यूसुफ · 84/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا أَسَفَىٰ عَلَىٰ يُوسُفَ وَابْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ الْحُزْنِ فَهُوَ كَظِيمٌ ۝٨٤
Wa tawallaa `anhum wa qaala yaaa asafaa `alaa Yoosufa wabyaddat `aynaahu minal huzni fahuwa kazeem
📖 हिंदी अर्थ
और याक़ूब ने उन लोगों की तरफ से मुँह फेर लिया और (रोकर) कहने लगे हाए अफसोस यूसुफ पर और (इस क़दर रोए कि) उनकी ऑंखें सदमे से सफेद हो गई वह तो बड़े रंज के ज़ाबित (झेलने वाले) थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَوَلَّىٰ عَنْهُمْ: उनसे मुँह मोड़ लिया, उनसे अलग हो गए।
  • يَا أَسَفَىٰ: हाय अफ़सोस! (अत्यधिक दुःख और पछतावे का उद्गार)
  • ابْيَضَّتْ عَيْنَاهُ: उनकी दोनों आँखें सफेद हो गईं (अर्थात् आँखों की पुतलियों की रोशनी चली गई और वे देखने की शक्ति खो बैठीं)।
  • كَظِيمٌ: जो अपने दुःख को भीतर ही भीतर दबाए हुए हो, बाहर प्रकट न करता हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटों से यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के बारे में वह बातें सुनीं जिनसे उनका दिल और अधिक टूट गया, और उन्हें यह अहसास हुआ कि उनके बेटे उन्हें सांत्वना देने के बजाय उनके दुःख को और बढ़ा रहे हैं, तो वे उनसे मुँह मोड़कर अलग हो गए। उनका दिल उस बात से बहुत दुखी था जो उन्होंने सुनी थी।

उस समय उनके मुँह से निकला: "हाय, मेरा अफ़सोस यूसुफ़ पर!" यह शब्द उस गहरे दुःख और विछोह के दर्द को व्यक्त करते हैं जो उनके हृदय में वर्षों से छिपा हुआ था। वे यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की याद में इतने अधिक रोए कि उनकी आँखों की रोशनी चली गई और आँखें सफेद हो गईं—अर्थात् वे देखने की शक्ति से वंचित हो गए। यह दुःख इतना गहरा था कि उसने उनकी आँखों की पुतलियों को ही बदल दिया।

इस सबके बावजूद, वे अपने दुःख को बाहर प्रकट नहीं करते थे। वे "कज़ीम" थे—अर्थात् वे अपने गम को अपने सीने में दबाए हुए थे, किसी के सामने शिकायत या विलाप नहीं करते थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को केवल अपने रब के सामने रखा और सब्र का दामन नहीं छोड़ा। यह उनके धैर्य और दृढ़ इमान की सबसे बड़ी निशानी है।


फ़ायदे (सीख):

  1. सब्र की अज़ीम मिसाल: हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) की यह हालत हमें सिखाती है कि मुसीबत और दुःख में भी इंसान को अपनी ज़बान और अंदाज़ पर क़ाबू रखना चाहिए। उन्होंने दुःख में भी अल्लाह से शिकायत नहीं की, बल्कि अपने दिल का हाल छिपाए रखा।
  2. दुःख में भी अल्लाह से जुड़ाव: यह आयत बताती है कि दुःख और ग़म इंसान की फ़ितरत (स्वभाव) का हिस्सा है, लेकिन मोमिन वह है जो दुःख में भी अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहे और उसी से मदद माँगे।
  3. माता-पिता के दिल का दर्द: यह आयत हमें बच्चों के विछोह में माता-पिता की गहरी मुहब्बत और उनके दिल के दर्द का अहसास कराती है। इससे हमें अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने और उनके दिलों को ठेस पहुँचाने से बचने की सीख मिलती है।
  4. अल्लाह की रहमत की उम्मीद: यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि जब इंसान सब्र करता है और अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो अल्लाह उसे कभी निराश नहीं करता। याक़ूब (अलैहिस्सलाम) का सब्र ही था कि अल्लाह ने उन्हें यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) से मिलाकर उनकी आँखों को फिर से रोशनी दी। इसलिए हमें कभी अल्लाह की रहमत से उम्मीद नहीं खोनी चाहिए।


📜 आयत 82-86 — यूसुफ

82وَاسْأَلِ الْقَرْيَةَ الَّتِي كُنَّا فِيهَا وَالْعِيرَ الَّتِي أَقْبَلْنَا فِيهَا ۖ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ
और आप इस बस्ती (मिस्र) के लोगों से जिसमें हम लोग थे दरयाफ्त कर लीजिए और इस क़ाफले से भी जिसमें आए हैं (पूछ लीजिए) और हम यक़ीनन बिल्कुल सच्चे हैं
83قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًا ۖ فَصَبْرٌ جَمِيلٌ ۖ عَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَنِي بِهِمْ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُ هُوَ الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ
(ग़रज़ जब उन लोगों ने जाकर बयान किया तो) याक़ूब न कहा (उसने चोरी नहीं की) बल्कि ये बात तुमने अपने दिल से गढ़ ली है तो (ख़ैर) सब्र (और ख़ुदा का) शुक्र ख़ुदा से तो (मुझे) उम्मीद है कि मेरे सब (लड़कों) को मेरे पास पहुँचा दे बेशक वह बड़ा वाकिफ़ कार हकीम है
84وَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا أَسَفَىٰ عَلَىٰ يُوسُفَ وَابْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ الْحُزْنِ فَهُوَ كَظِيمٌ
और याक़ूब ने उन लोगों की तरफ से मुँह फेर लिया और (रोकर) कहने लगे हाए अफसोस यूसुफ पर और (इस क़दर रोए कि) उनकी ऑंखें सदमे से सफेद हो गई वह तो बड़े रंज के ज़ाबित (झेलने वाले) थे
85قَالُوا تَاللَّهِ تَفْتَأُ تَذْكُرُ يُوسُفَ حَتَّىٰ تَكُونَ حَرَضًا أَوْ تَكُونَ مِنَ الْهَالِكِينَ
(ये देखकर उनके बेटे) कहने लगे कि आप तो हमेशा यूसुफ को याद ही करते रहिएगा यहाँ तक कि बीमार हो जाएगा या जान ही दे दीजिएगा
86قَالَ إِنَّمَا أَشْكُو بَثِّي وَحُزْنِي إِلَى اللَّهِ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
याक़ूब ने कहा (मै तुमसे कुछ नहीं कहता) मैं तो अपनी बेक़रारी व रंज की शिकायत ख़ुदा ही से करता हूँ और ख़ुदा की तरफ से जो बातें मै जानता हूँ तुम नहीं जानते हो
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अनुवाद — यूसुफ 84

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Tuesday, August 18, 2026

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