अत-तौबा · 58/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
وَمِنْهُم مَّن يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ فَإِنْ أُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَإِن لَّمْ يُعْطَوْا مِنْهَا إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ ۝٥٨
Wa minhum mai yalmizuka fis sadaqaati fa-in u`too minhaa radoo wa illam yu`taw minhaaa izaa hum yaskhatoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात (की तक़सीम) में (ख्वाह मा ख्वाह) इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ (माक़ूल मिक़दार(हिस्सा)) दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उनकी मर्ज़ी के मुवाफिक़ उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَلْمِزُكَ: तुम्हें बुरा भला कहता है, तुम पर आक्षेप लगाता है, तुम्हारी निंदा करता है।
  • الصَّدَقَاتِ: ज़कात और दान के धन, जो मुसलमानों से इकट्ठा होकर बाँटे जाते हैं।
  • يَسْخَطُونَ: क्रोधित होते हैं, नाराज़ होते हैं, अप्रसन्नता ज़ाहिर करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के एक और बुरे चरित्र से अवगत करा रहा है। ये मुनाफ़िक़ लोग ज़कात और सदक़ों के धन को बाँटने के मामले में आप ﷺ पर आक्षेप लगाते थे और आपकी निंदा करते थे। उनका यह आक्षेप इस बात पर निर्भर था कि उन्हें उस धन में से हिस्सा मिलता है या नहीं।

अगर आप उन्हें उस माल में से कुछ दे देते, तो वे खुश हो जाते और आपसे राज़ी रहते, आपकी तारीफ़ करते। लेकिन अगर उन्हें उसमें से कुछ नहीं मिलता, तो वे तुरंत नाराज़ हो जाते, आप पर बुरा भला कहते और आपके फैसले पर एतराज़ करते। यह उनके दिल की बीमारी और उनके ईमान की कमज़ोरी को दर्शाता है, क्योंकि उनका दीन दुनिया के माल से जुड़ा हुआ था, अल्लाह की रज़ा से नहीं।

अल्लाह तआला ने इस आयत में उनकी इस हालत को बयान करके अपने नबी ﷺ को तसल्ली दी है कि ये लोग आपकी नीयत या आपके फैसले की वजह से नाराज़ नहीं होते, बल्कि उनकी अपनी दुनियापरस्ती और लालच की वजह से होते हैं। असल में अल्लाह ही है जो ज़कात के धन को बाँटने का हुक्म देता है, और नबी ﷺ अल्लाह के हुक्म के मुताबिक ही बाँटते हैं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इंसान को अपने दिल को दुनिया के माल से पाक रखना चाहिए और अल्लाह की रज़ा को सबसे बड़ा मक़सद बनाना चाहिए। जो लोग दुनिया के लिए दीन को अपनाते हैं, वे कभी सच्चे मुसलमान नहीं बन सकते।
  2. अल्लाह के नबी ﷺ की हर बात और हर फैसला अल्लाह की तरफ से होता था, इसलिए उन पर आक्षेप लगाना वास्तव में अल्लाह के हुक्म पर एतराज़ करना है। यह एक बहुत बड़ा गुनाह है।
  3. मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि उनका रवैया अपने नफ़े और नुक़सान के हिसाब से बदलता रहता है। सच्चा मुसलमान वही है जो अल्लाह की रज़ा के लिए खुशी और नाराज़ी दोनों में एक जैसा रहे।
  4. ज़कात और सदक़ात की तक़सीम अल्लाह के हुक्म के मुताबिक होनी चाहिए, न कि लोगों की ख़्वाहिशों के मुताबिक। नबी ﷺ ने इस मामले में किसी की परवाह नहीं की और अल्लाह के हुक्म पर अमल किया।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि अगर कोई इंसान हमारे फैसले से नाराज़ होता है, तो हमें अपने फैसले की सच्चाई पर क़ायम रहना चाहिए, बशर्ते वह अल्लाह के हुक्म के मुताबिक हो, और लोगों की नाराज़ी की परवाह नहीं करनी चाहिए।


📜 आयत 56-60 — सूरा अत-तौबा

56وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ
और (मुसलमानों) ये लोग ख़ुदा की क़सम खाएंगे फिर वह तुममें ही के हैं हालॉकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं
57لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَأً أَوْ مَغَارَاتٍ أَوْ مُدَّخَلًا لَّوَلَّوْا إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ
कि गर कहीं ये लोग पनाह की जगह (क़िले) या (छिपने के लिए) ग़ार या घुस बैठने की कोई (और) जगह पा जाए तो उसी तरफ रस्सियाँ तोड़ाते हुए भाग जाएँ
58وَمِنْهُم مَّن يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ فَإِنْ أُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَإِن لَّمْ يُعْطَوْا مِنْهَا إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ
(ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात (की तक़सीम) में (ख्वाह मा ख्वाह) इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ (माक़ूल मिक़दार(हिस्सा)) दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उनकी मर्ज़ी के मुवाफिक़ उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
59وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا مَا آتَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللَّهُ سَيُؤْتِينَا اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَرَسُولُهُ إِنَّا إِلَى اللَّهِ رَاغِبُونَ
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
60۞ إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۖ فَرِيضَةً مِّنَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
(तो उनका क्या कहना था) ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला है
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
58आयत

अनुवाद — अत-तौबा 58

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Wednesday, September 30, 2026

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