Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- نَكَثُوا: तोड़ दिया, भंग कर दिया।
- أَيْمَانَهُمْ: अपनी क़समों को, अपने वचनों और अनुबंधों को।
- هَمُّوا: उन्होंने इरादा किया, ठान लिया।
- بِإِخْرَاجِ الرَّسُولِ: रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को (मक्का से) निकालने का।
- بَدَءُوكُمْ: उन्होंने तुम्हारे विरुद्ध (युद्ध/आक्रमण) की शुरुआत की।
- أَوَّلَ مَرَّةٍ: पहली बार, सबसे पहले।
- أَتَخْشَوْنَهُمْ: क्या तुम उनसे डरते हो?
- أَحَقُّ: अधिक हक़दार, सबसे योग्य।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने ईमानवाले बंदों से पूछता है कि आख़िर तुम उन लोगों से युद्ध क्यों नहीं करते, जिन्होंने अपनी क़समों और वचनों को तोड़ दिया? ये वही लोग हैं जिन्होंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मक्का से निकालने की साज़िश रची थी, जब वे दारुन्नदवा में इकट्ठा हुए थे। और ये वही लोग हैं जिन्होंने सबसे पहले तुम्हारे विरुद्ध युद्ध की शुरुआत की — चाहे वह बद्र के दिन हो या उस समय जब उन्होंने रसूल के सहयोगी क़बीले ख़ुज़ाआ के विरुद्ध अपने सहयोगी क़बीले बक्र की मदद की थी।
फिर अल्लाह तआला उन्हें डाँटते हुए फ़रमाता है: क्या तुम इन लोगों से डरते हो? क्या तुम इनसे मिलने और इनका मुक़ाबला करने से घबराते हो? जबकि सच्चाई यह है कि अल्लाह ही सबसे अधिक हक़दार है कि उससे डरा जाए, उसका ख़ौफ़ दिल में रखा जाए, और उसी के आदेश का पालन किया जाए। अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो तुम्हें अल्लाह का डर इन मुशरिकों के डर पर हावी होना चाहिए। अल्लाह का डर ही तुम्हें उसके दुश्मनों से लड़ने की हिम्मत देगा, क्योंकि अल्लाह ही तुम्हारा सहायक और रक्षक है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- वचन-भंग करने वालों से निपटने का आदेश: इस आयत से सीख मिलती है कि जो लोग अपने अनुबंधों और वचनों को तोड़ते हैं, उनके विरुद्ध सख़्ती से पेश आना चाहिए। इस्लाम में वचन-पालन की अत्यधिक महत्ता है, और वचन-भंग करने वालों पर अल्लाह की ओर से युद्ध की घोषणा है।
- अल्लाह का डर ही सबसे बड़ा डर है: मोमिन का दिल अल्लाह के ख़ौफ़ से भरा होता है। जब अल्लाह का डर दिल में होता है, तो दुनिया के किसी भी इंसान या ताक़त का डर ख़त्म हो जाता है। यही वह चीज़ है जो मुसलमान को बहादुर और निडर बनाती है।
- ईमान का तक़ाज़ा है अल्लाह के दुश्मनों से लड़ना: यह आयत साफ़ करती है कि सच्चे ईमान का मतलब सिर्फ़ ज़ुबान से कलमा पढ़ लेना नहीं, बल्कि अल्लाह के दुश्मनों के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होना भी है। जो ईमानवाला अल्लाह के दुश्मनों से डरकर पीछे हट जाए, उसका ईमान अधूरा है।
- अल्लाह की मदद का भरोसा: जब मुसलमान अल्लाह के आदेश पर अमल करता है और उसी से डरता है, तो अल्लाह उसकी मदद करता है। यह आयत मुसलमानों को यह भरोसा दिलाती है कि अल्लाह की मदद उनके साथ है, चाहे दुश्मन कितने भी ताक़तवर क्यों न हों।
📜 आयत 11-15 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 13
सूरा अत-तौबा आयत 13 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (मुसलमानों) भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने…सूरा आयत 13/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 11–15. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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