हूद · 24/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
۞ مَثَلُ الْفَرِيقَيْنِ كَالْأَعْمَىٰ وَالْأَصَمِّ وَالْبَصِيرِ وَالسَّمِيعِ ۚ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ۝٢٤
Masalul fareeqini kal a`maa wal asammi walbaseeri wassamee`; hal yastawiyaani masalaa; afalaa tazakkaroon
📖 हिंदी अर्थ
(काफिर, मुसलमान) दोनों फरीक़ की मसल अन्धे और बहरे और देखने वाले और सुनने वाले की सी है क्या ये दोनो मसल में बराबर हो सकते हैं तो क्या तुम लोग ग़ौर नहीं करते और हमने नूह को ज़रुर उन की क़ौम के पास भेजा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الأَعْمَى: अंधा, जो देख न सके।
  • الأَصَم: बहरा, जो सुन न सके।
  • البَصِير: देखने वाला, आँखों वाला।
  • السَّمِيع: सुनने वाला, कानों वाला।
  • يَسْتَوِيَان: दोनों बराबर हों।
  • تَذَكَّرُونَ: तुम सीख लो, शिक्षा ग्रहण करो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में काफ़िरों और मोमिनों के दो गिरोहों की मिसाल बयान की है, ताकि इंसान आसानी से समझ सके कि हक़ और बातिल के दरमियान कितना बड़ा फ़र्क़ है।

काफ़िरों की हालत अंधे और बहरे इंसान जैसी है। जिस तरह अंधा इंसान अपनी आँखों से कुछ नहीं देख पाता, ठीक उसी तरह काफ़िर दिल की आँखों से हक़ को नहीं देख पाता। वह अल्लाह की निशानियों, उसकी क़ुदरत और उसके दीन की रौशनी से महरूम है। और जिस तरह बहरा इंसान किसी की आवाज़ नहीं सुन सकता, उसी तरह काफ़िर हक़ की आवाज़, नबियों की दावत और क़ुरआन की तालीमात को कान लगाकर नहीं सुनता, या सुनता भी है तो उस पर अमल नहीं करता। उसके कान हक़ सुनने के लिए बहरे हैं, और उसकी आँखें हक़ देखने के लिए अंधी हैं।

इसके मुक़ाबले में मोमिनों की हालत देखने वाले और सुनने वाले इंसान जैसी है। मोमिन की आँखें खुली होती हैं, वह अल्लाह की निशानियों में ग़ौर करता है, हक़ को पहचानता है और उस पर चलता है। उसके कान भी खुले होते हैं, वह अल्लाह का कलाम, नबी की सुन्नत और नेक नसीहतों को ग़ौर से सुनता है और उस पर अमल करता है। वह दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई हासिल करता है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: क्या ये दोनों गिरोह कभी बराबर हो सकते हैं? अंधा और बहरा, देखने और सुनने वाले के बराबर कैसे हो सकता है? हरगिज़ नहीं! इन दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। एक रौशनी में चलता है, दूसरा अंधेरे में भटकता है। एक को सीधा रास्ता मिला, दूसरा गुमराही में पड़ा है।

अल्लाह तआला इसी बात पर ग़ौर करने के लिए कहता है: "क्या तुम सीख नहीं लेते?" यानी ऐ इंसानो! ज़रा अपनी अक़्ल से काम लो, इन दोनों गिरोहों की मिसाल पर ग़ौर करो। अगर तुम समझदार हो तो देख लो कि अंधे और बहरे की राह कहाँ और देखने-सुनने वाले की राह कहाँ? तुम ख़ुद अपनी भलाई के लिए वह रास्ता चुनो जो रौशनी और हिदायत वाला हो, ताकि दुनिया में इत्मिनान और आख़िरत में कामयाबी हासिल कर सको।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान की नेअमत कितनी बड़ी है। ईमान वाला इंसान दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशहाल और आख़िरत में सबसे ज़्यादा कामयाब है। अल्लाह तआला हम सबको हक़ देखने और सुनने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 22-26 — हूद

22لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِي الْآخِرَةِ هُمُ الْأَخْسَرُونَ
इसमें शक़ नहीं कि यही लोग आख़िरत में बड़े घाटा उठाने वाले होगें
23إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَخْبَتُوا إِلَىٰ رَبِّهِمْ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए और अपने परवरदिगार के सामने आजज़ी से झुके यही लोग जन्नती हैं कि ये बेहश्त में हमेशा रहेगें
24۞ مَثَلُ الْفَرِيقَيْنِ كَالْأَعْمَىٰ وَالْأَصَمِّ وَالْبَصِيرِ وَالسَّمِيعِ ۚ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
(काफिर, मुसलमान) दोनों फरीक़ की मसल अन्धे और बहरे और देखने वाले और सुनने वाले की सी है क्या ये दोनो मसल में बराबर हो सकते हैं तो क्या तुम लोग ग़ौर नहीं करते और हमने नूह को ज़रुर उन की क़ौम के पास भेजा
25وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
(और उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि) मैं तो तुम्हारा (अज़ाबे ख़ुदा से) सरीही धमकाने वाला हूँ
26أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ
(और) ये (समझता हूँ) कि तुम ख़ुदा के सिवा किसी की परसतिश न करो मैं तुम पर एक दर्दनाक दिन (क़यामत) के अज़ाब से डराता हूँ
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अनुवाद — हूद 24

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Tuesday, August 18, 2026

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