अल-इसरा · 71/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ ۖ فَمَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَأُولَٰئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَابَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا ۝٧١
Yawma nad`oo kulla unaasim bi imaamihim faman ootiya kitaabahoo bi yameenihee fa ulaaa`ika yaqra`oona kitaabahum wa laa yuzlamoona fateelaa
📖 हिंदी अर्थ
उस दिन (को याद करो) जब हम तमाम लोगों को उन पेशवाओं के साथ बुलाएँगें तो जिसका नामए अमल उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह लोग (खुश खुश) अपना नामए अमल पढ़ने लगेगें और उन पर रेशा बराबर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بِإِمَامِهِمْ: उनके इमाम (नेता/पैगम्बर) के साथ।
  • فَتِيلًا: खजूर की गुठली के खांचे में लगा हुआ बारीक धागा (रेशा) — अत्यंत सूक्ष्म मात्रा।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! उस दिन को याद करो और लोगों को उससे सावधान करो, जब अल्लाह तआला हर समुदाय को उसके इमाम (नेता) के साथ बुलाएगा। यानी हर गिरोह उसी के साथ उठेगा जिसका उसने दुनिया में अनुसरण किया था — चाहे वह नेक हो या बदकार। जो लोग दुनिया में नेक इमामों (पैगम्बरों और सच्चे रहनुमाओं) की पैरवी करते थे, वे उन्हीं के साथ होंगे, और जिन्होंने गुमराह करने वालों की राह अपनाई थी, वे उन्हीं के साथ उठेंगे।

फिर अल्लाह फरमाता है कि जिस किसी को उसका आमालनामा (कर्मों की पुस्तक) दाहिने हाथ में दिया जाएगा — और ये वे लोग होंगे जो दुनिया में ईमान और नेक कर्मों पर कायम रहे — तो वे अपना नामा-ए-आमाल खुशी और उल्लास के साथ पढ़ेंगे। उनके चेहरे खिले होंगे, उनके दिल ममनून होंगे, और वे अपनी नेकियों को देखकर खुशी से झूम उठेंगे। अल्लाह तआला उन्हें उनके अच्छे कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा और उनके सवाब में रत्ती भर भी कमी नहीं की जाएगी — चाहे वह कमी खजूर की गुठली के खांचे के उस बारीक रेशे के बराबर ही क्यों न हो। यानी अल्लाह की रहमत और अद्ल ऐसा है कि उसकी ओर से किसी नेकी का अणु भी ज़ाइया नहीं होता।

यहाँ अल्लाह तआला ने बदकारों का ज़िक्र नहीं किया, क्योंकि उनका हाल उससे भी बदतर है — वे अपने आमालनामे को बाएँ हाथ में पाएँगे और उसमें लिखी बुराइयों को पढ़कर शर्म और खौफ से सिर झुका लेंगे। यह अल्लाह का सबसे बड़ा इन्साफ़ है कि हर इंसान को उसके किए का फल मिलेगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बताती है कि हमारी कामयाबी इस बात में है कि हम अपने इमाम — यानी हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ — की पैरवी करें। जो आज उनके बताए रास्ते पर चलेगा, कल क़यामत के दिन उसे उन्हीं के साथ उठाया जाएगा और उसका आमालनामा दाहिने हाथ में होगा। यह कितनी बड़ी खुशखबरी है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को उनकी छोटी-से-छोटी नेकी का भी पूरा अज्र देगा और उन पर ज़ुल्म नहीं करेगा। तो आइए, हम अपनी ज़िंदगी को नबी ﷺ की सुन्नत के अनुसार ढालें, ताकि उस दिन हमारा चेहरा खिला हुआ हो और हमारा नामा-ए-आमाल हमारे दाहिने हाथ में हो। अल्लाह हमें इस तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।



📜 आयत 69-73 — सूरा अल-इसरा

69أَمْ أَمِنتُمْ أَن يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَىٰ فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًا مِّنَ الرِّيحِ فَيُغْرِقَكُم بِمَا كَفَرْتُمْ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا
या तुमको इसका भी इत्मेनान हो गया कि फिर तुमको दोबारा इसी समन्दर में ले जाएगा उसके बाद हवा का एक ऐसा झोका जो (जहाज़ के) परख़चे उड़ा दे तुम पर भेजे फिर तुम्हें तुम्हारे कुफ्र की सज़ा में डुबा मारे फिर तुम किसी को (ऐसा हिमायती) न पाओगे जो हमारा पीछा करे और (तुम्हें छोड़ा जाए)
70۞ وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ وَحَمَلْنَاهُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًا
और हमने यक़ीनन आदम की औलाद को इज्ज़त दी और खुश्की और तरी में उनको (जानवरों कश्तियों के ज़रिए) लिए लिए फिरे और उन्हें अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी और अपने बहुतेरे मख़लूक़ात पर उनको अच्छी ख़ासी फज़ीलत दी
71يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ ۖ فَمَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَأُولَٰئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَابَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا
उस दिन (को याद करो) जब हम तमाम लोगों को उन पेशवाओं के साथ बुलाएँगें तो जिसका नामए अमल उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह लोग (खुश खुश) अपना नामए अमल पढ़ने लगेगें और उन पर रेशा बराबर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
72وَمَن كَانَ فِي هَٰذِهِ أَعْمَىٰ فَهُوَ فِي الْآخِرَةِ أَعْمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلًا
और जो शख़्श इस (दुनिया) में (जान बूझकर) अंधा बना रहा तो वह आख़िरत में भी अंधा ही रहेगा और (नजात) के रास्ते से बहुत दूर भटका सा हुआ
73وَإِن كَادُوا لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ لِتَفْتَرِيَ عَلَيْنَا غَيْرَهُ ۖ وَإِذًا لَّاتَّخَذُوكَ خَلِيلًا
और (ऐ रसूल) हमने तो (क़ुरान) तुम्हारे पास 'वही' के ज़रिए भेजा अगर चे लोग तो तुम्हें इससे बहकाने ही लगे थे ताकि तुम क़ुरान के अलावा फिर (दूसरी बातों का) इफ़तेरा बाँधों और (जब तुम ये कर गुज़रते उस वक्त ये लोग तुम को अपना सच्चा दोस्त बना लेते
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
71आयत

अनुवाद — अल-इसरा 71

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Thursday, October 1, 2026

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