अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يَلْمِزُكَ: तुम्हें बुरा भला कहता है, तुम पर आक्षेप लगाता है, तुम्हारी निंदा करता है।
- الصَّدَقَاتِ: ज़कात और दान के धन, जो मुसलमानों से इकट्ठा होकर बाँटे जाते हैं।
- يَسْخَطُونَ: क्रोधित होते हैं, नाराज़ होते हैं, अप्रसन्नता ज़ाहिर करते हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के एक और बुरे चरित्र से अवगत करा रहा है। ये मुनाफ़िक़ लोग ज़कात और सदक़ों के धन को बाँटने के मामले में आप ﷺ पर आक्षेप लगाते थे और आपकी निंदा करते थे। उनका यह आक्षेप इस बात पर निर्भर था कि उन्हें उस धन में से हिस्सा मिलता है या नहीं।
अगर आप उन्हें उस माल में से कुछ दे देते, तो वे खुश हो जाते और आपसे राज़ी रहते, आपकी तारीफ़ करते। लेकिन अगर उन्हें उसमें से कुछ नहीं मिलता, तो वे तुरंत नाराज़ हो जाते, आप पर बुरा भला कहते और आपके फैसले पर एतराज़ करते। यह उनके दिल की बीमारी और उनके ईमान की कमज़ोरी को दर्शाता है, क्योंकि उनका दीन दुनिया के माल से जुड़ा हुआ था, अल्लाह की रज़ा से नहीं।
अल्लाह तआला ने इस आयत में उनकी इस हालत को बयान करके अपने नबी ﷺ को तसल्ली दी है कि ये लोग आपकी नीयत या आपके फैसले की वजह से नाराज़ नहीं होते, बल्कि उनकी अपनी दुनियापरस्ती और लालच की वजह से होते हैं। असल में अल्लाह ही है जो ज़कात के धन को बाँटने का हुक्म देता है, और नबी ﷺ अल्लाह के हुक्म के मुताबिक ही बाँटते हैं।
फ़ायदे (सबक़):
- इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इंसान को अपने दिल को दुनिया के माल से पाक रखना चाहिए और अल्लाह की रज़ा को सबसे बड़ा मक़सद बनाना चाहिए। जो लोग दुनिया के लिए दीन को अपनाते हैं, वे कभी सच्चे मुसलमान नहीं बन सकते।
- अल्लाह के नबी ﷺ की हर बात और हर फैसला अल्लाह की तरफ से होता था, इसलिए उन पर आक्षेप लगाना वास्तव में अल्लाह के हुक्म पर एतराज़ करना है। यह एक बहुत बड़ा गुनाह है।
- मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि उनका रवैया अपने नफ़े और नुक़सान के हिसाब से बदलता रहता है। सच्चा मुसलमान वही है जो अल्लाह की रज़ा के लिए खुशी और नाराज़ी दोनों में एक जैसा रहे।
- ज़कात और सदक़ात की तक़सीम अल्लाह के हुक्म के मुताबिक होनी चाहिए, न कि लोगों की ख़्वाहिशों के मुताबिक। नबी ﷺ ने इस मामले में किसी की परवाह नहीं की और अल्लाह के हुक्म पर अमल किया।
- यह आयत हमें सिखाती है कि अगर कोई इंसान हमारे फैसले से नाराज़ होता है, तो हमें अपने फैसले की सच्चाई पर क़ायम रहना चाहिए, बशर्ते वह अल्लाह के हुक्म के मुताबिक हो, और लोगों की नाराज़ी की परवाह नहीं करनी चाहिए।
📜 आयत 56-60 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 58
सूरा अत-तौबा आयत 58 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो…सूरा आयत 58/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 56–60. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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