हूद · 25/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ۝٢٥
Wa laqad arsalnaa Noohan ilaa qawmihee innee lakum nazeerum mubeen
📖 हिंदी अर्थ
(और उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि) मैं तो तुम्हारा (अज़ाबे ख़ुदा से) सरीही धमकाने वाला हूँ
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَذِيرٌ: डराने वाला, सचेत करने वाला
  • مُبِينٌ: स्पष्ट, खुला हुआ, जो अपनी बात को साफ़ और स्पष्ट रूप से बयान करे

व्याख्या:

अल्लाह तआला ने अपने पैगंबर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को उनकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा। उन्होंने अपनी क़ौम से कहा: "मैं तुम्हारे लिए अल्लाह की तरफ से एक स्पष्ट चेतावनी देने वाला हूँ। मैं तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराता हूँ और तुम्हें उस रास्ते की ओर बुलाता हूँ जो अल्लाह ने मेरे ज़रिए भेजा है। मेरी बात कोई छिपी या अस्पष्ट नहीं है, बल्कि मैं अपने आपको और अपने पैग़ाम को पूरी तरह स्पष्ट करके पेश कर रहा हूँ। मैं तुम्हें अल्लाह की इबादत की तरफ बुलाता हूँ और उसके अज़ाब से डराता हूँ, ताकि तुम अपने कुफ़्र और गुनाहों से बाज़ आओ और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनो।"

यह आयत बताती है कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) का पैग़ाम कोई संदिग्ध या धुंधला नहीं था, बल्कि वह पूरी वज़ाहत के साथ अपनी क़ौम के सामने पेश किया गया। उन्होंने अपनी क़ौम को साफ़-साफ़ बता दिया कि मैं तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराने वाला हूँ, और यही मेरा फ़र्ज़ है।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह के पैगंबर अपनी उम्मत के लिए सबसे ज़्यादा शफ़ीक़ और मेहरबान होते हैं। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को अज़ाब से डराकर उनकी भलाई चाही, यानी एक सच्चा मुसलमान भी अपने भाइयों को अल्लाह के अज़ाब से डराता है और उनकी भलाई की तमन्ना रखता है।
  2. दीन की दावत में स्पष्टता और वज़ाहत बहुत ज़रूरी है। हमें अपने ईमान और अक़ीदे को बिना किसी झिझक और अस्पष्टता के पेश करना चाहिए, जैसा कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने किया।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह का पैग़ाम सुनने के बाद कोई बहाना नहीं बन सकता। जब पैगंबर स्पष्ट रूप से सचेत कर देते हैं, तो फिर लोगों के पास कोई उज़्र (बहाना) नहीं रहता।
  4. हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की दावत हमारे लिए नमूना है कि हमें अपने परिवार, समाज और दोस्तों को अल्लाह के दीन की तरफ बुलाना चाहिए, भले ही लोग हमारी बात न मानें, लेकिन हमारा फ़र्ज़ सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है।
🎧 सुनें

📜 आयत 23-27 — हूद

23إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَخْبَتُوا إِلَىٰ رَبِّهِمْ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए और अपने परवरदिगार के सामने आजज़ी से झुके यही लोग जन्नती हैं कि ये बेहश्त में हमेशा रहेगें
24۞ مَثَلُ الْفَرِيقَيْنِ كَالْأَعْمَىٰ وَالْأَصَمِّ وَالْبَصِيرِ وَالسَّمِيعِ ۚ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
(काफिर, मुसलमान) दोनों फरीक़ की मसल अन्धे और बहरे और देखने वाले और सुनने वाले की सी है क्या ये दोनो मसल में बराबर हो सकते हैं तो क्या तुम लोग ग़ौर नहीं करते और हमने नूह को ज़रुर उन की क़ौम के पास भेजा
25وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
(और उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि) मैं तो तुम्हारा (अज़ाबे ख़ुदा से) सरीही धमकाने वाला हूँ
26أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ
(और) ये (समझता हूँ) कि तुम ख़ुदा के सिवा किसी की परसतिश न करो मैं तुम पर एक दर्दनाक दिन (क़यामत) के अज़ाब से डराता हूँ
27فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا نَرَاكَ إِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَاكَ اتَّبَعَكَ إِلَّا الَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِبِينَ
तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम तो तुम्हें अपना ही सा एक आदमी समझते हैं और हम तो देखते हैं कि तुम्हारे पैरोकार हुए भी हैं तो बस सिर्फ हमारे चन्द रज़ील (नीच) लोग (और वह भी बे सोचे समझे सरसरी नज़र में) और हम तो अपने ऊपर तुम लोगों की कोई फज़ीलत नहीं देखते बल्कि तुम को झूठा समझते हैं
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अनुवाद — हूद 25

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Tuesday, August 18, 2026

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