यूसुफ · 77/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
۞ قَالُوا إِن يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ أَخٌ لَّهُ مِن قَبْلُ ۚ فَأَسَرَّهَا يُوسُفُ فِي نَفْسِهِ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ ۚ قَالَ أَنتُمْ شَرٌّ مَّكَانًا ۖ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ ۝٧٧
Qaaloo iny yasriq faqad saraqa akhul lahoo min qabl; fa asarrahaa Yoosufu fee nafsihee wa lam yubdihaa lahum; qaala antum sharrum makaananw wallaahu a`lamu bimaa tasifoon
📖 हिंदी अर्थ
(ग़रज़) इब्ने यामीन रोक लिए गए तो ये लोग कहने लगे अगर उसने चोरी की तो (कौन ताज्जुब है) इसके पहले इसका भाई (यूसुफ) चोरी कर चुका है तो यूसुफ ने (उसका कुछ जवाब न दिया) उसको अपने दिल में पोशीदा (छुपाये) रखा और उन पर ज़ाहिर न होने दिया मगर ये कह दिया कि तुम लोग बड़े ख़ाना ख़राब (बुरे आदमी) हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَأَسَرَّهَا: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने उस बात को अपने मन में छिपा लिया।
  • شَرٌّ مَّكَانًا: तुम लोगों का स्थान/दर्जा बहुत बुरा है, अर्थात तुम बहुत बुरे हो।
  • تَصِفُونَ: तुम जो कुछ कहते/बयान करते हो (झूठ और बदनामी)।

विस्तृत तफ़सीर:

जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाई बिन्यामीन के कटोरे (प्याले) को उसके सामान से निकलवाया, तो उनके भाइयों ने यह देखकर कहा: "अगर यह (बिन्यामीन) चोरी करता है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि इसका सगा भाई (यूसुफ़) भी पहले चोरी कर चुका है।" उनका इशारा यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की ओर था, और वे उन पर झूठा आरोप लगा रहे थे।

यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह बात सुनी, लेकिन उन्होंने अपने दिल में उस बात को छिपा लिया और उनके सामने उसे प्रकट नहीं किया। उन्होंने अपने मन में कहा: "तुम लोग स्वयं बुरे हो और तुम्हारा दर्जा बहुत नीचा है, क्योंकि तुमने अपने भाई (यूसुफ़) के साथ जो किया, वह कहीं बड़ा अपराध था।" और फिर उन्होंने कहा: "अल्लाह उस बात को खूब जानता है जो तुम लोग कह रहे हो (झूठ और बदनामी)।" यानी अल्लाह तुम्हारे झूठ और बदनामी से पूरी तरह अवगत है, और वही सच्चा न्याय करने वाला है।

यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह बात अपने मन में कही, ज़ुबान पर नहीं लाई, क्योंकि उन्होंने धैर्य और सहनशीलता से काम लिया और अपने भाइयों के साथ कठोरता नहीं की।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. धैर्य और सहनशीलता: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों की बात सुनकर भी उन्हें जवाब नहीं दिया और अपने मन में बात रख ली। यह हमें सिखाता है कि जब हम पर झूठे आरोप लगाए जाएँ, तो हमें धैर्य रखना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए।
  2. अल्लाह ही सच्चा न्याय करने वाला है: जब लोग हमारे बारे में बुरा कहें, तो हमें याद रखना चाहिए कि अल्लाह सब कुछ जानता है और वही सच्चा न्याय करेगा। हमें अपनी पाकीज़गी (पवित्रता) साबित करने के लिए झगड़ने की ज़रूरत नहीं, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
  3. बदनामी और झूठ से बचना: यह आयत हमें सिखाती है कि किसी पर झूठा आरोप लगाना बहुत बड़ा पाप है। हमें हमेशा सच बोलना चाहिए और दूसरों की बदनामी से बचना चाहिए।
  4. अल्लाह की निगरानी का एहसास: जब हमें यह यकीन हो जाए कि अल्लाह हमारे हर काम और हर बात को देख रहा है, तो हम कभी गलत काम नहीं करेंगे और न ही दूसरों के बारे में बुरा बोलेंगे।
  5. क्षमा और दरगुज़र: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों के साथ नरमी बरती और उन्हें तुरंत सज़ा नहीं दी। यह हमें सिखाता है कि दूसरों की गलतियों को माफ करना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना इस्लाम की शिक्षा है।


📜 आयत 75-79 — यूसुफ

75قَالُوا جَزَاؤُهُ مَن وُجِدَ فِي رَحْلِهِ فَهُوَ جَزَاؤُهُ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ
(वे धड़क) बोल उठे कि उसकी सज़ा ये है कि जिसके बोरे में वह (माल) निकले तो वही उसका बदला है (तो वह माल के बदले में ग़ुलाम बना लिया जाए)
76فَبَدَأَ بِأَوْعِيَتِهِمْ قَبْلَ وِعَاءِ أَخِيهِ ثُمَّ اسْتَخْرَجَهَا مِن وِعَاءِ أَخِيهِ ۚ كَذَٰلِكَ كِدْنَا لِيُوسُفَ ۖ مَا كَانَ لِيَأْخُذَ أَخَاهُ فِي دِينِ الْمَلِكِ إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَّن نَّشَاءُ ۗ وَفَوْقَ كُلِّ ذِي عِلْمٍ عَلِيمٌ
हम लोग तो (अपने यहाँ) ज़ालिमों (चोरों) को इसी तरह सज़ा दिया करते हैं ग़रज़ यूसुफ ने अपने भाई का थैला खोलने ने से क़ब्ल दूसरे भाइयों के थैलों से (तलाशी) शुरू की उसके बाद (आख़िर में) उस प्याले को यूसुफ ने अपने भाई के थैले से बरामद किया यूसुफ को भाई के रोकने की हमने यू तदबीर बताइ वरना (बादशाह मिस्र) के क़ानून के मुवाफिक़ अपने भाई को रोक नहीं सकते थे मगर हाँ जब ख़ुदा चाहे हम जिसे चाहते हैं उसके दर्जे बुलन्द कर देते हैं और (दुनिया में) हर साहबे इल्म से बढ़कर एक और आलिम है
77۞ قَالُوا إِن يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ أَخٌ لَّهُ مِن قَبْلُ ۚ فَأَسَرَّهَا يُوسُفُ فِي نَفْسِهِ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ ۚ قَالَ أَنتُمْ شَرٌّ مَّكَانًا ۖ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ
(ग़रज़) इब्ने यामीन रोक लिए गए तो ये लोग कहने लगे अगर उसने चोरी की तो (कौन ताज्जुब है) इसके पहले इसका भाई (यूसुफ) चोरी कर चुका है तो यूसुफ ने (उसका कुछ जवाब न दिया) उसको अपने दिल में पोशीदा (छुपाये) रखा और उन पर ज़ाहिर न होने दिया मगर ये कह दिया कि तुम लोग बड़े ख़ाना ख़राब (बुरे आदमी) हो
78قَالُوا يَا أَيُّهَا الْعَزِيزُ إِنَّ لَهُ أَبًا شَيْخًا كَبِيرًا فَخُذْ أَحَدَنَا مَكَانَهُ ۖ إِنَّا نَرَاكَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
और जो (उसके भाई की चोरी का हाल बयान करते हो ख़ुदा खूब बवाक़िफ है (इस पर) उन लोगों ने कहा ऐ अज़ीज़ उस (इब्ने यामीन) के वालिद बहुत बूढ़े (आदमी) हैं (और इसको बहुत चाहते हैं) तो आप उसके ऐवज़ (बदले) हम में से किसी को ले लीजिए और उसको छोड़ दीजिए
79قَالَ مَعَاذَ اللَّهِ أَن نَّأْخُذَ إِلَّا مَن وَجَدْنَا مَتَاعَنَا عِندَهُ إِنَّا إِذًا لَّظَالِمُونَ
क्योंकि हम आपको बहुत नेको कार बुर्जुग़ समझते हैं यूसुफ ने कहा माज़ अल्लाह (ये क्यों कर हो सकता है कि) हमने जिसकी पास अपनी चीज़ पाई है उसे छोड़कर दूसरे को पकड़ लें (अगर हम ऐसा करें) तो हम ज़रुर बड़े बेइन्साफ ठहरे
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अनुवाद — यूसुफ 77

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Wednesday, August 19, 2026

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