अत-तौबा · 59/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا مَا آتَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللَّهُ سَيُؤْتِينَا اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَرَسُولُهُ إِنَّا إِلَى اللَّهِ رَاغِبُونَ ۝٥٩
Wa law annahum radoo maaa aataahumul laahu wa Rasooluhoo wa qaaloo hasbunal laahu wayu`teenallaahu min fadlihee wa Rasooluhooo innaaa ilallaahi raaghiboon
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • حَسْبُنَا اللهُ: हमारे लिए अल्लाह ही काफ़ी है।
  • رَاغِبُونَ: चाहने वाले, लालच रखने वाले (अल्लाह की ओर झुकने वाले)।
  • آتَاهُمُ: जो उन्हें दिया।
  • مِن فَضْلِهِ: अपनी कृपा और उदारता से।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों (मुनाफ़िक़ों) के बारे में है जो नबी ﷺ पर सदक़ा और ग़नीमत (माल) के बंटवारे में आपत्ति जताते थे और आप पर इल्ज़ाम लगाते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है: काश! ये लोग उस चीज़ पर राज़ी हो जाते जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने उन्हें दी होती, और ये कहते कि "हमारे लिए अल्लाह ही काफ़ी है। अल्लाह हमें अपनी कृपा से और देगा और उसका रसूल भी हमें देगा। हम तो अल्लाह ही की ओर रग़बत रखते हैं (यानी हम उसी से उम्मीद रखते हैं कि वह हमें अपनी बड़ी कृपा से नवाज़ेगा)।"

अगर ये लोग ऐसा कहते और इस तरह की नीयत रखते, तो यही उनके लिए बेहतर और ज़्यादा फ़ायदेमंद होता — दुनिया में भी और आख़िरत में भी। लेकिन उन्होंने शिकायत और एतराज़ का रास्ता चुना, जो उनके नुक़्सान का सबब बना।

इस आयत में "लौ" (काश/अगर) का जवाब महज़ूफ़ (हटा दिया गया) है, जिसका तक़दीर (अनुमानित अर्थ) है: "तो यह उनके लिए बेहतर होता।" यानी अगर वे राज़ी हो जाते और अल्लाह पर भरोसा करते, तो यही उनके हक़ में अच्छा था।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह पर भरोसा और क़नाअत (संतोष): मुसलमान को चाहिए कि जो कुछ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तरफ़ से मिले, उस पर राज़ी रहे। अल्लाह ही काफ़ी है — यही सबसे बड़ी तसल्ली का ज़रिया है।
  2. शिकायत और एतराज़ से बचना: नबी ﷺ की तक़सीम (बंटवारे) पर एतराज़ करना मुनाफ़िक़ों की आदत थी। मोमिन की शान यह है कि वह अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले पर राज़ी रहे।
  3. अल्लाह की कृपा से उम्मीद: जो शख्स अल्लाह से उम्मीद रखता है और उसी की तरफ़ रग़बत रखता है, अल्लाह उसे अपनी कृपा से नवाज़ता है। दुनिया के माल के पीछे भागने के बजाय अल्लाह की तरफ़ झुकना ही असली कामयाबी है।
  4. इस्लाम में आदाब (शिष्टाचार): इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि किसी भी मामले में अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले को दिल से क़बूल करना चाहिए। यही ईमान की निशानी है।
  5. दरियादिली की तरग़ीब: अल्लाह अपने बंदों को सिखाता है कि वे उसकी कृपा से उम्मीद रखें, न कि लोगों के माल से। यह दिल को पाक करता है और समाज में मोहब्बत पैदा करता है।


📜 आयत 57-61 — अत-तौबा

57لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَأً أَوْ مَغَارَاتٍ أَوْ مُدَّخَلًا لَّوَلَّوْا إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ
कि गर कहीं ये लोग पनाह की जगह (क़िले) या (छिपने के लिए) ग़ार या घुस बैठने की कोई (और) जगह पा जाए तो उसी तरफ रस्सियाँ तोड़ाते हुए भाग जाएँ
58وَمِنْهُم مَّن يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ فَإِنْ أُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَإِن لَّمْ يُعْطَوْا مِنْهَا إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ
(ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात (की तक़सीम) में (ख्वाह मा ख्वाह) इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ (माक़ूल मिक़दार(हिस्सा)) दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उनकी मर्ज़ी के मुवाफिक़ उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
59وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا مَا آتَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللَّهُ سَيُؤْتِينَا اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَرَسُولُهُ إِنَّا إِلَى اللَّهِ رَاغِبُونَ
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
60۞ إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۖ فَرِيضَةً مِّنَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
(तो उनका क्या कहना था) ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला है
61وَمِنْهُمُ الَّذِينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٌ ۚ قُلْ أُذُنُ خَيْرٍ لَّكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِينَ وَرَحْمَةٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ ۚ وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (हमारे) रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही (कान) हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई सुन्ने के कान हैं कि ख़ुदा पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन की (बातों) का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले ख़ुदा को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं
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अनुवाद — अत-तौबा 59

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Tuesday, August 18, 2026

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