अन-नहल · 56/128
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नहल
وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِّمَّا رَزَقْنَاهُمْ ۗ تَاللَّهِ لَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ ۝٥٦
Wa yaj`aloona limaa laa ya`lamoona naseebam mimmaa razaqnnaahum; tallaahi latus`alunaa `ammaa kuntum taftaroon
📖 हिंदी अर्थ
और हमने जो रोज़ी उनको दी है उसमें से ये लोग उन बुतों का हिस्सा भी क़रार देते है जिनकी हक़ीकत नहीं जानते तो ख़ुदा की (अपनी) क़िस्म जो इफ़तेरा परदाज़ियाँ तुम करते थे (क़यामत में) उनकी बाज़पुर्स (पूछ गछ) तुम से ज़रुर की जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِمَا لَا يَعْلَمُونَ: उन चीज़ों के लिए जिन्हें वे नहीं जानते, अर्थात् निर्जीव मूर्तियाँ जिन्हें वे पूजते हैं।
  • نَصِيبًا: एक हिस्सा या भाग।
  • تَفْتَرُونَ: झूठ गढ़ना, अल्लाह पर झूठा आरोप लगाना।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला मुशरिकीन (बहुदेववादियों) के उस कुकर्म का वर्णन कर रहा है, जो उनकी अज्ञानता और गुमराही की पराकाष्ठा को दर्शाता है। वे लोग अपनी फ़सलों, जानवरों और धन-दौलत में से एक हिस्सा उन मूर्तियों के लिए निकालते थे, जिनके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते थे। ये मूर्तियाँ न तो कुछ जानती हैं, न सुनती हैं, न देखती हैं, और न ही किसी को कोई लाभ या हानि पहुँचा सकती हैं। वे इन निर्जीव पत्थरों को अल्लाह का भागीदार ठहराते थे और अपनी रोज़ी में से इनका हिस्सा निकालकर इनके करीब होने का दावा करते थे, जबकि यह सब कुछ अल्लाह ही की दी हुई रोज़ी थी।

अल्लाह तआला इस पर क़सम खाकर फ़रमाता है कि क़ियामत के दिन उन सबसे ज़रूर पूछा जाएगा कि तुमने ये झूठ क्यों गढ़े थे? तुमने मेरे साथ ऐसे साझी क्यों ठहराए जिनका कोई वजूद ही नहीं? तुमने मेरी दी हुई नेमतों में से उन मूर्तियों का हिस्सा क्यों निकाला? यह पूछताछ क़ियामत के दिन अत्यंत कठोर होगी, और उस दिन कोई बहाना या सफ़ाई काम नहीं आएगी।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह तआला की दी हुई हर नेमत का हिसाब देना है। जो व्यक्ति अल्लाह की नेमतों को उसकी नाफ़रमानी में खर्च करता है, वह क़ियामत के दिन ज़रूर पकड़ा जाएगा।
  2. अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना (शिर्क) सबसे बड़ा ज़ुल्म और झूठ है, क्योंकि यह अल्लाह की बेअदबी और उसकी क़ुदरत पर एतराज़ है।
  3. इंसान को चाहिए कि अपनी रोज़ी और माल को अल्लाह की राह में खर्च करे, न कि उन चीज़ों पर जो न तो फ़ायदा पहुँचा सकें और न नुक़सान।
  4. यह आयत मुसलमानों को तौहीद (एकेश्वरवाद) की तरफ़ बुलाती है और उन्हें सिखाती है कि अपनी सारी इबादत और नेमतें सिर्फ़ अल्लाह के लिए हों।
  5. क़ियामत का दिन हक़ और बातिल के बीच फ़ैसले का दिन है, जहाँ हर झूठ और हर ग़लत अक़ीदे का पर्दाफ़ाश होगा।


📜 आयत 54-58 — सूरा अन-नहल

54ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब वह तुमसे तकलीफ को दूर कर देता है तो बस फौरन तुममें से कुछ लोग अपने परवरदिगार को शरीक ठहराते हैं
55لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उनको दी है उनकी नाशुक्री करें तो (ख़ैर दुनिया में चन्द रोज़ चैन कर लो फिर तो अनक़रीब तुमको मालूम हो जाएगा
56وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِّمَّا رَزَقْنَاهُمْ ۗ تَاللَّهِ لَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ
और हमने जो रोज़ी उनको दी है उसमें से ये लोग उन बुतों का हिस्सा भी क़रार देते है जिनकी हक़ीकत नहीं जानते तो ख़ुदा की (अपनी) क़िस्म जो इफ़तेरा परदाज़ियाँ तुम करते थे (क़यामत में) उनकी बाज़पुर्स (पूछ गछ) तुम से ज़रुर की जाएगी
57وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ الْبَنَاتِ سُبْحَانَهُ ۙ وَلَهُم مَّا يَشْتَهُونَ
और ये लोग ख़ुदा के लिए बेटियाँ तजवीज़ करते हैं (सुबान अल्लाह) वह उस से पाक व पाकीज़ा है
58وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِالْأُنثَىٰ ظَلَّ وَجْهُهُ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ
और अपने लिए (बेटे) जो मरग़ूब (दिल पसन्द) हैं और जब उसमें से किसी एक को लड़की पैदा होने की जो खुशख़बरी दीजिए रंज के मारे मुँह काला हो जाता है
अन-नहलकुरान सूची
128आयत
मक्कीअवतरण स्थान
56आयत

अनुवाद — अन-नहल 56

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Friday, October 2, 2026

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