अन-नहल · 71/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَاللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ فِي الرِّزْقِ ۚ فَمَا الَّذِينَ فُضِّلُوا بِرَادِّي رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَاءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ ۝٧١
Wallaahu faddala ba`dakum `alaa ba`din fir rizq; famal lazeena fuddiloo biraaaddee rizqihim `alaa maa malakat aimaanuhum fahum feehi sawaaa`; afabini`matil laahi yajhadoon
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा ही ने तुममें से बाज़ को बाज़ पर रिज़क (दौलत में) तरजीह दी है फिर जिन लोगों को रोज़ी ज्यादा दी गई है वह लोग अपनी रोज़ी में से उन लोगों को जिन पर उनका दस्तरस (इख्तेयार) है (लौन्डी ग़ुलाम वग़ैरह) देने वाला नहीं (हालॉकि इस माल में तो सब के सब मालिक गुलाम वग़ैरह) बराबर हैं तो क्या ये लोग ख़ुदा की नेअमत के मुन्किर हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَضَّلَ: श्रेष्ठ बनाया, अधिक दिया
  • الرِّزْق: आजीविका, धन-संपत्ति
  • مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ: जिन पर उनके स्वामित्व का अधिकार है (दास-दासियाँ)
  • سَوَاء: बराबर, समान
  • يَجْحَدُونَ: इनकार करते हैं, अस्वीकार करते हैं

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपनी असीम कृपा और बुद्धिमत्ता से लोगों को आजीविका (रोज़ी) में एक-दूसरे पर श्रेष्ठता प्रदान की है। किसी को धन-दौलत से नवाज़ा, किसी को सीमित साधन दिए। कोई मालिक है तो कोई उसके अधीन। यह विभाजन अल्लाह की ओर से है, जो उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) पर आधारित है।

अब अल्लाह तआला एक तर्कपूर्ण प्रश्न उठाते हैं: जिन लोगों को अल्लाह ने धन दिया है, क्या वे अपने दासों (अधीनस्थों) को अपनी संपत्ति में से इतना देते हैं कि वे उनके बराबर के साझीदार बन जाएँ? कदापि नहीं! कोई भी मालिक अपने दास को अपने धन में बराबर का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता। जब मनुष्य स्वयं अपने अधीनस्थों के साथ बराबरी स्वीकार नहीं करता, तो वह अल्लाह के साथ उसकी सृष्टि में से किसी को साझीदार कैसे बना सकता है?

यह एक स्पष्ट और सरल तर्क है — यदि तुम अपने दासों को अपने बराबर नहीं मानते, तो तुम अल्लाह के साथ उसके बंदों को शरीक (साझीदार) कैसे ठहराते हो? यह अत्यंत अन्याय और अल्लाह की नेमतों की सबसे बड़ी नाशुक्री है। अल्लाह ने तुम्हें धन, स्वास्थ्य, परिवार, और असंख्य नेमतें दीं, लेकिन तुम उसकी इबादत के बजाय दूसरों की पूजा करते हो — यह कैसा जहालत भरा व्यवहार है!

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह की रज़ा पर संतोष: रोज़ी में फ़र्क़ अल्लाह की ओर से है। जिसे कम मिला है उसे निराश नहीं होना चाहिए, और जिसे अधिक मिला है उसे घमंड नहीं करना चाहिए। यह अल्लाह की परीक्षा है।
  2. तौहीद (एकेश्वरवाद) का स्पष्ट प्रमाण: यह आयत शिर्क (बहुदेववाद) की मूर्खता को उजागर करती है। जब मनुष्य अपने दासों को अपने बराबर नहीं मानता, तो वह अल्लाह के साथ किसी को बराबर कैसे ठहरा सकता है?
  3. नेमतों की क़द्र: अल्लाह की हर नेमत उसकी ओर से है। उन्हें पहचानना और उनका सही उपयोग करना ही कृतज्ञता है। नेमतों से मुँह मोड़ना और उन्हें अस्वीकार करना सबसे बड़ी नादानी है।
  4. सामाजिक व्यवस्था में संतुलन: इस आयत से यह भी शिक्षा मिलती है कि समाज में धन का उचित वितरण और अधीनस्थों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। इस्लाम दासों के साथ अच्छे व्यवहार और उनकी आज़ादी को प्रोत्साहित करता है।
  5. अल्लाह की महानता का अहसास: जब हम अपने जीवन में अल्लाह की नेमतों को देखते हैं — चाहे वह छोटी हों या बड़ी — तो हमारा दिल उसकी महानता और कृपा के आगे झुक जाता है, और हम उसकी इबादत में सच्चे हो जाते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 69-73 — अन-नहल

69ثُمَّ كُلِي مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ فَاسْلُكِي سُبُلَ رَبِّكِ ذُلُلًا ۚ يَخْرُجُ مِن بُطُونِهَا شَرَابٌ مُّخْتَلِفٌ أَلْوَانُهُ فِيهِ شِفَاءٌ لِّلنَّاسِ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ
उनमें अपने छत्ते बना फिर हर तरह के फलों (के पूर से) (उनका अर्क़) चूस कर फिर अपने परवरदिगार की राहों में ताबेदारी के साथ चली मक्खियों के पेट से पीने की एक चीज़ निकलती है (शहद) जिसके मुख्तलिफ रंग होते हैं इसमें लोगों (के बीमारियों) की शिफ़ा (भी) है इसमें शक़ नहीं कि इसमें ग़ौर व फ़िक्र करने वालों के वास्ते (क़ुदरते ख़ुदा की बहुत बड़ी निशानी है)
70وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ ثُمَّ يَتَوَفَّاكُمْ ۚ وَمِنكُم مَّن يُرَدُّ إِلَىٰ أَرْذَلِ الْعُمُرِ لِكَيْ لَا يَعْلَمَ بَعْدَ عِلْمٍ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ قَدِيرٌ
और ख़ुदा ही ने तुमको पैदा किया फिर वही तुमको (दुनिया से) उठा लेगा और तुममें से बाज़ ऐसे भी हैं जो ज़लील ज़िन्दगी (सख्त बुढ़ापे) की तरफ लौटाए जाते हैं (बहुत कुछ) जानने के बाद (ऐसे सड़ीले हो गए कि) कुछ नहीं जान सके बेशक ख़ुदा (सब कुछ) जानता और (हर तरह की) कुदरत रखता है
71وَاللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ فِي الرِّزْقِ ۚ فَمَا الَّذِينَ فُضِّلُوا بِرَادِّي رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَاءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ
और ख़ुदा ही ने तुममें से बाज़ को बाज़ पर रिज़क (दौलत में) तरजीह दी है फिर जिन लोगों को रोज़ी ज्यादा दी गई है वह लोग अपनी रोज़ी में से उन लोगों को जिन पर उनका दस्तरस (इख्तेयार) है (लौन्डी ग़ुलाम वग़ैरह) देने वाला नहीं (हालॉकि इस माल में तो सब के सब मालिक गुलाम वग़ैरह) बराबर हैं तो क्या ये लोग ख़ुदा की नेअमत के मुन्किर हैं
72وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجًا وَجَعَلَ لَكُم مِّنْ أَزْوَاجِكُم بَنِينَ وَحَفَدَةً وَرَزَقَكُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ ۚ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَتِ اللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ
और ख़ुदा ही ने तुम्हारे लिए बीबियाँ तुम ही में से बनाई और उसी ने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी बीवियों से बेटे और पोते पैदा किए और तुम्हें पाक व पाकीज़ा रोज़ी खाने को दी तो क्या ये लोग बिल्कुल बातिल (सुल्तान बुत वग़ैरह) पर ईमान रखते हैं और ख़ुदा की नेअमत (वहदानियत वग़ैरह से) इन्कार करते हैं
73وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًا مِّنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ شَيْئًا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ
और ख़ुदा को छोड़कर ऐसी चीज़ की परसतिश करते हैं जो आसमानों और ज़मीन में से उनको रिज़क़ देने का कुछ भी न एख्तियार रखते हैं और न कुदरत हासिल कर सकते हैं
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अनुवाद — अन-नहल 71

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Tuesday, August 18, 2026

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