अल-हज · 10/78
अनुवाद उच्चारण — अल-हज
ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ يَدَاكَ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ ۝١٠
Zaalika bimaa qaddamat yadaaka wa annal laaha laisa bizallaamil lil`abeed
📖 हिंदी अर्थ
और उस वक्त उससे कहा जाएगा कि ये उन आमाल की सज़ा है जो तेरे हाथों ने पहले से किए हैं और बेशक खुदा बन्दों पर हरगिज़ जुल्म नहीं करता
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذَٰلِكَ (ज़ालिक): यह (अज़ाब)।
  • بِمَا قَدَّمَتْ يَدَاكَ (बिमा क़द्दमत यदाक): उसके बदले में जो तेरे हाथों ने आगे भेजा, यानी तेरे किए हुए कर्मों की सज़ा।
  • لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ (लैस बि-ज़ल्लामिल-लिल-अबीद): अल्लाह अपने बंदों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं है।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब काफ़िरों और गुनाहगारों को आख़िरत में अज़ाब का मज़ा चखाया जाएगा, तो उनसे कहा जाएगा: "यह अज़ाब जो तुम्हें मिल रहा है, यह उन्हीं कर्मों का नतीजा है जो तुमने दुनिया में अपने हाथों से किए थे — कुफ़्र, शिर्क, ज़ुल्म, नाफ़रमानी और गुनाह। यह कोई ज़ुल्म नहीं है जो अल्लाह ने तुम पर किया हो।"

अल्लाह तआला अपने बंदों पर ज़ुल्म करने से पाक और मुबर्रा है। वह किसी को बिना गुनाह के सज़ा नहीं देता। उसका फ़ैसला पूर्ण न्याय पर आधारित है। अगर कोई अज़ाब में डाला जाता है, तो वह उसके अपने किए की सज़ा है, क्योंकि अल्लाह ने इंसान को अक़्ल, समझ, और मार्गदर्शन दिया, फिर उसे चुनने की आज़ादी दी। जिसने नेकी की, उसे नेकी का बदला मिलेगा, और जिसने बुराई की, उसे बुराई का अंजाम भुगतना होगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का न्याय बिल्कुल सटीक है। वह किसी पर रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं करता। अगर हमें कोई मुसीबत या सज़ा मिलती है, तो हमें अपने कर्मों पर नज़र डालनी चाहिए और तौबा करनी चाहिए। यह आयत हमें ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाती है कि हमारा भविष्य हमारे अपने हाथों में है — अगर हम नेकी करेंगे, तो जन्नत पाएँगे, और अगर गुनाह करेंगे, तो जहन्नम का सामना करेंगे।

अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेहद मेहरबान है। उसने इस दुनिया में मौका दिया, तौबा का दरवाज़ा खुला रखा, और रहमत का पैगाम भेजा। वह चाहता है कि बंदे उसकी ओर लौटें, सुधरें, और अपने गुनाहों से बाज़ आएँ। जो लोग इस दुनिया में अपने गुनाहों पर पछतावा करके तौबा कर लें, अल्लाह उन्हें माफ़ कर देता है, क्योंकि वह ग़फ़ूर-उर-रहीम है। लेकिन जो हठधर्मी और सरकशी पर अड़े रहेंगे, उन्हें अपने किए का अंजाम भुगतना ही होगा।

यह आयत हमें दो बातें सिखाती है: पहली, अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी लेना — हम जो बोते हैं, वही काटते हैं। दूसरी, अल्लाह के न्याय पर पूरा भरोसा रखना — वह कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। यही ईमान की निशानी है कि इंसान अपने रब के फ़ैसले पर राज़ी रहे और उसकी रहमत से उम्मीद न खोए।

🎧 सुनें

📜 आयत 8-12 — अल-हज

8وَمِنَ النَّاسِ مَن يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُّنِيرٍ
और लोगों में से कुछ ऐसे भी है जो बेजाने बूझे बे हिदायत पाए बगैर रौशन किताब के (जो उसे राह बताए) खुदा की आयतों से मुँह मोडे
9ثَانِيَ عِطْفِهِ لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۖ لَهُ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ ۖ وَنُذِيقُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عَذَابَ الْحَرِيقِ
(ख्वाहमख्वाह) खुदा के बारे में लड़ने मरने पर तैयार है ताकि (लोगों को) ख़ुदा की राह बहका दे ऐसे (नाबकार) के लिए दुनिया में (भी) रूसवाई है और क़यामत के दिन (भी) हम उसे जहन्नुम के अज़ाब (का मज़ा) चखाएँगे
10ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ يَدَاكَ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
और उस वक्त उससे कहा जाएगा कि ये उन आमाल की सज़ा है जो तेरे हाथों ने पहले से किए हैं और बेशक खुदा बन्दों पर हरगिज़ जुल्म नहीं करता
11وَمِنَ النَّاسِ مَن يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَىٰ حَرْفٍ ۖ فَإِنْ أَصَابَهُ خَيْرٌ اطْمَأَنَّ بِهِ ۖ وَإِنْ أَصَابَتْهُ فِتْنَةٌ انقَلَبَ عَلَىٰ وَجْهِهِ خَسِرَ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ
और लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं जो एक किनारे पर (खड़े होकर) खुदा की इबादत करता है तो अगर उसको कोई फायदा पहुँच गया तो उसकी वजह से मुतमईन हो गया और अगर कहीं उस कोई मुसीबत छू भी गयी तो (फौरन) मुँह फेर के (कुफ़्र की तरफ़) पलट पड़ा उसने दुनिया और आखेरत (दोनों) का घाटा उठाया यही तो सरीही घाटा है
12يَدْعُو مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُ وَمَا لَا يَنفَعُهُ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الضَّلَالُ الْبَعِيدُ
खुदा को छोड़कर उन चीज़ों को (हाजत के वक्त) बुलाता है जो न उसको नुक़सान ही पहुँचा सकते हैं और न कुछ नफा ही पहुँचा सकते हैं
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीRevelation
10आयत

अनुवाद — अल-हज 10

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Tuesday, August 18, 2026

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