فَلَا تَضْرِبُوا لِلَّهِ الْأَمْثَالَ: अल्लाह के लिए मिसालें मत बनाओ, यानी उसकी किसी से समानता मत जताओ।
إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ: निस्संदेह अल्लाह जानता है।
وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ: और तुम नहीं जानते।
विस्तृत व्याख्या:
अल्लाह तआला अपने बंदों को संबोधित करते हुए फरमाता है कि जब तुमने यह जान लिया कि ये मूर्तियाँ और देवता न तो कोई लाभ पहुँचा सकती हैं और न ही कोई हानि, तो अब अल्लाह के लिए मिसालें मत बनाओ। यानी उसकी मख़लूक़ात (सृष्टि) में से किसी को उसका समकक्ष या साझीदार मत ठहराओ, और न ही उसकी उपासना में किसी और को शामिल करो। अल्लाह की कोई समानता नहीं, कोई उसका जोड़ा नहीं, और न ही कोई उसके बराबर है। वह अपने सिफ़ात (गुणों) में जलाल और कमाल का मालिक है, जिसे वह अच्छी तरह जानता है, लेकिन तुम अपनी नासमझी और अज्ञानता के कारण उसकी मिसालें बनाते हो और उसे अपनी मूर्तियों के समान ठहराते हो। अल्लाह तआला हर चीज़ का ज्ञान रखता है, वह जानता है कि उसका कोई समकक्ष नहीं, जबकि तुम इस हक़ीक़त से बेख़बर हो। तुम अपनी ग़लती और उसके बुरे अंजाम से अनजान हो, इसलिए अपने इस शिर्क और ग़लत क़ियास से बाज़ आओ।
महत्वपूर्ण शिक्षाएँ और लाभ:
अल्लाह तआला अपनी सृष्टि में किसी के समान नहीं है, और उसके लिए किसी भी प्रकार की मिसाल या समानता स्थापित करना शिर्क है, जो सबसे बड़ा पाप है।
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के बारे में केवल वही बात कहनी चाहिए जो उसने स्वयं अपने बारे में बताई है, और उसके नामों और गुणों में किसी को उसका साझी नहीं बनाना चाहिए।
अल्लाह का ज्ञान असीमित है, जबकि इंसान का ज्ञान सीमित है। इसलिए हमें अपनी सीमित समझ के आधार पर अल्लाह के बारे में राय नहीं बनानी चाहिए, बल्कि उसकी वही तारीफ़ करनी चाहिए जो उसने खुद की है।
यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की पुख्ता नींव रखती है और इंसान को उसके रब की ओर लौटने की प्रेरणा देती है, क्योंकि सच्ची इबादत तो उसी की है जो सब कुछ जानता है और जिसका कोई समकक्ष नहीं।
इस आयत में इंसान के लिए बड़ी नसीहत है कि वह अपने ज्ञान पर घमंड न करे, बल्कि अल्लाह के ज्ञान के आगे सर झुकाए और उसकी बताई हिदायत पर चले, ताकि दुनिया और आख़िरत में कामयाब हो सके।
और ख़ुदा ही ने तुम्हारे लिए बीबियाँ तुम ही में से बनाई और उसी ने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी बीवियों से बेटे और पोते पैदा किए और तुम्हें पाक व पाकीज़ा रोज़ी खाने को दी तो क्या ये लोग बिल्कुल बातिल (सुल्तान बुत वग़ैरह) पर ईमान रखते हैं और ख़ुदा की नेअमत (वहदानियत वग़ैरह से) इन्कार करते हैं
एक मसल ख़ुदा ने बयान फरमाई कि एक ग़ुलाम है जो दूसरे के कब्जे में है (और) कुछ भी एख्तियार नहीं रखता और एक शख़्श वह है कि हमने उसे अपनी बारगाह से अच्छी (खासी) रोज़ी दे रखी है तो वह उसमें से छिपा के दिखा के (ग़रज़ हर तरह ख़ुदा की राह में) ख़र्च करता है क्या ये दोनो बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं) अल्हमदोलिल्लाह (कि वह भी उसके मुक़र्रर हैं) मगर उनके बहुतेरे (इतना भी) नहीं जानते
और ख़ुदा एक दूसरी मसल बयान फरमाता है दो आदमी हैं कि एक उनमें से बिल्कुल गूँगा उस पर गुलाम जो कुछ भी (बात वग़ैरह की) कुदरत नहीं रखता और (इस वजह से) वह अपने मालिक को दूभर हो रहा है कि उसको जिधर भेजता है (ख़ैर से) कभी भलाई नहीं लाता क्या ऐसा ग़ुलाम और वह शख़्श जो (लोगों को) अदल व मियाना रवी का हुक्म करता है वह खुद भी ठीक सीधी राह पर क़ायम है (दोनों बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं)
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