Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- سَوَّلَتْ: सुशोभित किया, सजाया, बहकाया (यहाँ अर्थ है कि तुम्हारे नफ्स ने तुम्हारे लिए इस काम को अच्छा दिखाया)।
- صَبْرٌ جَمِيلٌ: वह सब्र जिसमें कोई शिकायत न हो, न बेचैनी हो, और न ही अल्लाह के फैसले पर कोई आपत्ति हो।
- عَسَى: आशा, उम्मीद (अल्लाह की ओर से आशा का वचन, जो निश्चित रूप से पूरा होने वाला है)।
- الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ: सब कुछ जानने वाला, पूर्ण ज्ञान रखने वाला और अपने सभी कार्यों में पूर्ण तत्वदर्शी, हिकमत वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब याकूब (अलैहिस्सलाम) के बेटे मिस्र से लौटे और उन्होंने अपने पिता को बताया कि बिन्यामीन (उनका छोटा भाई) चोरी के आरोप में पकड़ लिया गया और उनका बड़ा भाई वहीं रुक गया, तो याकूब (अलैहिस्सलाम) ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया। उन्होंने कहा: "यह बात सच नहीं है जैसा तुम कह रहे हो, बल्कि तुम्हारे नफ्सों (अपनी इच्छाओं) ने तुम्हारे लिए एक (बुरी) योजना को सुशोभित कर दिया है, जैसे पहले यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के मामले में भी तुमने किया था।" यानी उन्होंने अपने बेटों पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने कोई चाल चली है, जैसे उन्होंने यूसुफ के साथ किया था।
फिर उन्होंने धैर्य का उल्लेख करते हुए कहा: "तो (मेरे लिए) सब्र ही सबसे अच्छा है" — यानी मैं धैर्य ही अपनाऊँगा, वह सब्र जिसमें कोई शिकायत नहीं होती, न अल्लाह के फैसले पर कोई आपत्ति होती है, और न ही लोगों के सामने रोना-धोना होता है। यह सब्र उनके जीवन का तरीका था, जैसा उन्होंने यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के खोने पर भी किया था।
इसके बाद उन्होंने अल्लाह से आशा जताई: "उम्मीद है कि अल्लाह मेरे तीनों बेटों को — यूसुफ, बिन्यामीन और उनके बड़े भाई को — मेरे पास वापस ले आएगा।" यह उनकी गहरी आस्था और अल्लाह पर भरोसे का प्रमाण है कि उन्होंने निराशा नहीं की, बल्कि अल्लाह की रहमत से पूर्ण मिलन की उम्मीद रखी।
अंत में उन्होंने कहा: "बेशक वही (अल्लाह) सब कुछ जानने वाला है, हिकमत वाला है" — यानी वह मेरी हालत को जानता है, मेरे दिल के दर्द को जानता है, और वह अपने सारे काम हिकमत (बुद्धिमत्ता) के साथ करता है। वह जानता है कि मुझे कब और कैसे राहत देनी है।
फ़ायदे (लाभ):
- सब्र का महत्व: यह आयत हमें सिखाती है कि मुसीबत के समय सब्र करना चाहिए, और वह सब्र जो "जमील" (सुंदर) हो — यानी बिना शिकायत, बिना बेचैनी के। यही सच्चा सब्र है जो अल्लाह के करीब ले जाता है।
- अल्लाह पर भरोसा: याकूब (अलैहिस्सलाम) ने सबसे कठिन समय में भी अल्लाह से उम्मीद नहीं छोड़ी। यह हमें सिखाता है कि चाहे हालात कितने भी बुरे हों, अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
- परिवार में धैर्य और समझदारी: यह आयत हमें सिखाती है कि परिवार के मामलों में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, बल्कि सोच-समझकर और धैर्य के साथ काम लेना चाहिए।
- अल्लाह की हिकमत पर विश्वास: हमें यकीन रखना चाहिए कि अल्लाह जो कुछ भी करता है, हिकमत के साथ करता है। हो सकता है हमें उसकी मर्जी समझ न आए, लेकिन उसमें हमारे लिए भलाई ही होती है।
- दुआ और उम्मीद: याकूब (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह से दुआ की और उम्मीद रखी। यह हमें सिखाता है कि मुसीबत में अल्लाह से ही उम्मीद रखनी चाहिए और उसी से मदद माँगनी चाहिए।
📜 आयत 81-85 — सूरा यूसुफ
अनुवाद — यूसुफ 83
सूरा यूसुफ आयत 83 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ग़रज़ जब उन लोगों ने जाकर बयान किया तो) याक़ूब…सूरा आयत 83/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 81–85. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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