अल-इसरा · 72/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
وَمَن كَانَ فِي هَٰذِهِ أَعْمَىٰ فَهُوَ فِي الْآخِرَةِ أَعْمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلًا ۝٧٢
Wa man kaana fee haaziheee a`maa fahuwa fil aakhirati a`maa wa adallu sabeelaa
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख़्श इस (दुनिया) में (जान बूझकर) अंधा बना रहा तो वह आख़िरत में भी अंधा ही रहेगा और (नजात) के रास्ते से बहुत दूर भटका सा हुआ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَعْمَىٰ (अमा): अंधा, यहाँ आँखों का अंधापन नहीं, बल्कि दिल का अंधापन मुराद है—यानी हक़ को देखने, समझने और क़ुबूल करने की समझ खत्म हो जाना।
  • وَأَضَلُّ سَبِيلًا (अज़ल्लु सबीलन): रास्ते से बहुत ज़्यादा भटका हुआ, हिदायत के रास्ते से सबसे दूर।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में एक बहुत बड़ी हक़ीक़त बयान फ़रमा रहे हैं—जो शख्स इस दुनिया में दिल के अंधेपन का शिकार हो, यानी अल्लाह की क़ुदरत की निशानियों, उसकी आयतों और उसके नबी ﷺ के लाए हुए हक़ को देखकर भी न देखे, समझकर भी न समझे, और हक़ को क़ुबूल करने से इनकार करे, तो उसका यह अंधापन आख़िरत में और बढ़ जाएगा। वहाँ वह जन्नत का रास्ता तो क्या, हिदायत की तरफ़ कोई राह भी नहीं पा सकेगा।

यानी जिसने दुनिया में आँखें होते हुए भी हक़ देखने से इनकार किया, अल्लाह की निशानियों से अंधा बना रहा, उसका अंजाम यह होगा कि आख़िरत में वह और भी ज़्यादा अंधा होगा और रास्ते से और भी ज़्यादा भटका हुआ होगा। यह अंधापन आँखों का नहीं, बल्कि दिल और बसीरत का अंधापन है—जो सबसे बड़ी मुसीबत है।

दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हमें चेतावनी देती है कि आज हमारे पास आँखें हैं, कान हैं, दिमाग़ है—ये सब अल्लाह की बड़ी नेअमतें हैं। अगर हम इन नेअमतों को हक़ की पहचान और अल्लाह की इबादत में इस्तेमाल नहीं करेंगे, तो क़यामत के दिन हमारा हाल बहुत बुरा होगा। मगर अल्लाह रहीम है—जब तक हम ज़िंदा हैं, तौबा और हिदायत का दरवाज़ा खुला है। आज ही अपने दिल की आँखें खोलें, क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में चलें, ताकि आख़िरत में हमारा रास्ता रोशन हो और हम जन्नत की तरफ़ ले जाने वाली राह पा सकें। याद रखिए—दुनिया का अंधापन इख्तियारी है, लेकिन आख़िरत का अंधापन उसी का नतीजा है।



📜 आयत 70-74 — सूरा अल-इसरा

70۞ وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ وَحَمَلْنَاهُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًا
और हमने यक़ीनन आदम की औलाद को इज्ज़त दी और खुश्की और तरी में उनको (जानवरों कश्तियों के ज़रिए) लिए लिए फिरे और उन्हें अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी और अपने बहुतेरे मख़लूक़ात पर उनको अच्छी ख़ासी फज़ीलत दी
71يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ ۖ فَمَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَأُولَٰئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَابَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا
उस दिन (को याद करो) जब हम तमाम लोगों को उन पेशवाओं के साथ बुलाएँगें तो जिसका नामए अमल उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह लोग (खुश खुश) अपना नामए अमल पढ़ने लगेगें और उन पर रेशा बराबर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
72وَمَن كَانَ فِي هَٰذِهِ أَعْمَىٰ فَهُوَ فِي الْآخِرَةِ أَعْمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلًا
और जो शख़्श इस (दुनिया) में (जान बूझकर) अंधा बना रहा तो वह आख़िरत में भी अंधा ही रहेगा और (नजात) के रास्ते से बहुत दूर भटका सा हुआ
73وَإِن كَادُوا لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ لِتَفْتَرِيَ عَلَيْنَا غَيْرَهُ ۖ وَإِذًا لَّاتَّخَذُوكَ خَلِيلًا
और (ऐ रसूल) हमने तो (क़ुरान) तुम्हारे पास 'वही' के ज़रिए भेजा अगर चे लोग तो तुम्हें इससे बहकाने ही लगे थे ताकि तुम क़ुरान के अलावा फिर (दूसरी बातों का) इफ़तेरा बाँधों और (जब तुम ये कर गुज़रते उस वक्त ये लोग तुम को अपना सच्चा दोस्त बना लेते
74وَلَوْلَا أَن ثَبَّتْنَاكَ لَقَدْ كِدتَّ تَرْكَنُ إِلَيْهِمْ شَيْئًا قَلِيلًا
और अगर हम तुमको साबित क़दम न रखते तो ज़रुर तुम भी ज़रा (ज़हूर) झुकने ही लगते
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
72आयत

अनुवाद — अल-इसरा 72

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Wednesday, September 30, 2026

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