अन-नहल · 127/128
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नहल
وَاصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِي ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ ۝١٢٧
Wasbir wa maa sabruka illaa billaah; wa laa tahzan `alaihim wa laa taku fee daiqim mimmaa yamkuroon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र ही करो (और ख़ुदा की (मदद) बग़ैर तो तुम सब्र कर भी नहीं सकते और उन मुख़ालिफीन के हाल पर तुम रंज न करो और जो मक्कारीयाँ ये लोग करते हैं उससे तुम तंग दिल न हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَاصْبِرْ: धैर्य रखें, सब्र करें।
  • صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ: आपका धैर्य अल्लाह ही की मदद और तौफ़ीक़ से है।
  • وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ: उन (काफ़िरों) के कारण दुखी न हों।
  • ضَيْقٍ: तंगी, संकट, मन की बेचैनी।
  • يَمْكُرُونَ: वे चालें चलते हैं, धोखा और कपट करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! आप धैर्य और सब्र को अपनाएँ, चाहे आपको अल्लाह के मार्ग में कितनी भी तकलीफ़ें और मुश्किलें क्यों न उठानी पड़ें। याद रखें कि आपका सब्र आपके अपने बूते पर नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह अल्लाह की मदद और उसकी तौफ़ीक़ से है। वही आपको सब्र की ताक़त देता है और आपके दिल को मज़बूत करता है। इसलिए आपको चाहिए कि उसी से मदद माँगें और उसी पर भरोसा रखें।

फिर अल्लाह तआला आपको तसल्ली देते हुए फ़रमाता है कि जो लोग आपकी दावत को नहीं मानते और ईमान नहीं लाते, उनके हाल पर आप दुखी और उदास न हों। आपने अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया है, हिदायत देना आपका काम नहीं, बल्कि अल्लाह के हाथ में है। और जो लोग आपके खिलाफ़ चालें चल रहे हैं, आपके दीन को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं और तरह-तरह की साज़िशें कर रहे हैं, उनकी इन मक्कारियों से आपका दिल तंग और बेचैन न हो। क्योंकि उनकी ये सारी चालें आख़िरकार उन्हीं पर उलटकर आएँगी और उन्हीं के लिए बर्बादी और अज़ाब का सबब बनेंगी। अल्लाह उनकी साज़िशों से आपकी हिफ़ाज़त करेगा और आपको कामयाबी देगा।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. सब्र अल्लाह की मदद से आता है: यह आयत हमें सिखाती है कि सब्र करना कोई आसान काम नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की ख़ास मदद से ही मुमकिन है। इसलिए जब भी हम किसी मुश्किल में हों, तो अल्लाह से सब्र की दुआ करें और उसी से मदद माँगें।
  2. निराशा और उदासी से बचें: जब हमारी कोई अच्छी कोशिश नाकाम हो जाए या लोग हमारी बात न मानें, तो हमें दुखी और उदास नहीं होना चाहिए। हमारा काम कोशिश करना है, नतीजा अल्लाह के हाथ में है। यही सोच हमें निराशा से बचाती है।
  3. दुश्मनों की चालों से घबराएँ नहीं: जो लोग हमारे खिलाफ़ साज़िशें करते हैं, उनकी चालों से हमें डरना या बेचैन नहीं होना चाहिए। अल्लाह अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है और उनकी साज़िशें उन्हीं पर भारी पड़ती हैं। यह विश्वास हमें मन की शांति देता है।
  4. अल्लाह पर भरोसा: यह आयत हमें सिखाती है कि हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखें। वही हमारा सहारा है, वही हमें ताक़त देता है और वही हमारे दुश्मनों से हमारी रक्षा करता है। जिसे अल्लाह का भरोसा हो, वह कभी अकेला और कमज़ोर नहीं होता।


📜 आयत 125-128 — सूरा अन-नहल

125ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ ۖ وَجَادِلْهُم بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है
126وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِّلصَّابِرِينَ
और हिदायत याफ़ता लोगों से भी खूब वाक़िफ है और अगर (मुख़ालिफीन के साथ) सख्ती करो भी तो वैसी ही सख्ती करो जैसे सख्ती उन लोगों ने तुम पर की थी और अगर तुम सब्र करो तो सब्र करने वालों के वास्ते बेहतर हैं
127وَاصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِي ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र ही करो (और ख़ुदा की (मदद) बग़ैर तो तुम सब्र कर भी नहीं सकते और उन मुख़ालिफीन के हाल पर तुम रंज न करो और जो मक्कारीयाँ ये लोग करते हैं उससे तुम तंग दिल न हो
128إِنَّ اللَّهَ مَعَ الَّذِينَ اتَّقَوا وَّالَّذِينَ هُم مُّحْسِنُونَ
जो लोग परहेज़गार हैं और जो लोग नेको कार हैं ख़ुदा उनका साथी है
अन-नहलकुरान सूची
128आयत
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127आयत

अनुवाद — अन-नहल 127

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Saturday, October 3, 2026

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