आल-इमरान · 120/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
إِن تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ وَإِن تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌ يَفْرَحُوا بِهَا ۖ وَإِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا ۗ إِنَّ اللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ ۝١٢٠
In tamsaskum hasanatun tasu`hum wa in tusibkum saiyi`atuny yafrahoo bihaa wa in tasbiroo wa tattaqoo laa yad urrukum kaiduhum shai`aa; innal laaha bimaa ya`maloona muheet
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ ईमानदारों) अगर तुमको भलाई छू भी गयी तो उनको बुरा मालूम होता है और जब तुमपर कोई भी मुसीबत पड़ती है तो वह ख़ुश हो जाते हैं और अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी इख्तेयार करो तो उनका फ़रेब तुम्हें कुछ भी ज़रर नहीं पहुंचाएगा (क्योंकि) ख़ुदा तो उनकी कारस्तानियों पर हावी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَمْسَسْكُمْ / تُصِبْكُمْ: तुम्हें पहुँचे, छू जाए।
  • حَسَنَةٌ: भलाई, अर्थात् विजय, ग़नीमत (युद्ध-धन) और वह सब कुछ जो तुम्हारी स्थिति को अच्छा बनाए।
  • تَسُؤْهُمْ: उन्हें दुखी करती है।
  • سَيِّئَةٌ: बुराई, अर्थात् हार, अकाल, धन-जन की हानि।
  • يَفْرَحُوا بِهَا: वे उससे खुश होते हैं।
  • كَيْدُهُمْ: उनकी चालाकी, साज़िश और बुराई।
  • مُحِيطٌ: घेरने वाला, सब कुछ अपने ज्ञान और शक्ति से नियंत्रित करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालो! इन काफ़िरों की दुश्मनी का हाल यह है कि अगर तुम्हें कोई भलाई पहुँचती है—जैसे दुश्मन पर विजय, माल-दौलत में बरकत, या कोई और खुशी—तो उन्हें यह देखकर ग़म और रंज होता है। और अगर तुम पर कोई मुसीबत आती है—जैसे हार, धन-जन की कमी, या कोई दुख—तो वे उस पर खुश होते हैं और तुम्हारा मज़ाक उड़ाते हैं। यह उनकी आदत है, और वे हमेशा तुम्हारे लिए बुराई की ताक में रहते हैं।

लेकिन अल्लाह तुम्हें इसका हल बताता है: अगर तुम सब्र करो—यानी उनकी दुश्मनी और तकलीफों पर धैर्य रखो, और अल्लाह के फैसलों पर संतुष्ट रहो—और तक़वा अपनाओ—यानी अल्लाह के हुक्मों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो—तो उनकी साज़िशें और चालें तुम्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकतीं। क्योंकि अल्लाह उनकी हर चाल को जानता है, और उसकी शक्ति उन्हें पूरी तरह घेरे हुए है। वह उन्हें उनके किए की सज़ा ज़रूर देगा, और तुम्हें उनके शर से बचाएगा।


फ़ायदे (सबक):

  1. सब्र और तक़वा ही असली ढाल हैं: दुश्मन की चालें तभी बेअसर होती हैं जब हम अल्लाह पर भरोसा रखें और उसके हुक्मों पर चलें। यही हमारी असली ताक़त है।
  2. दुश्मन की खुशी से परेशान न हों: जब दुश्मन हमारी मुसीबत पर खुश होते हैं, तो हमें उदास नहीं होना चाहिए, बल्कि अल्लाह की तरफ रुजू करना चाहिए, क्योंकि वही हमारा रक्षक है।
  3. अल्लाह की निगरानी का एहसास: यह आयत हमें यकीन दिलाती है कि अल्लाह हर चीज़ को देख रहा है और हर साज़िश उसकी पकड़ में है। इससे दिल को सुकून मिलता है कि हम अकेले नहीं हैं।
  4. मुसीबत में भी इम्तिहान: मुसीबतें हमारे सब्र की परीक्षा हैं, और उन पर सब्र करने से हमारा दर्जा बुलंद होता है। यही ईमान की निशानी है।
  5. दुश्मन से नफ़रत नहीं, सब्र से काम: हमें दुश्मन की बुराई का जवाब बुराई से नहीं, बल्कि सब्र और अल्लाह पर भरोसे से देना चाहिए, क्योंकि अंजाम अल्लाह के हाथ में है।


📜 आयत 118-122 — आल-इमरान

118يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِّن دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ
ऐ ईमानदारों अपने (मोमिनीन) के सिवा (गैरो को) अपना राज़दार न बनाओ (क्योंकि) ये गैर लोग तुम्हारी बरबादी में कुछ उठा नहीं रखेंगे (बल्कि जितना ज्यादा तकलीफ़) में पड़ोगे उतना ही ये लोग ख़ुश होंगे दुश्मनी तो उनके मुंह से टपकती है और जो (बुग़ज़ व हसद) उनके दिलों में भरा है वह कहीं उससे बढ़कर है हमने तुमसे (अपने) एहकाम साफ़ साफ़ बयान कर दिये अगर तुम समझ रखते हो
119هَا أَنتُمْ أُولَاءِ تُحِبُّونَهُمْ وَلَا يُحِبُّونَكُمْ وَتُؤْمِنُونَ بِالْكِتَابِ كُلِّهِ وَإِذَا لَقُوكُمْ قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا عَضُّوا عَلَيْكُمُ الْأَنَامِلَ مِنَ الْغَيْظِ ۚ قُلْ مُوتُوا بِغَيْظِكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
ऐ लोगों तुम ऐसे (सीधे) हो कि तुम उनसे उलफ़त रखतो हो और वह तुम्हें (ज़रा भी) नहीं चाहते और तुम तो पूरी किताब (ख़ुदा) पर ईमान रखते हो और वह ऐसे नहीं हैं (मगर) जब तुमसे मिलते हैं तो कहने लगते हैं कि हम भी ईमान लाए और जब अकेले में होते हैं तो तुम पर गुस्से के मारे उंगलियों काटते हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (काटना क्या) तुम अपने गुस्से में जल मरो जो बातें तुम्हारे दिलों में हैं बेशक ख़ुदा ज़रूर जानता है
120إِن تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ وَإِن تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌ يَفْرَحُوا بِهَا ۖ وَإِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا ۗ إِنَّ اللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ
(ऐ ईमानदारों) अगर तुमको भलाई छू भी गयी तो उनको बुरा मालूम होता है और जब तुमपर कोई भी मुसीबत पड़ती है तो वह ख़ुश हो जाते हैं और अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी इख्तेयार करो तो उनका फ़रेब तुम्हें कुछ भी ज़रर नहीं पहुंचाएगा (क्योंकि) ख़ुदा तो उनकी कारस्तानियों पर हावी है
121وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और (ऐ रसूल) एक वक्त वो भी था जब तुम अपने बाल बच्चों से तड़के ही निकल खड़े हुए और मोमिनीन को लड़ाई के मोर्चों पर बिठा रहे थे और खुदा सब कुछ जानता और सुनता है
122إِذْ هَمَّت طَّائِفَتَانِ مِنكُمْ أَن تَفْشَلَا وَاللَّهُ وَلِيُّهُمَا ۗ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
ये उस वक्त क़ा वाक़या है जब तुममें से दो गिरोहों ने ठान लिया था कि पसपाई करें और फिर (सॅभल गए) क्योंकि ख़ुदा तो उनका सरपरस्त था और मोमिनीन को ख़ुदा ही पर भरोसा रखना चाहिये
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अनुवाद — आल-इमरान 120

सूरा आल-इमरान आयत 120 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ ईमानदारों) अगर तुमको भलाई छू भी गयी तो उनको…

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Tuesday, August 18, 2026

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