अत-तौबा · 79/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
الَّذِينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ ۙ سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝٧٩
Allazeena yalmizoonal mut tawwi`eena minalmu`mineena fis sadaqaati wallazeena laa yajidoona illaa juhdahum fayaskharoona minhum sakhiral laahu minhum wa lahum azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर (रियाकारी का) और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी शफ़क़क़्त (मेहनत) की मज़दूरी पाते (शेख़ी का) इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो ख़ुदा भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَلْمِزُونَ: बुराई करना, दोष निकालना, ताना मारना।
  • الْمُطَّوِّعِينَ: अपनी इच्छा और खुशी से अतिरिक्त दान करने वाले।
  • جُهْدَهُمْ: अपनी सामर्थ्य और ताकत के अनुसार (थोड़ी सी चीज़ जो वे दे सकें)।
  • فَيَسْخَرُونَ: मज़ाक उड़ाना, उपहास करना।
  • سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ: अल्लाह ने उन्हें अपनी यातना का पात्र बनाया (अर्थात उनका मज़ाक उड़ाने का बदला दिया)।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है जो ईमान वाले दानशील लोगों का मज़ाक उड़ाते थे। जब अमीर मुसलमान बड़ी मात्रा में दान देते थे, तो ये मुनाफ़िक़ उन पर दोष लगाते थे कि वे केवल दिखावे के लिए ऐसा कर रहे हैं। और जब ग़रीब मुसलमान अपनी हैसियत के मुताबिक़ थोड़ा-बहुत दान देते थे, तो ये लोग उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहते थे: "इस छोटी सी चीज़ का क्या फ़ायदा? अल्लाह को इसकी कोई ज़रूरत नहीं।" इस तरह वे दोनों तरह के लोगों का उपहास करते थे।

अल्लाह ने इन मुनाफ़िक़ों को स्पष्ट चेतावनी दी कि जिस तरह वे ईमान वालों का मज़ाक उड़ा रहे हैं, अल्लाह उन्हें अपनी यातना और अपमान में डालेगा। उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार है, क्योंकि उन्होंने न केवल अल्लाह के बंदों का अपमान किया, बल्कि अल्लाह के दीन और उसके वादों को भी झुठलाया।


फ़ायदे (सीख):

  1. दान की भावना की क़द्र: अल्लाह के नज़दीक दान की असली क़ीमत उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि नीयत और सामर्थ्य से है। थोड़ा सा दान भी अगर ख़ालिस नीयत से दिया जाए, तो अल्लाह उसे कबूल करता है और उसका अज्र बढ़ाता है।
  2. उपहास से बचना: किसी भी इंसान की नेक कोशिश का मज़ाक उड़ाना बहुत बड़ा गुनाह है। यह दिल को तोड़ने वाला काम है और अल्लाह को सख्त नापसंद है। हमें चाहिए कि हर इंसान की नेक कोशिश की क़द्र करें, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो।
  3. अल्लाह की नज़र में बड़ाई: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के यहाँ बड़ाई धन-दौलत से नहीं, बल्कि तक़वा (परहेज़गारी) और अच्छे कामों से है। ग़रीब सहाबा का थोड़ा सा दान अल्लाह के यहाँ अमीरों के बड़े दान से ज़्यादा प्यारा हो सकता है, अगर उसमें सच्ची नीयत हो।
  4. मुनाफ़िक़ों की पहचान: यह आयत हमें मुनाफ़िक़ों की एक पहचान बताती है कि वे नेक कामों को बुरा भला कहते हैं और ईमान वालों का मज़ाक उड़ाते हैं। हमें ऐसे लोगों की बातों से सावधान रहना चाहिए और अपने नेक कामों में डटे रहना चाहिए।
  5. अल्लाह की सज़ा का डर: जो लोग दूसरों का मज़ाक उड़ाते हैं और अल्लाह के दीन का अपमान करते हैं, उनके लिए अल्लाह की तरफ से दर्दनाक अज़ाब है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी ज़ुबान और अच्छे कामों में सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि अल्लाह की नाराज़गी से बच सकें।
🎧 सुनें

📜 आयत 77-81 — अत-तौबा

77فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا فِي قُلُوبِهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَا أَخْلَفُوا اللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ
फिर उनसे उनके ख़ामयाजे (बदले) में अपनी मुलाक़ात के दिन (क़यामत) तक उनके दिल में (गोया खुद) निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो ख़ुदा से वायदा किया था उसके ख़िलाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे
78أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَاهُمْ وَأَنَّ اللَّهَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
क्या वह लोग इतना भी न जानते थे कि ख़ुदा (उनके) सारे भेद और उनकी सरगोशी (सब कुछ) जानता है और ये कि ग़ैब की बातों से ख़ूब आगाह है
79الَّذِينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ ۙ سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर (रियाकारी का) और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी शफ़क़क़्त (मेहनत) की मज़दूरी पाते (शेख़ी का) इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो ख़ुदा भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
80اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की दुआ मॉगों या उनके लिए मग़फिरत की दुआ न मॉगों (उनके लिए बराबर है) तुम उनके लिए सत्तर बार भी बख्शिस की दुआ मांगोगे तो भी ख़ुदा उनको हरगिज़ न बख्शेगा ये (सज़ा) इस सबब से है कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और ख़ुदा बदकार लोगों को मंज़िलें मकसूद तक नहीं पहुँचाया करता
81فَرِحَ الْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ وَكَرِهُوا أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَالُوا لَا تَنفِرُوا فِي الْحَرِّ ۗ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرًّا ۚ لَّوْ كَانُوا يَفْقَهُونَ
(जंगे तबूक़ में) रसूले ख़ुदा के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने (और जिहाद में न जाने) से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे (इस) गर्मी में (घर से) न निकलो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि जहन्नुम की आग (जिसमें तुम चलोगे उससे कहीं ज्यादा गर्म है
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अनुवाद — अत-तौबा 79

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Tuesday, August 18, 2026

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