ताहा · 132/135
अनुवाद उच्चारण — ताहा
وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ ۝١٣٢
Waamur ahlaka bis Salaati wastabir `alaihaa la nas`aluka rizqaa; nahnu narzuquk; wal `aaqibatu littaqwaa
📖 हिंदी अर्थ
और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और तुम खुद भी उसके पाबन्द रहो हम तुम से रोज़ी तो तलब करते नहीं (बल्कि) हम तो खुद तुमको रोज़ी देते हैं और परहेज़गारी ही का तो अन्जाम बखैर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَأْمُرْ أَهْلَكَ: अपने परिवार वालों को आदेश दीजिए।
  • بِالصَّلَاةِ: नमाज़ की पाबंदी का।
  • وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا: और उस (नमाज़) पर दृढ़ता और सब्र रखिए।
  • لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا: हम आपसे रोज़ी (आजीविका) का तक़ाज़ा नहीं करते।
  • نَحْنُ نَرْزُقُكَ: हम ही आपको रोज़ी देते हैं।
  • وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ: और अच्छा अंजाम (परिणाम) परहेज़गारी (तक़वा) के लिए है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को एक बहुत ही अहम और प्यारी हिदायत दे रहे हैं कि वे अपने घर वालों को नमाज़ की तालीम दें और उन्हें नमाज़ पर मुस्तक़िम रहने का हुक्म दें। यह सिर्फ़ दूसरों को कहने की बात नहीं है, बल्कि ख़ुद भी नमाज़ पर जमी रहें और उस पर सब्र करें। नमाज़ ही वह चीज़ है जो इंसान को बुराइयों और फ़हश (अश्लील कामों) से रोकती है, दिल को साफ़ करती है और अल्लाह से रिश्ता मज़बूत करती है।

अल्लाह फ़रमाता है: “हम तुमसे रोज़ी का सवाल नहीं करते, हम ही तुम्हें रोज़ी देते हैं।” यानी अल्लाह की इबादत और नमाज़ की पाबंदी कभी भी रोज़ी में कमी का सबब नहीं बनती। रिज़्क़ (रोज़ी) अल्लाह के ज़िम्मे है, वह जिसे चाहता है देता है। इंसान को अपनी फ़िक्र छोड़कर अल्लाह की इबादत पर ध्यान देना चाहिए। यह एक बहुत बड़ी तसल्ली है कि जो बंदा अल्लाह की इबादत में लगा रहता है, अल्लाह उसकी रोज़ी का इंतज़ाम ख़ुद करता है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: “और अच्छा अंजाम तक़वा (परहेज़गारी) के लिए है।” यानी दुनिया और आख़िरत में कामयाबी और बेहतरीन नतीजा उन्हीं के लिए है जो अल्लाह से डरते हैं, उसके हुक्मों की पैरवी करते हैं और उसकी मनाही से बचते हैं। नमाज़ ही तक़वा की जड़ है, और तक़वा ही कामयाबी की कुंजी है।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सिखाती है कि नमाज़ सिर्फ़ हमारा फ़र्ज़ नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी की रौशनी है। अगर हम अपने घरों को नमाज़ की रौशनी से रोशन कर दें, तो हमारे घर सुकून और बरकत से भर जाएँगे। अल्लाह ने हमें रोज़ी की फ़िक्र से आज़ाद कर दिया है—वह ख़ुद कहता है कि “हम तुम्हें रोज़ी देते हैं।” तो फिर हम क्यों चिंता में डूबे रहते हैं? हमें अपना ध्यान अल्लाह की इबादत पर लगाना चाहिए, और देखना है कि अल्लाह कैसे हमारे रिज़्क़ के दरवाज़े खोलता है। याद रखिए, जो लोग तक़वा (परहेज़गारी) अपनाते हैं, उन्हीं के लिए दुनिया और आख़िरत की कामयाबी है। नमाज़ को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाइए, अपने बच्चों को नमाज़ सिखाइए, और देखिए कि आपकी ज़िंदगी कैसे बदल जाती है। अल्लाह हम सबको नमाज़ की पाबंदी और तक़वा की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 130-134 — ताहा

130فَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا ۖ وَمِنْ آنَاءِ اللَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ النَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَىٰ
(ऐ रसूल) जो कुछ ये कुफ्फ़ार बका करते हैं तुम उस पर सब्र करो और आफ़ताब निकलने के क़ब्ल और उसके ग़ुरूब होने के क़ब्ल अपने परवरदिगार की हम्दोसना के साथ तसबीह किया करो और कुछ रात के वक़्तों में और दिन के किनारों में तस्बीह करो ताकि तुम निहाल हो जाओ
131وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِّنْهُمْ زَهْرَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ
और (ऐ रसूल) जो उनमें से कुछ लोगों को दुनिया की इस ज़रा सी ज़िन्दगी की रौनक़ से निहाल कर दिया है ताकि हम उनको उसमें आज़माएँ तुम अपनी नज़रें उधर न बढ़ाओ और (इससे) तुम्हारे परवरदिगार की रोज़ी (सवाब) कहीं बेहतर और ज्यादा पाएदार है
132وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ
और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और तुम खुद भी उसके पाबन्द रहो हम तुम से रोज़ी तो तलब करते नहीं (बल्कि) हम तो खुद तुमको रोज़ी देते हैं और परहेज़गारी ही का तो अन्जाम बखैर है
133وَقَالُوا لَوْلَا يَأْتِينَا بِآيَةٍ مِّن رَّبِّهِ ۚ أَوَلَمْ تَأْتِهِم بَيِّنَةُ مَا فِي الصُّحُفِ الْأُولَىٰ
और (अहले मक्का) कहते हैं कि अपने परवरदिगार की तरफ से हमारे पास कोई मौजिज़ा हमारी मर्ज़ी के मुवाफिक़ क्यों नहीं लाते तो क्या जो (पेशीव गोइयाँ) अगली किताबों (तौरेत, इन्जील) में (इसकी) गवाह हैं वह भी उनके पास नहीं पहुँची
134وَلَوْ أَنَّا أَهْلَكْنَاهُم بِعَذَابٍ مِّن قَبْلِهِ لَقَالُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ مِن قَبْلِ أَن نَّذِلَّ وَنَخْزَىٰ
और अगर हम उनको इस रसूल से पहले अज़ाब से हलाक कर डालते तो ज़रूर कहते कि ऐ हमारे पालने वाले तूने हमारे पास (अपना) रसूल क्यों न भेजा तो हम अपने ज़लील व रूसवा होने से पहले तेरी आयतों की पैरवी ज़रूर करते
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अनुवाद — ताहा 132

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Tuesday, August 18, 2026

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