अन-नहल · 126/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِّلصَّابِرِينَ ۝١٢٦
Wa in `aaqabtum fa`aaqiboo bimisli maa `ooqibtum bihee wa la`in sabartum lahuwa khairul lissaabireen
📖 हिंदी अर्थ
और हिदायत याफ़ता लोगों से भी खूब वाक़िफ है और अगर (मुख़ालिफीन के साथ) सख्ती करो भी तो वैसी ही सख्ती करो जैसे सख्ती उन लोगों ने तुम पर की थी और अगर तुम सब्र करो तो सब्र करने वालों के वास्ते बेहतर हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَاقَبْتُمْ (अक़ाबतुम): तुम बदला लो, दंड दो।
  • بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِ (बिमिस्लि मा उक़िब्तुम बिही): उसी के बराबर जैसा तुम्हारे साथ किया गया।
  • صَبَرْتُمْ (सबरतुम): तुमने धैर्य दिखाया, सब्र किया।
  • لَهُوَ خَيْرٌ (लहुवा ख़ैर): तो वह (सब्र) बेहतर है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को न्याय और संतुलन का पाठ पढ़ाते हुए फ़रमाता है: अगर तुम किसी ज़ुल्म का बदला लेना चाहो, तो उसी के बराबर लो, जितना तुम पर ज़ुल्म हुआ है। उससे ज़्यादा नहीं बढ़ना चाहिए। यानी बदला लेते समय भी हद से आगे न बढ़ो, क्योंकि ज़ुल्म का जवाब ज़ुल्म से नहीं, बल्कि उतने ही के बराबर दिया जा सकता है जितना तुम्हारे साथ हुआ। यह अल्लाह का आदेश है कि इंसाफ़ की हद तक रहो।

लेकिन इसके बाद अल्लाह तआला बेहतर रास्ता बताता है: "और अगर तुम सब्र करो (यानी बदला लेने की बजाय माफ़ कर दो), तो यह सब्र करने वालों के लिए बेहतर है।" यानी माफ़ कर देना और अल्लाह के लिए दरगुज़र करना, बदला लेने से कहीं ज़्यादा बेहतर है। यह बेहतरी दुनिया में भी है (क्योंकि इससे दिल साफ़ रहता है और अल्लाह की मदद नसीब होती है) और आख़िरत में भी (क्योंकि इसका अज्र अल्लाह के पास महान है)।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इंसाफ़ और न्याय इस्लाम की बुनियाद है। बदला लेते समय भी हद से आगे बढ़ना जायज़ नहीं।
  2. माफ़ी और दरगुज़र करना सबसे बड़ा गुण है। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो गुस्से पर क़ाबू रखते हैं और माफ़ कर देते हैं।
  3. सब्र का इनाम अल्लाह के पास बहुत बड़ा है। दुनिया में भी सब्र करने वाले को इज़्ज़त मिलती है और आख़िरत में भी।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि मुसलमान को हमेशा संतुलन और नर्मी का रास्ता अपनाना चाहिए, चाहे दुश्मन से भी पेश आना पड़े।
  5. इस्लाम जहाँ ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने की ताक़त देता है, वहीं माफ़ी और सब्र की फ़ज़ीलत भी सिखाता है — यही इस्लाम की खूबसूरती है।


📜 आयत 124-128 — अन-नहल

124إِنَّمَا جُعِلَ السَّبْتُ عَلَى الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
(ऐ रसूल) हफ्ते (के दिन) की ताज़ीम तो बस उन्हीं लोगों पर लाज़िम की गई थी (यहूद व नसारा इसके बारे में) एख्तिलाफ करते थे और कुछ शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार उनके दरमियान जिस अग्र में वह झगड़ा करते थे क़यामत के दिन फैसला कर देगा
125ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ ۖ وَجَادِلْهُم بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है
126وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِّلصَّابِرِينَ
और हिदायत याफ़ता लोगों से भी खूब वाक़िफ है और अगर (मुख़ालिफीन के साथ) सख्ती करो भी तो वैसी ही सख्ती करो जैसे सख्ती उन लोगों ने तुम पर की थी और अगर तुम सब्र करो तो सब्र करने वालों के वास्ते बेहतर हैं
127وَاصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِي ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र ही करो (और ख़ुदा की (मदद) बग़ैर तो तुम सब्र कर भी नहीं सकते और उन मुख़ालिफीन के हाल पर तुम रंज न करो और जो मक्कारीयाँ ये लोग करते हैं उससे तुम तंग दिल न हो
128إِنَّ اللَّهَ مَعَ الَّذِينَ اتَّقَوا وَّالَّذِينَ هُم مُّحْسِنُونَ
जो लोग परहेज़गार हैं और जो लोग नेको कार हैं ख़ुदा उनका साथी है
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अनुवाद — अन-नहल 126

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Tuesday, August 18, 2026

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