Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَعُوذُ بِكَ: मैं तेरी पनाह माँगता हूँ, तेरी शरण में आता हूँ।
- مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ: वह चीज़ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं, जिसकी सत्यता का मुझे इल्म नहीं।
- تَغْفِرْ لِي: तू मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे।
- تَرْحَمْنِي: तू मुझ पर रहम फरमा दे।
- الْخَاسِرِينَ: नुक़सान उठाने वाले, घाटे में रहने वाले।
तफ़सीर (व्याख्या):
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे के लिए दुआ माँगी थी कि उसे हलाकत से बचा लिया जाए, लेकिन अल्लाह तआला ने उन्हें बता दिया कि उनका बेटा उनके घर वालों में से नहीं है, क्योंकि वह काफ़िर है और उसका अमल बुरा है। इस पर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह की पनाह माँगते हुए कहा: "ऐ मेरे रब! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि मैं तुझसे ऐसी चीज़ माँगूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं। मैंने अपनी जगह से यह दुआ माँगी थी, लेकिन मुझे इसकी हक़ीक़त का इल्म नहीं था कि तेरी मर्ज़ी क्या है और तेरे हुक्म में क्या हिकमत है।"
फिर उन्होंने अल्लाह से दुआ की: "और अगर तू मुझे माफ़ नहीं करेगा और मुझ पर रहम नहीं करेगा, तो मैं उन लोगों में से हो जाऊँगा जो नुक़सान उठाने वाले हैं।" यानी अगर तेरी मग़फिरत और रहमत मुझ पर न हो, तो मैं अपने आपको घाटे में डालने वालों में से हूँ, क्योंकि मैंने ऐसी बात की जो मेरे लिए मुनासिब नहीं थी। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी इस गलती का एहसास करते हुए अल्लाह से माफ़ी माँगी और उसकी रहमत के सहारे खुद को उसके हवाले कर दिया।
फ़ायदे (सबक़):
- इल्म के बग़ैर बात न करना: यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को किसी भी मामले में अल्लाह से दुआ करते वक़्त या कोई बात करते वक़्त उस चीज़ का इल्म होना चाहिए। बिना जानकारी के किसी चीज़ की दुआ करना या कहना मुनासिब नहीं है।
- अल्लाह की पनाह माँगना: हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) जैसे नबी ने भी जब गलती हुई तो फ़ौरन अल्लाह की पनाह माँगी। यह हमारे लिए सबक़ है कि गलती होने पर हमें अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए और उससे माफ़ी माँगनी चाहिए।
- अल्लाह की रहमत पर भरोसा: नूह (अलैहिस्सलाम) ने यह नहीं कहा कि मैं नेक हूँ, मेरी दुआ क़बूल होगी, बल्कि उन्होंने अल्लाह की मग़फिरत और रहमत को ही अपना सहारा बनाया। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने आमाल पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखना चाहिए।
- ख़ास लोगों की मोहब्बत में भी अल्लाह की मर्ज़ी को आगे रखना: हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे के लिए दुआ की, लेकिन जब अल्लाह ने बता दिया कि वह हलाक होने वालों में से है, तो उन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी को क़ुबूल किया। यह सिखाता है कि अल्लाह की मर्ज़ी और उसका हुक्म हर चीज़ से बड़ा है, चाहे वह हमारे अपनों के मामले में ही क्यों न हो।
📜 आयत 45-49 — सूरा हूद
अनुवाद — हूद 47
सूरा हूद आयत 47 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर तु मुझे (मेरे कसूर न बख्श देगा और…सूरा आयत 47/123 — सूरा हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा हूद सुनें, सूरा हूद अनुवाद, सूरा हूद mp3, सूरा हूद pdf. आयत 45–49. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा हूद
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


