मरियम · 62/98
अनुवाद उच्चारण — सूरा मरियम
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا إِلَّا سَلَامًا ۖ وَلَهُمْ رِزْقُهُمْ فِيهَا بُكْرَةً وَعَشِيًّا ۝٦٢
Laa yasma`oona feehaa laghwan illaa salaamaa; wa lahum rizquhum feehaa bukratanw wa `ashiyyaa
📖 हिंदी अर्थ
वह लोग वहाँ सलाम के सिवा कोई बेहूदा बात सुनेंगे ही नहीं मगर हर तरफ से इस्लाम ही इस्लाम (की आवाज़ आएगी) और वहाँ उनका खाना सुबह व शाम (जिस वक्त चाहेंगे) उनके लिए (तैयार) रहेगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَغْوًا: बेकार की बात, झूठ, गाली-गलौच या कोई ऐसी बात जिसमें कोई भलाई न हो।
  • سَلَامًا: सलामती, शांति और एक-दूसरे को सलाम करना।
  • بُكْرَةً وَعَشِيًّا: सुबह और शाम, यानी हर वक्त।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत मुक़द्दस क़ुरआन की सूरह मरियम की है, जिसमें अल्लाह तआला जन्नत के उन मुक़द्दस लोगों की ख़ुशहाल ज़िंदगी का ज़िक्र कर रहा है, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इबादत की और उसकी राह में नेक अमल किए। अल्लाह फ़रमाता है कि जन्नत के ये लोग वहाँ कभी कोई बेकार या बुरी बात नहीं सुनेंगे। वहाँ न कोई झूठ होगा, न गाली-गलौच, न कोई तकलीफ़ देने वाली बात। वहाँ की हर आवाज़ सलामती और मुहब्बत से भरी होगी — एक-दूसरे को सलाम करना, फ़रिश्तों का उन्हें सलाम कहना, और अल्लाह की तरफ़ से उन्हें सुकून और सलामती का पैग़ाम मिलना। यानी जन्नत का माहौल पूरी तरह पाक और पुरअमन होगा।

और उनके लिए वहाँ हर वक्त खाने-पीने का इंतज़ाम होगा। अल्लाह फ़रमाता है कि उनका रिज़्क़ (खाना-पीना) उन्हें सुबह और शाम मिलेगा। भले ही जन्नत में दिन-रात का कोई तसव्वुर नहीं, लेकिन ये अल्फ़ाज़ बताते हैं कि उन्हें हर वक्त, बिना किसी मेहनत और परेशानी के, जो चाहें मिलता रहेगा। यह उनकी इज़्ज़त और अल्लाह की तरफ़ से उनकी मेहमाननवाज़ी है।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

ये आयत हमें जन्नत की उस नेमत की तरफ़ इशारा करती है जो हर मोमिन के दिल की धड़कन है। ज़रा सोचिए — एक ऐसी जगह जहाँ न कोई झगड़ा, न कोई बुरी बात, न कोई दुख, बल्कि हर तरफ़ सलामती और खुशी हो, और हर वक्त खाने-पीने की नेमतें मौजूद हों। ये अल्लाह का वादा है उन लोगों के लिए जो दुनिया में अल्लाह की इबादत करते हैं, अपनी ज़ुबान को बुरी बातों से बचाते हैं, और दूसरों के साथ सलामती और मुहब्बत से पेश आते हैं।

तो आओ, हम अपनी ज़िंदगी में इस बात को अपनाएँ कि हमारी ज़ुबान से कभी कोई बुरी या बेकार बात न निकले, और हम दूसरों को सलाम करने वाले, मुहब्बत बांटने वाले बनें। यही रास्ता हमें उस मुक़ाम तक पहुँचाएगा जहाँ सिर्फ़ सलाम और सुकून होगा। अल्लाह हम सबको जन्नत की इस नेमत का हक़दार बनाए, आमीन।



📜 आयत 60-64 — सूरा मरियम

60إِلَّا مَن تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَأُولَٰئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ شَيْئًا
मगर (हाँ) जिसने तौबा कर लिया और अच्छे-अच्छे काम किए तो ऐसे लोग बेहिश्त में दाख़िल होंगे और उन पर कुछ भी जुल्म नहीं किया जाएगा वह सदाबहार बाग़ात में रहेंगे
61جَنَّاتِ عَدْنٍ الَّتِي وَعَدَ الرَّحْمَٰنُ عِبَادَهُ بِالْغَيْبِ ۚ إِنَّهُ كَانَ وَعْدُهُ مَأْتِيًّا
जिनका खुदा ने अपने बन्दों से ग़ाएबाना वायदा कर लिया है बेशक उसका वायदा पूरा होने वाला है
62لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا إِلَّا سَلَامًا ۖ وَلَهُمْ رِزْقُهُمْ فِيهَا بُكْرَةً وَعَشِيًّا
वह लोग वहाँ सलाम के सिवा कोई बेहूदा बात सुनेंगे ही नहीं मगर हर तरफ से इस्लाम ही इस्लाम (की आवाज़ आएगी) और वहाँ उनका खाना सुबह व शाम (जिस वक्त चाहेंगे) उनके लिए (तैयार) रहेगा
63تِلْكَ الْجَنَّةُ الَّتِي نُورِثُ مِنْ عِبَادِنَا مَن كَانَ تَقِيًّا
यही वह बेिहश्त है कि हमारे बन्दों में से जो परहेज़गार होगा हम उसे उसका वारिस बनायेगे
64وَمَا نَتَنَزَّلُ إِلَّا بِأَمْرِ رَبِّكَ ۖ لَهُ مَا بَيْنَ أَيْدِينَا وَمَا خَلْفَنَا وَمَا بَيْنَ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا
और (ऐ रसूल) हम लोग फ़रिश्ते आप के परवरदिगार के हुक्म के बग़ैर (दुनिया में) नहीं नाज़िल होते जो कुछ हमारे सामने है और जो कुछ हमारे पीठ पीछे है और जो कुछ उनके दरमियान में है (ग़रज़ सबकुछ) उसी का है
मरियमकुरान सूची
98आयत
मक्कीअवतरण स्थान
62आयत

अनुवाद — मरियम 62

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Friday, October 2, 2026

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