अन-नूर · 42/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ ۝٤٢
Wa lillaahi mulkus samaawaati wal ardi wa ilal laahil maseer
📖 हिंदी अर्थ
और सारे आसमान व ज़मीन की सल्तनत ख़ास ख़ुदा ही की है और ख़ुदा ही की तरफ (सब को) लौट कर जाना है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مُلْكُ: स्वामित्व, राज्य, अधिकार।
  • السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ: आकाशों (सभी आकाशों) और धरती का।
  • الْمَصِيرُ: अंतिम पड़ाव, लौटने की जगह, (सबकी) वापसी।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी और अहम हक़ीक़त की याद दिलाती है — कि यह पूरा ब्रह्मांड, आकाशों की ऊँचाइयों से लेकर धरती की गहराइयों तक, सब कुछ अकेले अल्लाह ही का है। उसी का राज्य है, उसी का अधिकार है, और उसी के हाथ में इस पूरी कायनात की बागडोर है। वही इसका मालिक है, वही इसका प्रबंधक है, और वही जैसे चाहता है, इसे चलाता है। कोई भी चीज़ उसके इशारे के बिना नहीं हिल सकती, न कोई पत्ता उसकी इजाज़त के बिना गिर सकता है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और अल्लाह ही की ओर (सबका) अंतिम पड़ाव है।" यानी इस दुनिया का सफ़र कभी ख़त्म होगा, और हर इंसान को एक दिन अपने रब के सामने हाज़िर होना है। जो आज इस धरती पर अपनी ज़रा सी ताक़त पर इतराता है, जो अपनी दौलत या ओहदे पर घमंड करता है, उसे याद रखना चाहिए कि यह सब कुछ अस्थायी है। असली मालिक तो अल्लाह है, और उसी की तरफ़ सबको लौटकर जाना है। वहाँ हर अमल का हिसाब होगा, हर नीयत की पड़ताल होगी, और हर इंसान को उसके किए का बदला मिलेगा — अच्छा हो तो अच्छा, और बुरा हो तो बुरा।

यह आयत हमारे दिलों में अल्लाह की अज़मत और उसकी कुदरत का एहसास पैदा करती है। जब हमें यक़ीन हो जाए कि सब कुछ अल्लाह के हाथ में है, तो हमारा दिल किसी और के आगे झुकेगा नहीं, किसी और से डरेगा नहीं, और किसी और से उम्मीद नहीं रखेगा। हमारा भरोसा सिर्फ़ उसी पर होगा। और जब हमें याद हो कि हमें एक दिन उसी की तरफ़ लौटना है, तो हम अपने अमल को संवारेंगे, अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ ढालेंगे, और हर काम में यह सोचकर क़दम बढ़ाएँगे कि यह काम अल्लाह को कैसा लगेगा?

यही तो मोमिन की पहचान है — कि वह दुनिया में रहते हुए भी आख़िरत को नहीं भूलता। वह जानता है कि यह ज़िंदगी एक इम्तिहान है, और असली कामयाबी उसी दिन मिलेगी जब वह अपने रब के सामने सर झुकाकर खड़ा होगा और उसे प्यार भरा ख़िताब मिलेगा। अल्लाह हम सबको यह समझने की तौफ़ीक़ दे, और हमारे दिलों को अपनी मुहब्बत और अपने डर से भर दे। आमीन।



📜 आयत 40-44 — अन-नूर

40أَوْ كَظُلُمَاتٍ فِي بَحْرٍ لُّجِّيٍّ يَغْشَاهُ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِ سَحَابٌ ۚ ظُلُمَاتٌ بَعْضُهَا فَوْقَ بَعْضٍ إِذَا أَخْرَجَ يَدَهُ لَمْ يَكَدْ يَرَاهَا ۗ وَمَن لَّمْ يَجْعَلِ اللَّهُ لَهُ نُورًا فَمَا لَهُ مِن نُّورٍ
(या काफिरों के आमाल की मिसाल) उस बड़े गहरे दरिया की तारिकियों की सी है- जैसे एक लहर उसके ऊपर दूसरी लहर उसके ऊपर अब्र (तह ब तह) ढॉके हुए हो (ग़रज़) तारिकियाँ है कि एक से ऊपर एक (उमड़ी) चली आती हैं (इसी तरह से) कि अगर कोइ शख्स अपना हाथ निकाले तो (शिद्दत तारीकी से) उसे देख न सके और जिसे खुद ख़ुदा ही ने (हिदायत की) रौशनी न दी हो तो (समझ लो कि) उसके लिए कहीं कोई रौशनी नहीं है
41أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يُسَبِّحُ لَهُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَالطَّيْرُ صَافَّاتٍ ۖ كُلٌّ قَدْ عَلِمَ صَلَاتَهُ وَتَسْبِيحَهُ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ
(ऐ शख्स) क्या तूने इतना भी नहीं देखा कि जितनी मख़लूक़ात सारे आसमान और ज़मीन में हैं और परिन्दें पर फैलाए (ग़रज़ सब) उसी को तस्बीह किया करते हैं सब के सब अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा खूब जानते हैं और जो कुछ ये किया करते हैं ख़ुदा उससे खूब वाक़िफ है
42وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
और सारे आसमान व ज़मीन की सल्तनत ख़ास ख़ुदा ही की है और ख़ुदा ही की तरफ (सब को) लौट कर जाना है
43أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يُزْجِي سَحَابًا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيْنَهُ ثُمَّ يَجْعَلُهُ رُكَامًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِهِ وَيُنَزِّلُ مِنَ السَّمَاءِ مِن جِبَالٍ فِيهَا مِن بَرَدٍ فَيُصِيبُ بِهِ مَن يَشَاءُ وَيَصْرِفُهُ عَن مَّن يَشَاءُ ۖ يَكَادُ سَنَا بَرْقِهِ يَذْهَبُ بِالْأَبْصَارِ
क्या तूने उस पर भी नज़र नहीं की कि यक़ीनन ख़ुदा ही अब्र को चलाता है फिर वही बाहम उसे जोड़ता है-फिर वही उसे तह ब तह रखता है तब तू तो बारिश उसके दरमियान से निकलते हुए देखता है और आसमान में जो (जमे हुए बादलों के) पहाड़ है उनमें से वही उसे बरसाता है- फिर उन्हें जिस (के सर) पर चाहता है पहुँचा देता है- और जिस (के सर) से चाहता है टाल देता है- क़रीब है कि उसकी बिजली की कौन्द आखों की रौशनी उचके लिये जाती है
44يُقَلِّبُ اللَّهُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَعِبْرَةً لِّأُولِي الْأَبْصَارِ
ख़ुदा ही रात और दिन को फेर बदल करता रहता है- बेशक इसमें ऑंख वालों के लिए बड़ी इबरत है
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अनुवाद — अन-नूर 42

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Tuesday, August 18, 2026

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