अश-शुआरा · 5/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّنَ الرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا عَنْهُ مُعْرِضِينَ ۝٥
Wa maa yaateehim min zikrim minar Rahmaani muhdasin illaa kaanoo `anhu mu`rideen
📖 हिंदी अर्थ
और (लोगों का क़ायदा है कि) जब उनके पास कोई कोई नसीहत की बात ख़ुदा की तरफ से आयी तो ये लोग उससे मुँह फेरे बगैर नहीं रहे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذِكْرٍ (ज़िक्र): यहाँ इसका अर्थ है क़ुरआन और वह नसीहत जो अल्लाह की ओर से भेजी जाती है।
  • مُحْدَثٍ (मुहदस): नया उतारा गया, यानी जो वही थोड़ी-थोड़ी करके नई रूप में उतरती रहती है।
  • مُعْرِضِينَ (मु'रिज़ीन): मुँह मोड़ने वाले, ध्यान न देने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की हालत बयान करती है जो सच्चाई से मुँह मोड़ते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब भी उनके पास रहमान की ओर से कोई नई नसीहत, कोई नया ज़िक्र (क़ुरआन की आयतें) आता है — जो उन्हें सीधे रास्ते की तरफ बुलाती है, उन्हें अल्लाह की याद दिलाती है, और उनकी भलाई के लिए होती है — तो वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं। वे उसे सुनना तक पसंद नहीं करते, उस पर विचार नहीं करते, और न ही उसे क़बूल करते हैं। यह उनकी ज़िद और अहंकार की सबसे बड़ी निशानी है कि जो चीज़ उनकी अपनी भलाई के लिए आती है, उसी से वे दूर भागते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला है — वह अपने बंदों की हिदायत के लिए बार-बार नसीहतें भेजता है, कभी एक आयत, कभी एक सूरह। लेकिन अफ़सोस उन लोगों पर जो इस रहमत को ठुकरा देते हैं। अल्लाह तआला अपनी रहमत से हमें हिदायत देता है, हमें ज़िंदगी का सही रास्ता दिखाता है, और हमें अंधेरों से निकालकर रोशनी की तरफ लाता है। क्या यह उसकी सबसे बड़ी मेहरबानी नहीं?

प्यारे भाइयों और बहनों! हमें चाहिए कि जब भी क़ुरआन की कोई आयत सुनें, उसे ध्यान से सुनें, उस पर ग़ौर करें, और उसे अपनी ज़िंदगी में लागू करें। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाता है। अल्लाह की रहमत का यह ज़रिया हमारे लिए कितनी बड़ी नेमत है — हमें चाहिए कि हम इस नेमत की क़द्र करें और उससे मुँह न मोड़ें। याद रखिए, जो लोग अल्लाह की नसीहत से मुँह मोड़ते हैं, वे सिर्फ़ अपना ही नुक़सान करते हैं, क्योंकि अल्लाह को किसी की ज़रूरत नहीं, बल्कि हम सब उसके मोहताज हैं।



📜 आयत 3-7 — अश-शुआरा

3لَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ
(ऐ रसूल) शायद तुम (इस फिक्र में) अपनी जान हलाक कर डालोगे कि ये (कुफ्फार) मोमिन क्यो नहीं हो जाते
4إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ السَّمَاءِ آيَةً فَظَلَّتْ أَعْنَاقُهُمْ لَهَا خَاضِعِينَ
अगर हम चाहें तो उन लोगों पर आसमान से कोई ऐसा मौजिज़ा नाज़िल करें कि उन लोगों की गर्दनें उसके सामने झुक जाएँ
5وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّنَ الرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا عَنْهُ مُعْرِضِينَ
और (लोगों का क़ायदा है कि) जब उनके पास कोई कोई नसीहत की बात ख़ुदा की तरफ से आयी तो ये लोग उससे मुँह फेरे बगैर नहीं रहे
6فَقَدْ كَذَّبُوا فَسَيَأْتِيهِمْ أَنبَاءُ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
उन लोगों ने झुठलाया ज़रुर तो अनक़रीब ही (उन्हें) इस (अज़ाब) की हक़ीकत मालूम हो जाएगी जिसकी ये लोग हँसी उड़ाया करते थे
7أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى الْأَرْضِ كَمْ أَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ كَرِيمٍ
क्या इन लोगों ने ज़मीन की तरफ भी (ग़ौर से) नहीं देखा कि हमने हर रंग की उम्दा उम्दा चीजें उसमें किस कसरत से उगायी हैं
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अनुवाद — अश-शुआरा 5

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Tuesday, August 18, 2026

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