Wa sharawhu bisamanim bakhsin daraahima ma`doo datinw wa kaanoo feehi minaz zaahideen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(जब यूसुफ के भाइयों को ख़बर लगी तो आ पहुँचे और उनको अपना ग़ुलाम बताया और उन लोगों ने यूसुफ को गिनती के खोटे चन्द दरहम (बहुत थोड़े दाम पर बेच डाला) और वह लोग तो यूसुफ से बेज़ार हो ही रहे थे
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اور اس کو تھوڑی سی قیمت (یعنی) معدودے چند درہموں پر بیچ ڈالا۔ اور انہیں ان (کے بارے) میں کچھ لالچ نہ تھا
(जब यूसुफ के भाइयों को ख़बर लगी तो आ पहुँचे और उनको अपना ग़ुलाम बताया और उन लोगों ने यूसुफ को गिनती के खोटे चन्द दरहम (बहुत थोड़े दाम पर बेच डाला) और वह लोग तो यूसुफ से बेज़ार हो ही रहे थे
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
وَشَرَوْهُ: उन्होंने उसे बेच दिया।
بِثَمَنٍ بَخْسٍ: बहुत कम और नाकाफी मूल्य पर।
دَرَاهِمَ مَعْدُودَةٍ: गिनी हुई चाँदी की दिरहमें (जो बहुत कम थीं)।
الزَّاهِدِينَ: उससे बेरुखी रखने वाले, उसे तुच्छ समझने वाले।
तफसीर (व्याख्या):
यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के भाइयों ने उन्हें एक कुएँ में डाल दिया था। उसके बाद कुछ क़ाफ़िले वाले (यात्री) वहाँ से गुज़रे। उन्होंने यूसुफ़ को कुएँ से निकाला और उन्हें अपने साथ ले गए। फिर उन्होंने यूसुफ़ को बेचने का फ़ैसला किया। उन्होंने उन्हें बहुत ही कम मूल्य पर बेच दिया — कुछ गिनी हुई दिरहमें, जो इतनी कम थीं कि उन्हें तौला भी नहीं गया, बल्कि गिनकर ही दे दिया गया। यह इसलिए कि उन्हें यूसुफ़ की असली क़द्र का पता नहीं था और न ही उन्हें उनसे कोई लगाव था। वे उन्हें जल्दी से जल्दी अपने हाथ से निकालना चाहते थे, ताकि उनके परिवार या किसी और को पता न चले। दरअसल, यूसुफ़ के भाइयों ने उन्हें पहले ही बेच दिया था, और यह बिक्री क़ाफ़िले वालों के द्वारा मिस्र में की गई थी। यह सब अल्लाह की मेहरबानी से हुआ, ताकि यूसुफ़ उन लोगों के पास ज़्यादा देर न रहें और उनकी तक़दीर का एक और अहम मोड़ आए।
फ़ायदे (सबक):
अल्लाह तआला अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है, चाहे हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) को कुएँ से निकालकर अल्लाह ने उनके लिए एक नया रास्ता खोला।
दुनिया की चीज़ों की क़ीमत लोगों की नज़र में बदलती रहती है, लेकिन अल्लाह के पास इंसान की असली क़द्र उसके ईमान और अमल से है। यूसुफ़ को बेचने वालों ने उन्हें तुच्छ समझा, मगर अल्लाह ने उन्हें बुलंद मुक़ाम दिया।
मुसीबत के वक़्त में सब्र और भरोसा रखना चाहिए। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखा, और अल्लाह ने उन्हें हर मुश्किल से निकाला।
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि इंसान की तदबीर (योजना) कभी अल्लाह की तक़दीर को नहीं बदल सकती। भाइयों ने यूसुफ़ को दूर करने की साज़िश की, लेकिन अल्लाह ने उसी साज़िश को यूसुफ़ की तरक़्क़ी का ज़रिया बना दिया।
और ये लोग यूसुफ के कुरते पर झूठ मूठ (भेड़) का खून भी (लगा के) लाए थे, याक़ूब ने कहा (भेड़िया ने ही खाया (बल्कि) तुम्हारे दिल ने तुम्हारे बचाओ के लिए एक बात गढ़ी वरना कुर्ता फटा हुआ ज़रुर होता फिर सब्र व शुक्र है और जो कुछ तुम बयान करते हो उस पर ख़ुदा ही से मदद माँगी जाती है
और (ख़ुदा की शान देखो) एक काफ़ला (वहाँ) आकर उतरा उन लोगों ने अपने सक्के (पानी भरने वाले) को (पानी भरने) भेजा ग़रज़ उसने अपना डोल डाला ही था (कि यूसुफ उसमें बैठे और उसने ख़ीचा तो निकल आए) वह पुकारा आहा ये तो लड़का है और काफला वालो ने यूसुफ को क़ीमती सरमाया समझकर छिपा रखा हालॉकि जो कुछ ये लोग करते थे ख़ुदा उससे ख़ूब वाकिफ था
(जब यूसुफ के भाइयों को ख़बर लगी तो आ पहुँचे और उनको अपना ग़ुलाम बताया और उन लोगों ने यूसुफ को गिनती के खोटे चन्द दरहम (बहुत थोड़े दाम पर बेच डाला) और वह लोग तो यूसुफ से बेज़ार हो ही रहे थे
(यूसुफ को लेकर मिस्र पहुँचे और वहाँ उसे बड़े नफे में बेच डाला) और मिस्र के लोगों से (अज़ीजे मिस्र) जिसने (उनको ख़रीदा था अपनी बीवी (ज़ुलेख़ा) से कहने लगा इसको इज्ज़त व आबरु से रखो अजब नहीं ये हमें कुछ नफा पहुँचाए या (शायद) इसको अपना बेटा ही बना लें और यू हमने यूसुफ को मुल्क (मिस्र) में (जगह देकर) क़ाबिज़ बनाया और ग़रज़ ये थी कि हमने उसे ख्वाब की बातों की ताबीर सिखायी और ख़ुदा तो अपने काम पर (हर तरह के) ग़ालिब व क़ादिर है मगर बहुतेरे लोग (उसको) नहीं जानते
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