अल-बलद · 17/20
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बलद
ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ ۝١٧
Summa kaana minal lazeena aamanoo wa tawaasaw bissabri wa tawaasaw bilmarhamah
📖 हिंदी अर्थ
फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abdurrahman As-Sudais ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَوَاصَوْا: एक-दूसरे को नसीहत करना, वसीयत करना।
  • بِالصَّبْرِ: धैर्य और सब्र की ताकीद करना।
  • بِالْمَرْحَمَةِ: दया और करुणा की नसीहत करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला बताते हैं कि जो शख्स उस कठिन घाटी (अक़बा) को पार करना चाहता है—यानी नेकी के उन कामों को अंजाम देना चाहता है जिनका ज़िक्र पिछली आयात में हुआ (ग़ुलाम आज़ाद करना, भूखे को खाना खिलाना, यतीम और मिस्कीन की देखभाल करना)—उसके लिए सिर्फ़ ये अमल काफ़ी नहीं, बल्कि उसे ईमान के साथ इन कामों को करना होगा। यानी पहले ईमान लाना ज़रूरी है, क्योंकि बिना ईमान के नेकियाँ अल्लाह के यहाँ क़बूल नहीं होतीं।

फिर अल्लाह फ़रमाते हैं कि ऐसे लोग आपस में एक-दूसरे को सब्र की नसीहत करते हैं—यानी अल्लाह की इबादत पर सब्र, गुनाहों से बचने पर सब्र, और मुसीबतों के वक़्त सब्र। और साथ ही वे एक-दूसरे को रहमत (दया) की वसीयत करते हैं—यानी अल्लाह की मख़लूक़ (सृष्टि) पर रहम करना, लोगों के साथ नर्मी और शफ़्क़त से पेश आना, और उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखना।

यह वही खूबी है जो ईमानदारों को दूसरों से अलग करती है—वे सिर्फ़ ख़ुद अच्छे नहीं बनते, बल्कि दूसरों को भी अच्छाई की तरफ़ बुलाते हैं। सब्र और रहमत का ये जोड़ इसलिए बेहद अहम है क्योंकि सब्र इंसान को अल्लाह से जोड़ता है और रहमत इंसान को इंसानों से। जिसमें ये दोनों खूबियाँ जमा हो जाएँ, वही कामयाब है।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इस्लाम सिर्फ़ अकेले की निजात का नाम नहीं, बल्कि यह एक जमाती और समाजी दीन है। हमें चाहिए कि हम अपने घर, अपने मोहल्ले और अपने समाज में एक-दूसरे को सब्र की ताकीद करें—मुश्किल वक़्त में हिम्मत न हारें—और एक-दूसरे पर रहम करें। अगर हम सच में चाहते हैं कि हमारी नेकियाँ क़बूल हों, तो ईमान के साथ-साथ इन आपसी नसीहतों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत की तरफ़ ले जाता है, और यही वह जज़्बा है जो हमारे समाज को जन्नती समाज बना सकता है।



📜 आयत 15-19 — सूरा अल-बलद

15يَتِيمًا ذَا مَقْرَبَةٍ
मोहताज को
16أَوْ مِسْكِينًا ذَا مَتْرَبَةٍ
खाना खिलाना
17ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ
फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे
18أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ
यही लोग ख़ुश नसीब हैं
19وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا هُمْ أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया है यही लोग बदबख्त हैं
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अनुवाद — अल-बलद 17

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Friday, October 2, 2026

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