हूद · 47/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالَ رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُن مِّنَ الْخَاسِرِينَ ۝٤٧
Qaala rabbi inneee a`oozu bika an as`alaka maa laisa lee bihee `ilmunw wa illaa taghfir lee wa tarhamneee akum minal khaasireen
📖 हिंदी अर्थ
और अगर तु मुझे (मेरे कसूर न बख्श देगा और मुझ पर रहम न खाएगा तो मैं सख्त घाटा उठाने वालों में हो जाऊँगा (जब तूफान जाता रहा तो) हुक्म दिया गया ऐ नूह हमारी तरफ से सलामती और उन बरकतों के साथ कश्ती से उतरो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَعُوذُ بِكَ: मैं तेरी पनाह माँगता हूँ, तेरी शरण में आता हूँ।
  • مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ: वह चीज़ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं, जिसकी सत्यता का मुझे इल्म नहीं।
  • تَغْفِرْ لِي: तू मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे।
  • تَرْحَمْنِي: तू मुझ पर रहम फरमा दे।
  • الْخَاسِرِينَ: नुक़सान उठाने वाले, घाटे में रहने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे के लिए दुआ माँगी थी कि उसे हलाकत से बचा लिया जाए, लेकिन अल्लाह तआला ने उन्हें बता दिया कि उनका बेटा उनके घर वालों में से नहीं है, क्योंकि वह काफ़िर है और उसका अमल बुरा है। इस पर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह की पनाह माँगते हुए कहा: "ऐ मेरे रब! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि मैं तुझसे ऐसी चीज़ माँगूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं। मैंने अपनी जगह से यह दुआ माँगी थी, लेकिन मुझे इसकी हक़ीक़त का इल्म नहीं था कि तेरी मर्ज़ी क्या है और तेरे हुक्म में क्या हिकमत है।"

फिर उन्होंने अल्लाह से दुआ की: "और अगर तू मुझे माफ़ नहीं करेगा और मुझ पर रहम नहीं करेगा, तो मैं उन लोगों में से हो जाऊँगा जो नुक़सान उठाने वाले हैं।" यानी अगर तेरी मग़फिरत और रहमत मुझ पर न हो, तो मैं अपने आपको घाटे में डालने वालों में से हूँ, क्योंकि मैंने ऐसी बात की जो मेरे लिए मुनासिब नहीं थी। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी इस गलती का एहसास करते हुए अल्लाह से माफ़ी माँगी और उसकी रहमत के सहारे खुद को उसके हवाले कर दिया।

फ़ायदे (सबक़):

  1. इल्म के बग़ैर बात न करना: यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को किसी भी मामले में अल्लाह से दुआ करते वक़्त या कोई बात करते वक़्त उस चीज़ का इल्म होना चाहिए। बिना जानकारी के किसी चीज़ की दुआ करना या कहना मुनासिब नहीं है।
  2. अल्लाह की पनाह माँगना: हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) जैसे नबी ने भी जब गलती हुई तो फ़ौरन अल्लाह की पनाह माँगी। यह हमारे लिए सबक़ है कि गलती होने पर हमें अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए और उससे माफ़ी माँगनी चाहिए।
  3. अल्लाह की रहमत पर भरोसा: नूह (अलैहिस्सलाम) ने यह नहीं कहा कि मैं नेक हूँ, मेरी दुआ क़बूल होगी, बल्कि उन्होंने अल्लाह की मग़फिरत और रहमत को ही अपना सहारा बनाया। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने आमाल पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखना चाहिए।
  4. ख़ास लोगों की मोहब्बत में भी अल्लाह की मर्ज़ी को आगे रखना: हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे के लिए दुआ की, लेकिन जब अल्लाह ने बता दिया कि वह हलाक होने वालों में से है, तो उन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी को क़ुबूल किया। यह सिखाता है कि अल्लाह की मर्ज़ी और उसका हुक्म हर चीज़ से बड़ा है, चाहे वह हमारे अपनों के मामले में ही क्यों न हो।
🎧 सुनें

📜 आयत 45-49 — हूद

45وَنَادَىٰ نُوحٌ رَّبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ
और (जिस वक्त नूह का बेटा ग़रक (डूब) हो रहा था तो नूह ने अपने परवरदिगार को पुकारा और अर्ज़ की ऐ मेरे परवरदिगार इसमें तो शक़ नहीं कि मेरा बेटा मेरे अहल (घर वालों) में शामिल है और तूने वायदा किया था कि तेरे अहल को बचा लूँगा) और इसमें शक़ नहीं कि तेरा वायदा सच्चा है और तू सारे (जहान) के हाकिमों से बड़ा हाकिम है
46قَالَ يَا نُوحُ إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ ۖ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍ ۖ فَلَا تَسْأَلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۖ إِنِّي أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ
(तू मेरे बेटे को नजात दे) ख़ुदा ने फरमाया ऐ नूह तुम (ये क्या कह रहे हो) हरगिज़ वह तुम्हारे अहल में शामिल नहीं वह बेशक बदचलन है (देखो जिसका तुम्हें इल्म नहीं है मुझसे उसके बारे में (दरख्वास्त न किया करो और नादानों की सी बातें न करो) नूह ने अर्ज़ की ऐ मेरे परवरदिगार मै तुझ ही से पनाह मागँता हूँ कि जिस चीज़ का मुझे इल्म न हो मै उसकी दरख्वास्त करुँ
47قَالَ رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُن مِّنَ الْخَاسِرِينَ
और अगर तु मुझे (मेरे कसूर न बख्श देगा और मुझ पर रहम न खाएगा तो मैं सख्त घाटा उठाने वालों में हो जाऊँगा (जब तूफान जाता रहा तो) हुक्म दिया गया ऐ नूह हमारी तरफ से सलामती और उन बरकतों के साथ कश्ती से उतरो
48قِيلَ يَا نُوحُ اهْبِطْ بِسَلَامٍ مِّنَّا وَبَرَكَاتٍ عَلَيْكَ وَعَلَىٰ أُمَمٍ مِّمَّن مَّعَكَ ۚ وَأُمَمٌ سَنُمَتِّعُهُمْ ثُمَّ يَمَسُّهُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो तुम पर हैं और जो लोग तुम्हारे साथ हैं उनमें से न कुछ लोगों पर और (तुम्हारे बाद) कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें हम थोड़े ही दिन बाद बहरावर करेगें फिर हमारी तरफ से उनको दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा
49تِلْكَ مِنْ أَنبَاءِ الْغَيْبِ نُوحِيهَا إِلَيْكَ ۖ مَا كُنتَ تَعْلَمُهَا أَنتَ وَلَا قَوْمُكَ مِن قَبْلِ هَٰذَا ۖ فَاصْبِرْ ۖ إِنَّ الْعَاقِبَةَ لِلْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) ये ग़ैब की चन्द ख़बरे हैं जिनको तुम्हारी तरफ वही के ज़रिए पहुँचाते हैं जो उसके क़ब्ल न तुम जानते थे और न तुम्हारी क़ौम ही (जानती थी) तो तुम सब्र करो इसमें शक़ नहीं कि आख़िारत (की खूबियाँ) परहेज़गारों ही के वास्ते हैं
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अनुवाद — हूद 47

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Tuesday, August 18, 2026

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