Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- إِذْ قَالَ: जब उन्होंने कहा
- لِأَبِيهِ: अपने पिता से
- وَقَوْمِهِ: और अपनी क़ौम से
- مَا تَعْبُدُونَ: तुम किसकी पूजा करते हो?
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की उस महान दावत का ज़िक्र करती है, जब उन्होंने अपने पिता आज़र और अपनी क़ौम से यह सवाल किया: "तुम किस चीज़ की पूजा करते हो?"
यह सवाल बड़ा ही अर्थपूर्ण और गहरा था। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने पिता और क़ौम को सोचने पर मजबूर करने के लिए यह सवाल उठाया, ताकि वे अपने आराध्यों (पूजा की वस्तुओं) के बारे में स्वयं विचार करें। वे जानते थे कि उनकी क़ौम मूर्तियों की पूजा करती है, लेकिन उन्होंने जानबूझकर यह सवाल पूछा ताकि उनके दिलों में यह बात बैठ जाए कि जिस चीज़ की वे पूजा कर रहे हैं, वह वास्तव में पूजा के योग्य है या नहीं।
यह सवाल उस समय के अंधेरे माहौल में रौशनी की किरण था। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को अंधी परंपरा और बाप-दादा की नक़ल से निकालकर तर्क और विवेक की ओर बुलाया। उन्होंने यह स्पष्ट करना चाहा कि सच्ची इबादत सिर्फ अल्लाह की होनी चाहिए, जो इस कायनात का ख़ालिक़ (रचयिता) और मालिक है।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि सच्चे दीन की दावत में सबसे पहले लोगों को सोचने और समझने की दावत दी जाती है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का यह तरीक़ा हमारे लिए नमूना है कि हमें भी अपने समाज में बुराई और शिर्क के खिलाफ हिकमत और अच्छे अंदाज़ से आवाज़ उठानी चाहिए।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि सवाल करना, सोचना और समझना इस्लाम की बुनियादी तालीम है। अल्लाह तआला ने इंसान को अक़्ल (बुद्धि) दी है ताकि वह सच्चाई को पहचाने और अपने रब की इबादत करे। जो लोग बिना सोचे-समझे अपने बुज़ुर्गों की नक़ल में अंधी पैरवी करते हैं, वे हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की क़ौम की तरह गुमराही में रहते हैं।
आज भी हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में यह सवाल करें कि हम किसकी इबादत करते हैं और क्यों करते हैं? क्या हमारी इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए है या फिर किसी और को भी उसमें शामिल करते हैं? यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाती है और शिर्क से बचने की तालीम देती है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की यह दावत आज भी हर मुसलमान के लिए रौशनी का ज़रिया है, और हमें चाहिए कि हम अपने जीवन को उन्हीं के रास्ते पर चलाएं।
📜 आयत 68-72 — सूरा अश-शुआरा
अनुवाद — अश-शुआरा 70
सूरा अश-शुआरा आयत 70 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जब उन्होंने अपने (मुँह बोले) बाप और अपनी क़ौम से…सूरा आयत 70/227 — सूरा अश-शुआरा الشعراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अश-शुआरा सुनें, सूरा अश-शुआरा अनुवाद, सूरा अश-शुआरा mp3, सूरा अश-शुआरा pdf. आयत 68–72. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अश-शुआरा
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
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