अल-बकरा · 123/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَّا تَجْزِي نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْئًا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ۝١٢٣
Wattaqoo yawmal laa tajzee nafsun `an nafsin shai `anw wa laa yuqbalu minhaa `adlunw wa laa tanfa`uhaa shafaa `atunw wa laa hum yunsaroon
📖 हिंदी अर्थ
और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख्स किसी की तरफ से न फिदया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई मुआवेज़ा क़ुबूल किया जाएगा और न कोई सिफारिश ही फायदा पहुचाँ सकेगी, और न लोग मदद दिए जाएँगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • तक़्वा (اتقوا): डरना, बचना, सावधान रहना।
  • तज्ज़ी (تجزي): किसी की ओर से कुछ अदा करना, किसी के बदले कुछ देना।
  • अद्ल (عدل): फ़िदया, बदला, मुआवज़ा।
  • शफ़ाअत (شفاعة): सिफ़ारिश, वसीला।
  • युन्सरून (ينصرون): मदद दिए जाना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों को उस महान दिन से डरा रहे हैं जिस दिन हर इंसान अपने कर्मों का हिसाब देगा। यह दिन ऐसा होगा कि कोई भी आत्मा किसी दूसरी आत्मा के किसी काम न आएगी। न कोई किसी के बदले कुछ अदा कर सकेगा, न कोई किसी का बोझ उठाएगा। उस दिन अल्लाह की अनुमति के बिना कोई शफ़ाअत (सिफ़ारिश) काम नहीं आएगी, और न ही कोई किसी की मदद कर सकेगा।

यह आयत हमें बताती है कि आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, यहाँ रिश्तेदार, दोस्त, सिफ़ारिशें और मदद सब काम आती है, लेकिन क़ियामत के दिन केवल अल्लाह का फ़ैसला होगा। वहाँ न तो कोई रिश्ता काम आएगा, न दोस्ती, न सिफ़ारिश, न धन-दौलत। हर इंसान अकेला होगा और उसके सामने सिर्फ़ उसके अमल (कर्म) होंगे।

इसलिए अल्लाह तआला हमें नसीहत दे रहे हैं कि हम इस दिन के लिए तैयारी करें। इसका एक ही तरीक़ा है — अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचें। जो आज अल्लाह से डरेगा और उसकी राह पर चलेगा, उसे उस दिन किसी की मदद की ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि अल्लाह उसके साथ होगा।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने आचरण को सुधारना चाहिए, क्योंकि आज का हर अच्छा या बुरा काम उस दिन हमारे सामने आएगा। अल्लाह ने हमें जीवन का यह अवसर दिया है ताकि हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकें। आइए, हम इस नसीहत पर अमल करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालें, ताकि उस दिन हम सुरक्षित रहें और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 121-125 — अल-बकरा

121الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَٰئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ
जिन लोगों को हमने किताब (कुरान) दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार करते हैं वही लोग घाटे में हैं
122يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّتِي أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ
बनी इसराईल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंनं तुम को दी हैं और ये कि मैंने तुमको सारे जहाँन पर फज़ीलत दी
123وَاتَّقُوا يَوْمًا لَّا تَجْزِي نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْئًا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख्स किसी की तरफ से न फिदया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई मुआवेज़ा क़ुबूल किया जाएगा और न कोई सिफारिश ही फायदा पहुचाँ सकेगी, और न लोग मदद दिए जाएँगे
124۞ وَإِذِ ابْتَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ
(ऐ रसूल) बनी इसराईल को वह वक्त भी याद दिलाओ जब इबराहीम को उनके परवरदिगार ने चन्द बातों में आज़माया और उन्होंने पूरा कर दिया तो खुदा ने फरमाया मैं तुमको (लोगों का) पेशवा बनाने वाला हूँ (हज़रत इबराहीम ने) अर्ज़ की और मेरी औलाद में से फरमाया (हाँ मगर) मेरे इस अहद पर ज़ालिमों में से कोई शख्स फ़ायज़ नहीं हो सकता
125وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا وَاتَّخِذُوا مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى ۖ وَعَهِدْنَا إِلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْعَاكِفِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ
(ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीRevelation
123आयत

अनुवाद — अल-बकरा 123

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Tuesday, August 18, 2026

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