अल-हज · 64/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हज
لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ ۝٦٤
Lahoo ma fis samaawaati wa ma fil ard; wa innal laaha la Huwal Ghaniyyul Hameed
📖 हिंदी अर्थ
जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है और इसमें तो शक ही नहीं कि खुदा (सबसे) बेपरवाह (और) सज़ावार हम्द है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْغَنِيُّ (अल-ग़नी): वह जो किसी भी चीज़ का मोहताज न हो, स्वयं में पूर्ण और आत्मनिर्भर।
  • الْحَمِيدُ (अल-हमीद): वह जो अपने गुणों और कर्मों के कारण प्रशंसा का पात्र हो, हर हाल में स्तुति किया जाने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है—चाहे वह मख़लूक़ (प्राणी) हो, माल हो या बंदगी—सब कुछ अकेले अल्लाह ही का है। वही इन सबका मालिक, पालनहार और प्रबंधक है। हर चीज़ उसी की मोहताज है, और वह किसी का मोहताज नहीं। यही कारण है कि वह अल-ग़नी है—अपनी ज़ात में हर चीज़ से बेनियाज़, और अल-हमीद है—अपनी सिफ़ात (गुणों) और अफ़आल (कर्मों) की वजह से हर तारीफ़ का हक़दार।

जब हम यह समझ लें कि सारा जहान उसी की मिल्कियत है, तो हमारे दिल में उसकी अज़मत और क़ुदरत का एहसास पैदा होता है। यह एहसास हमें उसकी इबादत की तरफ़ खींचता है और हमें सिखाता है कि जिस मालिक के पास सब कुछ है, उससे ही हमें अपनी हाजतें माँगनी चाहिए। वह न तो कभी थकता है और न ही उसे किसी की मदद की ज़रूरत होती है।

इस आयत में एक बड़ी खुशखबरी भी है: अल्लाह हमीद है, यानी वह अपने बंदों के अच्छे कामों की क़द्र करता है और उन्हें इनाम देता है। वह ऐसा मालिक है जो अपने बंदों की तारीफ़ करता है, उनकी दुआएँ सुनता है और उन्हें अपनी रहमत से नवाज़ता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम उसी पर भरोसा रखें, उसी से मदद माँगें और उसी की बंदगी में अपनी ज़िंदगी गुज़ारें। यही सच्ची कामयाबी है—कि हम उस मालिक को पहचानें जो सब कुछ रखता है, और उसकी रज़ा (खुशी) को अपनी ज़िंदगी का निशाना बनाएँ।

याद रखिए! जब हमारा दिल इस हक़ीक़त पर यक़ीन कर लेता है कि अल्लाह ही सब कुछ का मालिक है और वही बेनियाज़ है, तो हमारे अंदर से दुनिया की मुहब्बत का ग़ुलामी वाला पहलू कमज़ोर पड़ता है और हमारा रिश्ता अल्लाह से मज़बूत होता है। यही वह रिश्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में सुकून और कामयाबी देता है।



📜 आयत 62-66 — सूरा अल-हज

62ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ هُوَ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
(और) इस वजह से (भी) कि यक़ीनन खुदा ही बरहक़ है और उसके सिवा जिनको लोग (वक्ते मुसीबत) पुकारा करते हैं (सबके सब) बातिल हैं और (ये भी) यक़ीनी (है कि) खुदा ही (सबसे) बुलन्द मर्तबा बुर्जुग़ है
63أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَتُصْبِحُ الْأَرْضُ مُخْضَرَّةً ۗ إِنَّ اللَّهَ لَطِيفٌ خَبِيرٌ
अरे क्या तूने इतना भी नहीं देखा कि खुदा ही आसमान से पानी बरसाता है तो ज़मीन सर सब्ज़ (व शादाब) हो जाती है बेशक खुदा (बन्दों के हाल पर) बड़ा मेहरबान वाक़िफ़कार है
64لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ
जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है और इसमें तो शक ही नहीं कि खुदा (सबसे) बेपरवाह (और) सज़ावार हम्द है
65أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِي الْأَرْضِ وَالْفُلْكَ تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِأَمْرِهِ وَيُمْسِكُ السَّمَاءَ أَن تَقَعَ عَلَى الْأَرْضِ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ بِالنَّاسِ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ
क्या तूने उस पर भी नज़र न डाली कि जो कुछ रूए ज़मीन में है सबको खुदा ही ने तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है और कश्ती को (भी) जो उसके हुक्म से दरिया में चलती है और वही तो आसमान को रोके हुए है कि ज़मीन पर न गिर पड़े मगर (जब) उसका हुक्म होगा (तो गिर पडेग़ा) इसमें शक नहीं कि खुदा लोगों पर बड़ा मेहरबान व रहमवाला है
66وَهُوَ الَّذِي أَحْيَاكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ۗ إِنَّ الْإِنسَانَ لَكَفُورٌ
और वही तो क़ादिर मुत्तलिक़ है जिसने तुमको (पहली बार माँ के पेट में) जिला उठाया फिर वही तुमको मार डालेगा फिर वही तुमको दोबारा ज़िन्दगी देगा
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
64आयत

अनुवाद — अल-हज 64

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Wednesday, September 30, 2026

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