आल-इमरान · 41/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
قَالَ رَبِّ اجْعَل لِّي آيَةً ۖ قَالَ آيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ إِلَّا رَمْزًا ۗ وَاذْكُر رَّبَّكَ كَثِيرًا وَسَبِّحْ بِالْعَشِيِّ وَالْإِبْكَارِ ۝٤١
Qaala Rabbij `al leee Aayatan qaala Aaayatuka allaa tukalliman naasa salaasata ayyaamin illa ramzaa; wzkur Rabbaka kaseeranw wa sabbih bil`ashiyyi wal ibkaar
📖 हिंदी अर्थ
ज़करिया ने अर्ज़ की परवरदिगार मेरे इत्मेनान के लिए कोई निशानी मुक़र्रर फ़रमा इरशाद हुआ तुम्हारी निशानी ये है तुम तीन दिन तक लोगों से बात न कर सकोगे मगर इशारे से और (उसके शुक्रिये में) अपने परवरदिगार की अक्सर याद करो और रात को और सुबह तड़के (हमारी) तसबीह किया करो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • आयत: निशानी, चिह्न
  • रम्ज़: इशारा, संकेत
  • अशिय्य: दोपहर ढलने से सूर्यास्त तक का समय
  • इब्कार: सुबह की शुरुआत, फज्र से लेकर चाश्त तक का समय

तफसीर:

हज़रत ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) ने जब यह खुशखबरी सुनी कि उन्हें एक बेटा होगा, तो उन्होंने अल्लाह से एक निशानी माँगी ताकि उनका दिल और अधिक मुत्मइन्न हो और वे इस परिवर्तन को महसूस कर सकें। उन्होंने कहा: "ऐ मेरे रब! मुझे एक निशानी दे दे।" यह निशानी माँगना अल्लाह की क़ुदरत पर शक की वजह से नहीं था, बल्कि यह एक इंसानी फ़ितरत है कि जब कोई बड़ी खुशखबरी मिलती है तो दिल चाहता है कि उसकी कोई ज़ाहिरी दलील भी देख ली जाए।

अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "तेरी निशानी यह है कि तू तीन दिनों तक लोगों से बात नहीं कर पाएगा, सिवाय इशारे के।" यानी उनकी ज़बान बंद हो जाएगी, लेकिन वे बीमार या कमज़ोर नहीं होंगे, बल्कि पूरी तरह सही-सलामत रहेंगे। यह एक मोजिज़ा था कि इंसान स्वस्थ होते हुए भी तीन दिन तक बोलने से क़ासिर रहे। इस दौरान उनका दिल और दिमाग़ पूरी तरह काम करता रहेगा, लेकिन ज़बान से बोलना मुमकिन नहीं होगा।

इसी के साथ अल्लाह ने उन्हें नसीहत फ़रमाई: "और तू अपने रब का बहुत ज़्यादा ज़िक्र कर और सुबह-शाम उसकी तस्बीह कर।" यानी जब तुम लोगों से बात नहीं कर सकते, तो इस वक़्त को अल्लाह की इबादत और ज़िक्र में बिताओ। यह नसीहत सिर्फ़ हज़रत ज़करिय्या के लिए नहीं, बल्कि हर मोमिन के लिए एक सबक़ है कि जब भी हम किसी मुसीबत या परेशानी में हों, या हमारे पास खाली वक़्त हो, तो हमें अल्लाह का ज़िक्र करना चाहिए। ज़िक्र से दिल को सुकून मिलता है और इंसान अल्लाह के और क़रीब होता है।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को मुश्किल वक़्त में भी नहीं भूलता। जब हज़रत ज़करिय्या ने अल्लाह से दुआ माँगी, तो अल्लाह ने उन्हें न सिर्फ़ बेटे की खुशखबरी दी, बल्कि उन्हें अपनी याद में और अधिक मशगूल रहने की तौफ़ीक़ भी दी। यह हमारे लिए भी एक प्रेरणा है कि हम अपनी ज़िंदगी के हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें और उसका ज़िक्र करते रहें। जब हम अल्लाह को याद करते हैं, तो अल्लाह हमें और अधिक नेमतें देता है और हमारे दिलों को सुकून अता फ़रमाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 39-43 — आल-इमरान

39فَنَادَتْهُ الْمَلَائِكَةُ وَهُوَ قَائِمٌ يُصَلِّي فِي الْمِحْرَابِ أَنَّ اللَّهَ يُبَشِّرُكَ بِيَحْيَىٰ مُصَدِّقًا بِكَلِمَةٍ مِّنَ اللَّهِ وَسَيِّدًا وَحَصُورًا وَنَبِيًّا مِّنَ الصَّالِحِينَ
अभी ज़करिया हुजरे में खड़े (ये) दुआ कर ही रहे थे कि फ़रिश्तों ने उनको आवाज़ दी कि ख़ुदा तुमको यहया (के पैदा होने) की खुशख़बरी देता है जो जो कलेमतुल्लाह (ईसा) की तस्दीक़ करेगा और (लोगों का) सरदार होगा और औरतों की तरफ़ रग़बत न करेगा और नेको कार नबी होगा
40قَالَ رَبِّ أَنَّىٰ يَكُونُ لِي غُلَامٌ وَقَدْ بَلَغَنِيَ الْكِبَرُ وَامْرَأَتِي عَاقِرٌ ۖ قَالَ كَذَٰلِكَ اللَّهُ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ
ज़करिया ने अर्ज़ की परवरदिगार मुझे लड़का क्योंकर हो सकता है हालॉकि मेरा बुढ़ापा आ पहुंचा और (उसपर) मेरी बीवी बॉझ है (ख़ुदा ने) फ़रमाया इसी तरह ख़ुदा जो चाहता है करता है
41قَالَ رَبِّ اجْعَل لِّي آيَةً ۖ قَالَ آيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ إِلَّا رَمْزًا ۗ وَاذْكُر رَّبَّكَ كَثِيرًا وَسَبِّحْ بِالْعَشِيِّ وَالْإِبْكَارِ
ज़करिया ने अर्ज़ की परवरदिगार मेरे इत्मेनान के लिए कोई निशानी मुक़र्रर फ़रमा इरशाद हुआ तुम्हारी निशानी ये है तुम तीन दिन तक लोगों से बात न कर सकोगे मगर इशारे से और (उसके शुक्रिये में) अपने परवरदिगार की अक्सर याद करो और रात को और सुबह तड़के (हमारी) तसबीह किया करो
42وَإِذْ قَالَتِ الْمَلَائِكَةُ يَا مَرْيَمُ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاكِ وَطَهَّرَكِ وَاصْطَفَاكِ عَلَىٰ نِسَاءِ الْعَالَمِينَ
और वह वाक़िया भी याद करो जब फ़रिश्तों ने मरियम से कहा, ऐ मरियम तुमको ख़ुदा ने बरगुज़ीदा किया और (तमाम) गुनाहों और बुराइयों से पाक साफ़ रखा और सारे दुनिया जहॉन की औरतों में से तुमको मुन्तख़िब किया है
43يَا مَرْيَمُ اقْنُتِي لِرَبِّكِ وَاسْجُدِي وَارْكَعِي مَعَ الرَّاكِعِينَ
(तो) ऐ मरियम इसके शुक्र से मैं अपने परवरदिगार की फ़रमाबदारी करूं सजदा और रूकूउ करने वालों के साथ रूकूउ करती रहूं
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अनुवाद — आल-इमरान 41

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Tuesday, August 18, 2026

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