अल-क़सस · 80/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ اللَّهِ خَيْرٌ لِّمَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا وَلَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الصَّابِرُونَ ۝٨٠
Wa qaalal lazeena ootul `ilma wailakum sawaabul laahi khairul liman aamana wa `amila saalihaa; wa laa yulaq qaahaaa illas saabiroon
📖 हिंदी अर्थ
और जिन लोगों को (हमारी बारगाह में) इल्म अता हुआ था कहनें लगे तुम्हारा नास हो जाए (अरे) जो शख्स ईमान लाए और अच्छे काम करे उसके लिए तो ख़ुदा का सवाब इससे कही बेहतर है और वह तो अब सब्र करने वालों के सिवा दूसरे नहीं पा सकते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • वैलकुम (ويلكم): यह शब्द मूल रूप से हलाकत (विनाश) की दुआ के लिए आता है, लेकिन यहाँ इसका प्रयोग डाँट-फटकार और सावधान करने के अर्थ में हुआ है।
  • सवाबुल्लाह (ثواب الله): अल्लाह का इनाम और प्रतिफल, जो आख़िरत में मोमिनों को मिलेगा।
  • ला युलक़्क़ाहा (لا يلقاها): इस वाक्य का अर्थ है कि यह बात (नसीहत) और इस पर अमल करने की तौफ़ीक़ किसी को नहीं मिलती।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब क़ारून अपनी शानो-शौकत और ठाठ-बाठ के साथ निकला, तो कुछ लोगों ने दुनिया की इस चमक-दमक को देखकर दिल ही दिल में तमन्ना की: "काश! हमें भी वह कुछ मिलता जो क़ारून को मिला है।" उनकी यह आरज़ू सिर्फ़ ज़बान पर नहीं थी, बल्कि उनके दिलों में दुनिया की मुहब्बत और आख़िरत से ग़ाफ़िल होने की निशानी थी।

इसी मौके़ पर अल्लाह के दीन और उसकी किताब का इल्म रखने वाले सच्चे विद्वान, जो दुनिया की हक़ीक़त को समझते थे और आख़िरत के इनाम को जानते थे, उन्होंने उन लोगों को नसीहत करते हुए कहा: "तुम पर अफ़सोस! अल्लाह का डर रखो और उसकी नाफ़रमानी से बचो।" उन्होंने उन्हें समझाया कि अल्लाह का इनाम और उसका सवाब, जो उसने अपने मोमिन और नेक बंदों के लिए आख़िरत में तैयार किया है, उस दुनियावी माल से कहीं बेहतर और पाकीज़ा है जो क़ारून को दिया गया। यह इनाम उन लोगों के लिए है जो अल्लाह पर ईमान लाएँ और नेक अमल करें।

फिर अल्लाह तआला ने एक बड़ी हक़ीक़त बयान की कि यह नसीहत कबूल करने और इस पर अमल करने की तौफ़ीक़ सिर्फ़ उन्हीं को मिलती है जो सब्र करने वाले हैं। यानी जो लोग दुनिया की चमक-दमक और लुभावनी चीज़ों से मुँह मोड़कर अल्लाह की इताअत पर डटे रहते हैं, जो अपनी नफ़्स को काबू में रखते हैं और गुनाहों से बचते हैं, वही इस नसीहत से फ़ायदा उठाते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें एक अहम सबक़ सिखाती है कि दुनिया का माल और ठाठ-बाठ कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह फ़ानी और चंद रोज़ की ज़िंदगी का साज़ो-सामान है। अल्लाह का सवाब और उसकी रज़ा ही असली कामयाबी है। हमें चाहिए कि हम दुनिया की दौलत को अपना निशाना न बनाएँ, बल्कि अपनी निगाहें आख़िरत की तरफ़ रखें। जो लोग इस दुनिया में सब्र करते हैं और अल्लाह की राह पर चलते हैं, उनके लिए ऐसा इनाम है जो किसी भी दुनियावी ख़ज़ाने से बढ़कर है। यही सब्र और परहेज़गारी हमें उस कामयाबी तक पहुँचाती है जो कभी ख़त्म नहीं होती।

🎧 सुनें

📜 आयत 78-82 — अल-क़सस

78قَالَ إِنَّمَا أُوتِيتُهُ عَلَىٰ عِلْمٍ عِندِي ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِن قَبْلِهِ مِنَ الْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةً وَأَكْثَرُ جَمْعًا ۚ وَلَا يُسْأَلُ عَن ذُنُوبِهِمُ الْمُجْرِمُونَ
तो क़ारुन कहने लगा कि ये (माल व दौलत) तो मुझे अपने इल्म (कीमिया) की वजह से हासिल होता है क्या क़ारुन ने ये भी न ख्याल किया कि अल्लाह उसके पहले उन लोगों को हलाक़ कर चुका है जो उससे क़ूवत और हैसियत में कहीं बढ़ बढ़ के थे और गुनाहगारों से (उनकी सज़ा के वक्त) उनके गुनाहों की पूछताछ नहीं हुआ करती
79فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِ فِي زِينَتِهِ ۖ قَالَ الَّذِينَ يُرِيدُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا يَا لَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَا أُوتِيَ قَارُونُ إِنَّهُ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍ
ग़रज़ (एक दिन क़ारुन) अपनी क़ौम के सामने बड़ी आराइश और ठाठ के साथ निकला तो जो लोग दुनिया को (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी के तालिब थे (इस शान से देख कर) कहने लगे जो माल व दौलत क़ारुन को अता हुई है काश मेरे लिए भी होती इसमें शक नहीं कि क़ारुन बड़ा नसीब वर था
80وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ اللَّهِ خَيْرٌ لِّمَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا وَلَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الصَّابِرُونَ
और जिन लोगों को (हमारी बारगाह में) इल्म अता हुआ था कहनें लगे तुम्हारा नास हो जाए (अरे) जो शख्स ईमान लाए और अच्छे काम करे उसके लिए तो ख़ुदा का सवाब इससे कही बेहतर है और वह तो अब सब्र करने वालों के सिवा दूसरे नहीं पा सकते
81فَخَسَفْنَا بِهِ وَبِدَارِهِ الْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُ مِن فِئَةٍ يَنصُرُونَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُنتَصِرِينَ
और हमने क़ारुन और उसके घर बार को ज़मीन में धंसा दिया फिर ख़ुदा के सिवा कोई जमाअत ऐसी न थी कि उसकी मदद करती और न खुद आप अपनी मदद आप कर सका
82وَأَصْبَحَ الَّذِينَ تَمَنَّوْا مَكَانَهُ بِالْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَا أَن مَّنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ
और जिन लोगों ने कल उसके जाह व मरतबे की तमन्ना की थी वह (आज ये तमाशा देखकर) कहने लगे अरे माज़अल्लाह ये तो ख़ुदा ही अपने बन्दों से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग कर देता है और अगर (कहीं) ख़ुदा हम पर मेहरबानी न करता (और इतना माल दे देता) तो उसकी तरह हमको भी ज़रुर धॅसा देता-और माज़अल्लाह (सच है) हरगिज़ कुफ्फार अपनी मुरादें न पाएँगें
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अनुवाद — अल-क़सस 80

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Tuesday, August 18, 2026

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