।
  • यु'तिकुम: वह तुम्हें देगा।
  • उख़िज़ा मिन्कुम: जो (फ़िदया/मुआवज़ा) तुमसे लिया गया।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उन बंदियों से कहें जो बद्र के मैदान में पकड़े गए और जिनसे फ़िदया (मुआवज़ा) लिया गया: "यदि अल्लाह तुम्हारे दिलों में भलाई और सच्ची नीयत (ईमान और सदाशयता) जान लेता है, तो वह तुम्हें उस धन से कहीं बेहतर चीज़ देगा जो तुमसे लिया गया है। वह तुम्हें अपने फ़ज़ल (कृपा) से दुनिया में भी अच्छा बदला देगा और आख़िरत में भी बड़ा इनाम अता करेगा। साथ ही, वह तुम्हारे पिछले गुनाहों को माफ़ कर देगा।"

यह वादा अल्लाह ने पूरा किया — जिन बंदियों ने सच्चे दिल से इस्लाम क़बूल किया, जैसे अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी, अल्लाह ने उन्हें फ़िदया से कहीं बेहतर दुनिया और आख़िरत का माल अता किया। अल्लाह बहुत क्षमाशील है, अपने बंदों पर बड़ी दया करने वाला है। वह उन लोगों के गुनाह माफ़ कर देता है जो तौबा करके उसकी ओर लौटते हैं, और उन पर अपनी रहमत की बारिश करता है।

फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह की रहमत और क्षमा का द्वार हमेशा खुला है — चाहे इंसान कितना ही बड़ा गुनाहगार क्यों न हो, सच्ची तौबा और नेक नीयत से वह अल्लाह की माफ़ी और बेहतर इनाम का हक़दार बन सकता है।
  2. मुसीबत और नुक़सान के वक़्त निराश नहीं होना चाहिए; अल्लाह अपने बंदों को खोए हुए से बेहतर चीज़ देने की ताक़त रखता है, बशर्ते दिल में सच्चाई और भलाई हो।
  3. यह आयत सिखाती है कि दुश्मनों के साथ भी इंसाफ़ और रहमत का बरताव करना चाहिए, और उन्हें भलाई की तरफ़ बुलाना चाहिए — क्योंकि हिदायत अल्लाह के हाथ में है और वह किसी को भी बदल सकता है।
  4. अल्लाह का वादा सच्चा है — जो लोग ईमान लाते हैं और नेक काम करते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतरीन बदला देता है, और उनकी ग़लतियों को माफ़ कर देता है।


📜 आयत 68-72 — सूरा अल-अनफाल

68لَّوْلَا كِتَابٌ مِّنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और अगर ख़ुदा की तरफ से पहले ही (उसकी) माफी का हुक्म आ चुका होता तो तुमने जो (बदर के क़ैदियों के छोड़ देने के बदले) फिदिया लिया था
69فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِّبًا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
उसकी सज़ा में तुम पर बड़ा अज़ाब नाज़िल होकर रहता तो (ख़ैर जो हुआ सो हुआ) अब तुमने जो माल ग़नीमत हासिल किया है उसे खाओ (और तुम्हारे लिए) हलाल तय्यब है और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
70يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّمَن فِي أَيْدِيكُم مِّنَ الْأَسْرَىٰ إِن يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِّمَّا أُخِذَ مِنكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
ऐ रसूल जो कैदी तुम्हारे कब्जे में है उनसे कह दो कि अगर तुम्हारे दिलों में नेकी देखेगा तो जो (माल) तुम से छीन लिया गया है उससे कहीं बेहतर तुम्हें अता फरमाएगा और तुम्हें बख्श भी देगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
71وَإِن يُرِيدُوا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللَّهَ مِن قَبْلُ فَأَمْكَنَ مِنْهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफकार हिकमत वाला है
72إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوا وَّنَصَرُوا أُولَٰئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُم مِّن وَلَايَتِهِم مِّن شَيْءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُوا ۚ وَإِنِ اسْتَنصَرُوكُمْ فِي الدِّينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ إِلَّا عَلَىٰ قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَاقٌ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से ख़ुदा की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को जगह दी और हर (तरह) उनकी ख़बर गीरी (मदद) की यही लोग एक दूसरे के (बाहम) सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख्तियार करें और (हॉ) मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख्वाहॉ हो तो तुम पर (उनकी मदद करना लाज़िम व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में (नहीं) जिनमें और तुममें बाहम (सुलह का) एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा (सबको) देख रहा है
अल-अनफालकुरान सूची
75आयत
मदनीअवतरण स्थान
70आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 70

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Wednesday, September 30, 2026

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