अश-शुआरा · 71/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
قَالُوا نَعْبُدُ أَصْنَامًا فَنَظَلُّ لَهَا عَاكِفِينَ ۝٧١
Qaaloo na`budu asnaaman fanazallu lahaa `aakifeen
📖 हिंदी अर्थ
कि तुम लोग किसकी इबादत करते हो तो वह बोले हम बुतों की इबादत करते हैं और उन्हीं के मुजाविर बन जाते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَصْنَامًا (असनाम) — मूर्तियाँ, वे पत्थर या अन्य चीज़ों से बनी आकृतियाँ जिन्हें इंसान की शक्ल पर बनाया जाता था।
  • فَنَظَلُّ (फ़नज़ल्लु) — हम हमेशा रहते हैं, हम लगातार बने रहते हैं।
  • عَاكِفِينَ (आकिफ़ीन) — इबादत में लगे रहना, किसी चीज़ पर टिके रहना, उसे छोड़ना नहीं। यही शब्द "ए'तिकाफ़" से भी है, जिसका मतलब है मस्जिद में इबादत के लिए ठहरना।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से पूछा कि तुम किस चीज़ की इबादत करते हो, तो उन्होंने बड़े गर्व और अकड़ के साथ जवाब दिया: "हम मूर्तियों की पूजा करते हैं और उन्हीं की इबादत पर हमेशा जमे रहते हैं।" उनका यह जवाब बताता है कि वे अपनी इस गलत राह पर कितने दृढ़ थे। उन्होंने न सिर्फ़ मूर्तियों को पूजने का इक़रार किया, बल्कि यह भी कहा कि हम इसी पर डटे रहेंगे, इसे कभी नहीं छोड़ेंगे। यह उनकी जिज्ञासा और हठधर्मिता को दर्शाता है कि उन्होंने अपनी बात पर कोई सवाल उठाने की ज़रूरत ही नहीं समझी।

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान कितनी आसानी से अपने पूर्वजों की राह पर अंधी पैरवी करते हुए सच्चाई से दूर हो जाता है। मूर्तियाँ न तो कोई फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न ही नुक़सान, फिर भी लोग उन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। यह हमारे लिए एक बड़ी सीख है कि हमें अपने अंदर झाँककर देखना चाहिए कि कहीं हम भी तो किसी ऐसी चीज़ से जुड़े नहीं हैं जो हमें अल्लाह की याद से दूर कर रही हो। अल्लाह तआला ने हमें अक्ल दी है ताकि हम सच और झूठ में फ़र्क कर सकें, और उसी अक्ल का इस्तेमाल करके हमें अपने रब की इबादत की तरफ़ आना चाहिए, जो सबसे बड़ी सच्चाई है।



📜 आयत 69-73 — अश-शुआरा

69وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَاهِيمَ
और (ऐ रसूल) उन लोगों के सामने इबराहीम का किस्सा बयान करों
70إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا تَعْبُدُونَ
जब उन्होंने अपने (मुँह बोले) बाप और अपनी क़ौम से कहा
71قَالُوا نَعْبُدُ أَصْنَامًا فَنَظَلُّ لَهَا عَاكِفِينَ
कि तुम लोग किसकी इबादत करते हो तो वह बोले हम बुतों की इबादत करते हैं और उन्हीं के मुजाविर बन जाते हैं
72قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ
इबराहीम ने कहा भला जब तुम लोग उन्हें पुकारते हो तो वह तुम्हारी कुछ सुनते हैं
73أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ
या तम्हें कुछ नफा या नुक़सान पहुँचा सकते हैं
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अनुवाद — अश-शुआरा 71

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Wednesday, August 19, 2026

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