अन-नहल · 55/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۝٥٥
Liyakfuroo bimaa aatainaahum; fatamatta`oo, faswfa ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उनको दी है उनकी नाशुक्री करें तो (ख़ैर दुनिया में चन्द रोज़ चैन कर लो फिर तो अनक़रीब तुमको मालूम हो जाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِيَكْفُرُوا: ताकि वे कृतघ्नता करें / इनकार करें
  • بِمَا آتَيْنَاهُمْ: उस (नियामत) के साथ जो हमने उन्हें दी
  • فَتَمَتَّعُوا: तो तुम मज़े कर लो (धमकी का अंदाज़)
  • فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ: तो शीघ्र ही तुम जान लोगे (अंजाम)

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत उन लोगों के हाल का वर्णन कर रही है जो मुसीबत में अल्लाह को पुकारते हैं, लेकिन जब अल्लाह उनकी मुसीबत दूर कर देता है और उन्हें राहत व आराम देता है, तो वे उसी अल्लाह का शुक्र अदा करने के बजाय उसकी नियामतों का इनकार करने लगते हैं। वे अपने उद्धार का श्रेय अल्लाह को न देकर अपने झूठे देवताओं या अपनी तदबीर को देते हैं, और इस तरह वे उन नेअमतों के प्रति कृतघ्नता का व्यवहार करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान कीं।

यहाँ अल्लाह तआला उन्हें धमकी के अंदाज़ में कहता है: "तो तुम अपनी दुनियावी ज़िंदगी के मज़े ले लो, खाओ-पियो और मौज-मस्ती कर लो, क्योंकि यह सब कुछ फ़ानी है और जल्द ही खत्म होने वाला है।" यह कोई इजाज़त नहीं, बल्कि एक तरह की चेतावनी है कि उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दिया गया है। फिर अल्लाह फ़रमाता है: "फिर तुम्हें बहुत जल्द यह जान लेना है कि इस कृतघ्नता और इनकार का अंजाम क्या होगा।" यह वादा उनके लिए अज़ाब और सज़ा की खबर है — चाहे वह दुनिया में आए या आख़िरत में।


फ़ायदे और सबक़:

  1. शुक्र अदा करना ईमान की निशानी है — जो व्यक्ति अल्लाह की नेअमतों को पहचानता है और उनका शुक्र अदा करता है, वही सच्चा मोमिन है। कृतघ्नता इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देती है।
  2. मुसीबत में पुकारना और राहत के बाद भूल जाना मुनाफ़िक़ों की आदत है — सच्चा इंसान वह है जो सुख-दुख दोनों हालात में अल्लाह को याद रखे।
  3. दुनिया की चंद रोज़ा खुशियाँ धोखा हैं — यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की मोहलत और आराम किसी की भलाई की निशानी नहीं, बल्कि यह अल्लाह की ओर से ढील हो सकती है। असली कामयाबी आख़िरत की कामयाबी है।
  4. अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है — जो लोग नेअमतों का इनकार करते हैं और सरकशी पर उतर आते हैं, उन्हें अल्लाह की सज़ा से कोई नहीं बचा सकता। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह हर हाल में अल्लाह का शुक्रगुज़ार रहे और उसकी नेअमतों को अपने ऊपर तवज्जो देकर उनका सही इस्तेमाल करे।
  5. तौबा का दरवाज़ा खुला है — यह आयत धमकी के साथ-साथ एक संकेत भी देती है कि जब तक मौत न आए, इंसान को अपनी गलतियों से बाज़ आकर अल्लाह की तरफ रुजू कर लेना चाहिए, क्योंकि अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दयालु है।


📜 आयत 53-57 — अन-नहल

53وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ
और जितनी नेअमतें तुम्हारे साथ हैं (सब ही की तरफ से हैं) फिर जब तुमको तकलीफ छू भी गई तो तुम उसी के आगे फरियाद करने लगते हो
54ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब वह तुमसे तकलीफ को दूर कर देता है तो बस फौरन तुममें से कुछ लोग अपने परवरदिगार को शरीक ठहराते हैं
55لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उनको दी है उनकी नाशुक्री करें तो (ख़ैर दुनिया में चन्द रोज़ चैन कर लो फिर तो अनक़रीब तुमको मालूम हो जाएगा
56وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِّمَّا رَزَقْنَاهُمْ ۗ تَاللَّهِ لَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ
और हमने जो रोज़ी उनको दी है उसमें से ये लोग उन बुतों का हिस्सा भी क़रार देते है जिनकी हक़ीकत नहीं जानते तो ख़ुदा की (अपनी) क़िस्म जो इफ़तेरा परदाज़ियाँ तुम करते थे (क़यामत में) उनकी बाज़पुर्स (पूछ गछ) तुम से ज़रुर की जाएगी
57وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ الْبَنَاتِ سُبْحَانَهُ ۙ وَلَهُم مَّا يَشْتَهُونَ
और ये लोग ख़ुदा के लिए बेटियाँ तजवीज़ करते हैं (सुबान अल्लाह) वह उस से पाक व पाकीज़ा है
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अनुवाद — अन-नहल 55

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Tuesday, August 18, 2026

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