अश-शुआरा · 67/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ ۝٦٧
Inna fee zaalika la Aayaah; wa maa kaana aksaru hu mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
बेशक इसमें यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और उनमें अक्सर ईमान लाने वाले ही न थे

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अनुवाद — Tafsir

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"इसमें बड़ी निशानी है, और उनमें अधिकतर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।"

शब्दों के अर्थ:

  • आयत: निशानी, सबक़, सीखने की चीज़
  • मु'मिनीन: ईमान लाने वाले, सच्चे दिल से मानने वाले

तफ़सीर:

यह आयत उस महान घटना की ओर इशारा करती है जब अल्लाह ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के लिए समुद्र को चीरकर रास्ता बनाया, और उन्हें और उनकी क़ौम को सलामती से पार उतार दिया, जबकि फ़िरऔन और उसकी फ़ौजें उनका पीछा कर रही थीं। जैसे ही मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनके साथी सुरक्षित पार पहुँचे, अल्लाह ने समुद्र को बंद कर दिया और फ़िरऔन व उसकी पूरी फ़ौज को डुबो दिया।

यह घटना अपने आप में अल्लाह की क़ुदरत की सबसे बड़ी निशानी है। यह सिर्फ़ एक ऐतिहासिक वाक़िया नहीं, बल्कि उन सबके लिए एक ज़िंदा सबक़ है जो आँखों से देखते हैं और दिल से समझते हैं। इस घटना में अल्लाह की तौहीद, उसकी ताक़त, उसके नबी की सच्चाई — सब कुछ साफ़ ज़ाहिर है।

लेकिन अफ़सोस! इसके बावजूद उनमें अधिकतर लोग ईमान नहीं लाए। यह इंसान की सख़्त दिली और हठधर्मिता की त्रासदी है कि जब सामने खुली निशानियाँ हों, फिर भी वह अपनी ज़िद और अहंकार के कारण हक़ को क़बूल नहीं करता। फ़िरऔन और उसके साथियों ने मूसा (अलैहिस्सलाम) के चमत्कार देखे, समुद्र का फटना देखा, अपनी मौत भी देखी — फिर भी ईमान नहीं लाए।

दावत और सबक़:

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान दिल की चीज़ है, सिर्फ़ निशानियाँ देख लेने से नहीं आता। अल्लाह की निशानियाँ हर तरफ़ बिखरी हुई हैं — आसमान में, ज़मीन में, हमारे अपने वजूद में। लेकिन जिस दिल में ग़ुरूर और हठ हो, वह कभी हिदायत नहीं पाता। इसलिए हमें अपने दिल को नम्र रखना चाहिए, अल्लाह की हर निशानी से सबक़ लेना चाहिए, और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की लाई हुई हिदायत को खुले दिल से क़बूल करना चाहिए।

याद रखिए, अल्लाह की निशानियाँ सिर्फ़ इसलिए हैं कि हम उनसे सीखें और अपने रब की तरफ़ लौटें। जो लोग इन निशानियों से आँखें बंद कर लेते हैं, वे उसी तरह तबाह होते हैं जैसे फ़िरऔन और उसकी फ़ौज तबाह हुई। और जो लोग इन निशानियों से हिदायत पाते हैं, वे उसी तरह नजात पाते हैं जैसे मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी क़ौम नजात पाई। अल्लाह हमें हक़ देखने और क़बूल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 65-69 — अश-शुआरा

65وَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُ أَجْمَعِينَ
और मूसा और उसके साथियों को हमने (डूबने से) बचा लिया
66ثُمَّ أَغْرَقْنَا الْآخَرِينَ
फिर दूसरे फरीक़ (फिरऔन और उसके साथियों) को डुबोकर हलाक़ कर दिया
67إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
बेशक इसमें यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और उनमें अक्सर ईमान लाने वाले ही न थे
68وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ
और इसमें तो शक ही न था कि तुम्हारा परवरदिगार यक़ीनन (सब पर) ग़ालिब और बड़ा मेहरबान है
69وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَاهِيمَ
और (ऐ रसूल) उन लोगों के सामने इबराहीम का किस्सा बयान करों
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अनुवाद — अश-शुआरा 67

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Tuesday, August 18, 2026

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