हूद · 35/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ إِنِ افْتَرَيْتُهُ فَعَلَيَّ إِجْرَامِي وَأَنَا بَرِيءٌ مِّمَّا تُجْرِمُونَ ۝٣٥
Am yaqooloonaf taraahu qul inif taraituhoo fa`alaiya ijraamee wa ana bareee`um mimmaa tujrimoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) क्या (कुफ्फ़ारे मक्का भी) कहते हैं कि क़ुरान को उस (तुम) ने गढ़ लिया है तुम कह दो कि अगर मैने उसको गढ़ा है तो मेरे गुनाह का वबाल मुझ पर होगा और तुम लोग जो (गुनाह करके) मुजरिम होते हो उससे मै बरीउल ज़िम्मा (अलग) हूँ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَمْ يَقُولُونَ: क्या ये लोग कहते हैं
  • افْتَرَاهُ: उसने (नूह ने) इसे गढ़ लिया / झूठ रच लिया
  • إِجْرَامِي: मेरा गुनाह / मेरा अपराध
  • بَرِيءٌ: मुक्त / बेज़ार
  • تُجْرِمُونَ: तुम अपराध करते हो (कुफ्र और झुठलाने का)

तफसीर (व्याख्या):

इन मुशरिकों का हाल यह है कि जब हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया और सच्चे दीन की दावत दी, तो वे उन पर इल्ज़ाम लगाने लगे कि ये शख्स अपनी तरफ से यह बातें गढ़ रहा है। अल्लाह तआला ने अपने नबी को हिदायत दी कि इनसे कहो: "अगर मैंने सचमुच यह बात अल्लाह पर गढ़ी होती, तो इसका गुनाह सिर्फ मुझ पर होता और मैं ही इसकी सज़ा पाता। लेकिन अगर मैं सच्चा हूँ और यह पैग़ाम अल्लाह की तरफ से है, तो फिर तुम्हारा कुफ्र, तुम्हारा झुठलाना और तुम्हारे अपराध तुम्हारे ही ज़िम्मे हैं। मेरा इनसे कोई ताल्लुक़ नहीं, मैं तुम्हारे इन अपराधों से बिल्कुल बरी हूँ।"

यानी नबी की ज़िम्मेदारी सिर्फ पैग़ाम पहुँचाना है। अगर लोग उसे न मानें, तो उसका वबाल उन्हीं पर है। नबी पर इल्ज़ाम लगाना और उसकी दावत को झूठ कहना, यह खुद उन लोगों का जुर्म है, जिसकी सज़ा वे अल्लाह के सामने पाएँगे।


फ़ायदे (सबक):

  1. सच्चाई का साहस: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि सच्चाई पर डटे रहना चाहिए, चाहे लोग कितने ही इल्ज़ाम लगाएँ। नबी ने बिना किसी डर के साफ जवाब दिया कि अगर मैं झूठा हूँ तो मेरा गुनाह मुझ पर, और अगर सच्चा हूँ तो तुम्हारा जुर्म तुम पर।
  2. ज़िम्मेदारी का बंटवारा: हर इंसान अपने कर्मों का ज़िम्मेदार है। नबी या दाई (दीन की तरफ बुलाने वाला) सिर्फ पैग़ाम पहुँचाता है; हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है। इसलिए किसी को दूसरे के गुनाह का बोझ नहीं उठाना पड़ता।
  3. बरी होने का एलान: जो इंसान सच्चाई पर हो, उसे चाहिए कि वह बातिल (झूठ) से अपनी बराअत (मुक्ति) का एलान करे। यह उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत और स्पष्टता है।
  4. इल्ज़ाम का सामना: जब सच्चे लोगों पर झूठे इल्ज़ाम लगाए जाते हैं, तो उन्हें घबराना नहीं चाहिए। अल्लाह अपने नबियों और सच्चे बंदों की हिफाज़त करता है और उनकी सच्चाई को ज़ाहिर करता है।
  5. अल्लाह पर भरोसा: नबी ने अपना पूरा भरोसा अल्लाह पर रखा और जवाब अल्लाह की तरफ से दिया। यह हमारे लिए सबक है कि मुश्किल वक्त में अल्लाह पर भरोसा रखें और उसी से मदद माँगें।
🎧 सुनें

📜 आयत 33-37 — हूद

33قَالَ إِنَّمَا يَأْتِيكُم بِهِ اللَّهُ إِن شَاءَ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
नूह ने कहा अगर चाहेगा तो बस ख़ुदा ही तुम पर अज़ाब लाएगा और तुम लोग किसी तरह उसे हरा नहीं सकते और अगर मै चाहूँ तो तुम्हारी (कितनी ही) ख़ैर ख्वाही (भलाई) करुँ
34وَلَا يَنفَعُكُمْ نُصْحِي إِنْ أَرَدتُّ أَنْ أَنصَحَ لَكُمْ إِن كَانَ اللَّهُ يُرِيدُ أَن يُغْوِيَكُمْ ۚ هُوَ رَبُّكُمْ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
अगर ख़ुदा को तुम्हारा बहकाना मंज़ूर है तो मेरी ख़ैर ख्वाही कुछ भी तुम्हारे काम नहीं आ सकती वही तुम्हारा परवरदिगार है और उसी की तरफ तुम को लौट जाना है
35أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ إِنِ افْتَرَيْتُهُ فَعَلَيَّ إِجْرَامِي وَأَنَا بَرِيءٌ مِّمَّا تُجْرِمُونَ
(ऐ रसूल) क्या (कुफ्फ़ारे मक्का भी) कहते हैं कि क़ुरान को उस (तुम) ने गढ़ लिया है तुम कह दो कि अगर मैने उसको गढ़ा है तो मेरे गुनाह का वबाल मुझ पर होगा और तुम लोग जो (गुनाह करके) मुजरिम होते हो उससे मै बरीउल ज़िम्मा (अलग) हूँ
36وَأُوحِيَ إِلَىٰ نُوحٍ أَنَّهُ لَن يُؤْمِنَ مِن قَوْمِكَ إِلَّا مَن قَدْ آمَنَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَفْعَلُونَ
और नूह के पास ये 'वही' भेज दी गई कि जो ईमान ला चुका उनके सिवा अब कोई शख़्श तुम्हारी क़ौम से हरगिज़ ईमान न लाएगा तो तुम ख्वाहमा ख्वाह उनकी कारस्तानियों का (कुछ) ग़म न खाओ
37وَاصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا ۚ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
और (बिस्मिल्लाह करके) हमारे रुबरु और हमारे हुक्म से कश्ती बना डालो और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है उनके बारे में मुझसे सिफारिश न करना क्योंकि ये लोग ज़रुर डुबा दिए जाएँगें
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अनुवाद — हूद 35

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Tuesday, August 18, 2026

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