आल-इमरान · 121/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ۝١٢١
Wa iz ghadawta min ahlika tubawwi`ul mu`mineena maqaa`ida lilqitaal; wallaahu samee`un `aleem
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) एक वक्त वो भी था जब तुम अपने बाल बच्चों से तड़के ही निकल खड़े हुए और मोमिनीन को लड़ाई के मोर्चों पर बिठा रहे थे और खुदा सब कुछ जानता और सुनता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • غَدَوْتَ: तुम सुबह के समय निकले।
  • تُبَوِّئُ: तुम स्थान निर्धारित कर रहे थे, यानी हर व्यक्ति को उसका ठिकाना बता रहे थे।
  • مَقَاعِدَ: ठहरने के स्थान, युद्ध के लिए निर्धारित मोर्चे।

व्याख्या:

हे नबी! उस समय को याद करो जब तुम उहुद के युद्ध के लिए सुबह-सुबह अपने घर से निकले थे। तुम मदीना से बाहर निकलकर मुसलमानों को युद्ध के लिए उनके स्थानों पर बैठा रहे थे, यानी हर सैनिक को उसकी जगह तय कर रहे थे कि कौन कहाँ खड़ा होगा और किस तरह से मुशरिकीन (बहुदेववादियों) का मुकाबला करेगा। यह तुम्हारी रणनीतिक व्यवस्था थी, जिससे मुसलमानों का मोर्चा मजबूत हो। अल्लाह तुम्हारी हर बात सुन रहा है और तुम्हारे हर काम को जान रहा है — चाहे वह छिपा हो या खुला। वह तुम्हारी नीयतों और कार्यों से पूरी तरह अवगत है, और इसी के अनुसार वह तुम्हें बदला देगा।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह के नबी की सुन्नत (तरीका) यही है कि मुसलमानों को हर काम में संगठित किया जाए, खासकर युद्ध जैसे महत्वपूर्ण मामले में। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने जीवन के हर क्षेत्र में व्यवस्था और अनुशासन अपनाना चाहिए।
  2. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह हर समय हमारी बातें सुनता है और हमारे कर्मों को देखता है। इसका एहसास हमें अच्छे काम करने और बुराई से बचने की प्रेरणा देता है।
  3. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का उहुद के दिन का यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत और सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए, और अल्लाह पर भरोसा रखते हुए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
  4. यह आयत मुसलमानों को एकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाती है, क्योंकि नबी ने हर व्यक्ति को उसकी स्थिति के अनुसार जगह दी, जो यह दर्शाता है कि हर व्यक्ति की अपनी अहमियत है और सबको मिलकर काम करना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 119-123 — आल-इमरान

119هَا أَنتُمْ أُولَاءِ تُحِبُّونَهُمْ وَلَا يُحِبُّونَكُمْ وَتُؤْمِنُونَ بِالْكِتَابِ كُلِّهِ وَإِذَا لَقُوكُمْ قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا عَضُّوا عَلَيْكُمُ الْأَنَامِلَ مِنَ الْغَيْظِ ۚ قُلْ مُوتُوا بِغَيْظِكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
ऐ लोगों तुम ऐसे (सीधे) हो कि तुम उनसे उलफ़त रखतो हो और वह तुम्हें (ज़रा भी) नहीं चाहते और तुम तो पूरी किताब (ख़ुदा) पर ईमान रखते हो और वह ऐसे नहीं हैं (मगर) जब तुमसे मिलते हैं तो कहने लगते हैं कि हम भी ईमान लाए और जब अकेले में होते हैं तो तुम पर गुस्से के मारे उंगलियों काटते हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (काटना क्या) तुम अपने गुस्से में जल मरो जो बातें तुम्हारे दिलों में हैं बेशक ख़ुदा ज़रूर जानता है
120إِن تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ وَإِن تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌ يَفْرَحُوا بِهَا ۖ وَإِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا ۗ إِنَّ اللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ
(ऐ ईमानदारों) अगर तुमको भलाई छू भी गयी तो उनको बुरा मालूम होता है और जब तुमपर कोई भी मुसीबत पड़ती है तो वह ख़ुश हो जाते हैं और अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी इख्तेयार करो तो उनका फ़रेब तुम्हें कुछ भी ज़रर नहीं पहुंचाएगा (क्योंकि) ख़ुदा तो उनकी कारस्तानियों पर हावी है
121وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और (ऐ रसूल) एक वक्त वो भी था जब तुम अपने बाल बच्चों से तड़के ही निकल खड़े हुए और मोमिनीन को लड़ाई के मोर्चों पर बिठा रहे थे और खुदा सब कुछ जानता और सुनता है
122إِذْ هَمَّت طَّائِفَتَانِ مِنكُمْ أَن تَفْشَلَا وَاللَّهُ وَلِيُّهُمَا ۗ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
ये उस वक्त क़ा वाक़या है जब तुममें से दो गिरोहों ने ठान लिया था कि पसपाई करें और फिर (सॅभल गए) क्योंकि ख़ुदा तो उनका सरपरस्त था और मोमिनीन को ख़ुदा ही पर भरोसा रखना चाहिये
123وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌ ۖ فَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
यक़ीनन ख़ुदा ने जंगे बदर में तुम्हारी मदद की (बावजूद के) तुम (दुश्मन के मुक़ाबले में) बिल्कुल बे हक़ीक़त थे (फिर भी) ख़ुदा ने फतेह दी
आल-इमरानकुरान सूची
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अनुवाद — आल-इमरान 121

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Tuesday, August 18, 2026

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