Wa law annahum radoo maaa aataahumul laahu wa Rasooluhoo wa qaaloo hasbunal laahu wayu`teenallaahu min fadlihee wa Rasooluhooo innaaa ilallaahi raaghiboon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور اگر وہ اس پر خوش رہتے جو خدا اور اس کے رسول نے ان کو دیا تھا۔ اور کہتے کہ ہمیں خدا کافی ہے اور خدا اپنے فضل سے اور اس کے پیغمبر (اپنی مہربانی سے) ہمیں (پھر) دیں گے۔ اور ہمیں تو خدا ہی کی خواہش ہے (تو ان کے حق میں بہتر ہوتا)
رَاغِبُونَ: चाहने वाले, लालच रखने वाले (अल्लाह की ओर झुकने वाले)।
آتَاهُمُ: जो उन्हें दिया।
مِن فَضْلِهِ: अपनी कृपा और उदारता से।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों (मुनाफ़िक़ों) के बारे में है जो नबी ﷺ पर सदक़ा और ग़नीमत (माल) के बंटवारे में आपत्ति जताते थे और आप पर इल्ज़ाम लगाते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है: काश! ये लोग उस चीज़ पर राज़ी हो जाते जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने उन्हें दी होती, और ये कहते कि "हमारे लिए अल्लाह ही काफ़ी है। अल्लाह हमें अपनी कृपा से और देगा और उसका रसूल भी हमें देगा। हम तो अल्लाह ही की ओर रग़बत रखते हैं (यानी हम उसी से उम्मीद रखते हैं कि वह हमें अपनी बड़ी कृपा से नवाज़ेगा)।"
अगर ये लोग ऐसा कहते और इस तरह की नीयत रखते, तो यही उनके लिए बेहतर और ज़्यादा फ़ायदेमंद होता — दुनिया में भी और आख़िरत में भी। लेकिन उन्होंने शिकायत और एतराज़ का रास्ता चुना, जो उनके नुक़्सान का सबब बना।
इस आयत में "लौ" (काश/अगर) का जवाब महज़ूफ़ (हटा दिया गया) है, जिसका तक़दीर (अनुमानित अर्थ) है: "तो यह उनके लिए बेहतर होता।" यानी अगर वे राज़ी हो जाते और अल्लाह पर भरोसा करते, तो यही उनके हक़ में अच्छा था।
फ़ायदे (सीख):
अल्लाह पर भरोसा और क़नाअत (संतोष): मुसलमान को चाहिए कि जो कुछ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तरफ़ से मिले, उस पर राज़ी रहे। अल्लाह ही काफ़ी है — यही सबसे बड़ी तसल्ली का ज़रिया है।
शिकायत और एतराज़ से बचना: नबी ﷺ की तक़सीम (बंटवारे) पर एतराज़ करना मुनाफ़िक़ों की आदत थी। मोमिन की शान यह है कि वह अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले पर राज़ी रहे।
अल्लाह की कृपा से उम्मीद: जो शख्स अल्लाह से उम्मीद रखता है और उसी की तरफ़ रग़बत रखता है, अल्लाह उसे अपनी कृपा से नवाज़ता है। दुनिया के माल के पीछे भागने के बजाय अल्लाह की तरफ़ झुकना ही असली कामयाबी है।
इस्लाम में आदाब (शिष्टाचार): इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि किसी भी मामले में अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले को दिल से क़बूल करना चाहिए। यही ईमान की निशानी है।
दरियादिली की तरग़ीब: अल्लाह अपने बंदों को सिखाता है कि वे उसकी कृपा से उम्मीद रखें, न कि लोगों के माल से। यह दिल को पाक करता है और समाज में मोहब्बत पैदा करता है।
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
(ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात (की तक़सीम) में (ख्वाह मा ख्वाह) इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ (माक़ूल मिक़दार(हिस्सा)) दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उनकी मर्ज़ी के मुवाफिक़ उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
(तो उनका क्या कहना था) ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला है
और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (हमारे) रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही (कान) हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई सुन्ने के कान हैं कि ख़ुदा पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन की (बातों) का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले ख़ुदा को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।