अल-अंकबूत · 14/69
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंकबूत
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَلَبِثَ فِيهِمْ أَلْفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمْسِينَ عَامًا فَأَخَذَهُمُ الطُّوفَانُ وَهُمْ ظَالِمُونَ ۝١٤
Wa laqad arsalnaa Noohan ilaa qawmihee falabisa feehim alfa sanatin illaa khamseena `aaman fa akhazahumut toofaanu wa hum zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
और हमने नूह को उनकी क़ौम के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा तो वह उनमें पचास कम हज़ार बरस रहे (और हिदायत किया किए और जब न माना) तो आख़िर तूफान ने उन्हें ले डाला और वह उस वक्त भी सरकश ही थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَلَبِثَ: रुके रहे, ठहरे रहे।
  • الطُّوفَانُ: वह सैलाब (पानी का तूफ़ान) जो हर चीज़ को घेर ले और डुबो दे।
  • ظَالِمُونَ: अत्याचारी, काफ़िर, जो अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे थे (शिर्क और नाफ़रमानी के कारण)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को उनकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा। वे अपनी क़ौम के बीच नौ सौ पचास (950) साल तक रहे — यानी एक हज़ार साल कम पचास साल। इस लंबी अवधि में उन्होंने दिन-रात अपनी क़ौम को तौहीद (एक अल्लाह की इबादत) की ओर बुलाया, शिर्क से डराया, और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से सावधान किया। मगर उनकी क़ौम ने उनकी दावत को ठुकराया, उन्हें झुठलाया और अपने कुफ़्र और सरकशी पर अड़ी रही। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब देखा कि उनकी क़ौम ईमान नहीं लाएगी, तो उन्होंने अल्लाह से उनके लिए हलाकत की दुआ माँगी। आख़िरकार अल्लाह का फ़ैसला आया — उन पर तूफ़ान (सैलाब) भेजा गया, जिसने उन्हें पूरी तरह डुबो दिया। वे उस वक़्त भी ज़ालिम थे, यानी अपने शिर्क और नाफ़रमानी के कारण अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे। यह घटना हमारे लिए बड़ी सबक़ है — अल्लाह की दावत को ठुकराने वालों का अंजाम क्या होता है, और सब्र व दावत में हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की सीरत हमारे लिए मिसाल है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि नबी और दावत देने वालों को सब्र और मेहनत से काम लेना चाहिए। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने 950 साल तक अपनी क़ौम को बुलाया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। यह हमारे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा है कि हम अपने परिवार, समाज और दोस्तों को अच्छाई की ओर बुलाते रहें, चाहे लोग मानें या न मानें। साथ ही, यह आयत अल्लाह के अज़ाब से डराती है — जो लोग हक़ को ठुकराते हैं और ज़ुल्म पर अड़े रहते हैं, उनका अंजाम बहुत बुरा होता है। अल्लाह रहम करने वाला है, मगर उसकी पकड़ भी बहुत सख़्त है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में तौहीद को अपनाएँ, शिर्क और गुनाहों से बचें, और अल्लाह के रसूलों (अलैहिमुस्सलाम) की सीरत से सबक़ लें। यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की मदद हमेशा सच्चे बंदों के साथ होती है — नूह (अलैहिस्सलाम) और उनके साथी बच गए, जबकि ज़ालिम डूब गए।



📜 आयत 12-16 — सूरा अल-अंकबूत

12وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا اتَّبِعُوا سَبِيلَنَا وَلْنَحْمِلْ خَطَايَاكُمْ وَمَا هُم بِحَامِلِينَ مِنْ خَطَايَاهُم مِّن شَيْءٍ ۖ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
और कुफ्फार ईमान वालों से कहने लगे कि हमारे तरीक़े पर चलो और (क़यामत में) तुम्हारे गुनाहों (के बोझ) को हम (अपने सर) ले लेंगे हालॉकि ये लोग ज़रा भी तो उनके गुनाह उठाने वाले नहीं ये लोग यक़ीनी झूठे हैं
13وَلَيَحْمِلُنَّ أَثْقَالَهُمْ وَأَثْقَالًا مَّعَ أَثْقَالِهِمْ ۖ وَلَيُسْأَلُنَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عَمَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
और (हाँ) ये लोग अपने (गुनाह के) बोझे तो यक़ीनी उठाएँगें ही और अपने बोझो के साथ जिन्हें गुमराह किया उनके बोझे भी उठाएँगे और जो इफ़ितेरा परदाज़िया ये लोग करते रहे हैं क़यामत के दिन उन से ज़रुर उसकी बाज़पुर्स होगी
14وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَلَبِثَ فِيهِمْ أَلْفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمْسِينَ عَامًا فَأَخَذَهُمُ الطُّوفَانُ وَهُمْ ظَالِمُونَ
और हमने नूह को उनकी क़ौम के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा तो वह उनमें पचास कम हज़ार बरस रहे (और हिदायत किया किए और जब न माना) तो आख़िर तूफान ने उन्हें ले डाला और वह उस वक्त भी सरकश ही थे
15فَأَنجَيْنَاهُ وَأَصْحَابَ السَّفِينَةِ وَجَعَلْنَاهَا آيَةً لِّلْعَالَمِينَ
फिर हमने नूह और कश्ती में रहने वालों को बचा लिया और हमने इस वाक़िये को सारी ख़ुदाई के वास्ते (अपनी क़ुदरत की) निशानी क़रार दी
16وَإِبْرَاهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ ۖ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
और इबराहीम को (याद करो) जब उन्होंने कहा कि (भाईयों) ख़ुदा की इबादत करो और उससे डरो अगर तुम समझते बूझते हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीअवतरण स्थान
14आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 14

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Friday, October 2, 2026

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