مِنَ الْمُنتَصِرِينَ: अपनी रक्षा करने वालों में से।
तफसीर (व्याख्या):
जब क़ारून ने अपने धन और ऐश्वर्य पर घमंड किया और अल्लाह के आदेशों की अवहेलना की, तो अल्लाह तआला ने उसे उसके घर सहित धरती में धँसा दिया। यह अल्लाह की उस शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो किसी भी घमंडी और सरकश इंसान को उसके ठिकाने पर ला सकती है। धरती ने उसे और उसके पूरे घर को अपने अंदर समेट लिया, और वह अपने धन, अपनी ताकत और अपने साथियों के बावजूद बिल्कुल असमर्थ हो गया। उसके पास न कोई ऐसा समूह था जो अल्लाह की पकड़ से उसे बचा सके, और न ही वह स्वयं अपनी कोई रक्षा कर सका। यहाँ अल्लाह तआला यह सबक सिखा रहे हैं कि धन, ऐश्वर्य, और सामाजिक स्थिति किसी को अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकती। जब अल्लाह की यातना आती है, तो सारे साधन बेकार हो जाते हैं। यह घटना हर उस इंसान के लिए एक चेतावनी है जो अपनी ताकत, धन या पद पर घमंड करता है और अल्लाह के हुक्मों को भूल जाता है। अल्लाह तआला अपने बंदों को इस क़िस्से के माध्यम से सीधे रास्ते पर चलने की तरग़ीब देते हैं, ताकि वे दुनिया के धोखे में न पड़ें और अल्लाह की रहमत और उसकी पनाह को अपना सबसे बड़ा सहारा बनाएँ। याद रखें, अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, लेकिन उसकी रहमत उन लोगों के लिए है जो उसकी ओर झुकते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं।
ग़रज़ (एक दिन क़ारुन) अपनी क़ौम के सामने बड़ी आराइश और ठाठ के साथ निकला तो जो लोग दुनिया को (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी के तालिब थे (इस शान से देख कर) कहने लगे जो माल व दौलत क़ारुन को अता हुई है काश मेरे लिए भी होती इसमें शक नहीं कि क़ारुन बड़ा नसीब वर था
और जिन लोगों को (हमारी बारगाह में) इल्म अता हुआ था कहनें लगे तुम्हारा नास हो जाए (अरे) जो शख्स ईमान लाए और अच्छे काम करे उसके लिए तो ख़ुदा का सवाब इससे कही बेहतर है और वह तो अब सब्र करने वालों के सिवा दूसरे नहीं पा सकते
और जिन लोगों ने कल उसके जाह व मरतबे की तमन्ना की थी वह (आज ये तमाशा देखकर) कहने लगे अरे माज़अल्लाह ये तो ख़ुदा ही अपने बन्दों से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग कर देता है और अगर (कहीं) ख़ुदा हम पर मेहरबानी न करता (और इतना माल दे देता) तो उसकी तरह हमको भी ज़रुर धॅसा देता-और माज़अल्लाह (सच है) हरगिज़ कुफ्फार अपनी मुरादें न पाएँगें
ये आख़िरत का घर तो हम उन्हीं लोगों के लिए ख़ास कर देगें जो रुए ज़मीन पर न सरकशी करना चाहते हैं और न फसाद-और (सच भी यूँ ही है कि) फिर अन्जाम तो परहेज़गारों ही का है
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