अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- हा अनतुम – सुनो तुम लोग!
- हाज़ाज्तुम – तुमने झगड़ा किया / विवाद किया
- फ़ीमा लकुम बिही इल्म – उस चीज़ में जिसका तुम्हें ज्ञान है
- फ़लीम तुहाज्जून – तो क्यों झगड़ते हो
- फ़ीमा लैसा लकुम बिही इल्म – उस चीज़ में जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं
विस्तृत तफ़सीर:
ऐ अहले-किताब! तुम लोगों ने उन मामलों में तो झगड़ा किया, जिनका तुम्हें कुछ ज्ञान था—जैसे अपनी किताबों (तौरात और इंजील) में मौजूद बातों के बारे में, और अपने पैग़म्बरों के बारे में। तुमने हज़रत मूसा और हज़रत ईसा (अलैहिमुस्सलाम) के मामले में बहस की, क्योंकि तुम्हारे पास उनके बारे में कुछ जानकारी थी। लेकिन अब तुम उस चीज़ के बारे में क्यों झगड़ रहे हो, जिसका तुम्हें बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है—यानी हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का मामला? तुम्हारी किताबों में उनके बारे में वह विस्तृत जानकारी मौजूद ही नहीं है, और न ही तुम्हारे पास कोई प्रमाण है। तुम बिना ज्ञान के उस चीज़ में क्यों उलझ रहे हो, जिसकी हक़ीक़त तुम नहीं जानते?
यह बड़ी अजीब बात है कि जिस मामले में तुम्हें ज्ञान था, उसमें भी तुमने सही रास्ता नहीं अपनाया और गलत बहस की, और जिस मामले में तुम्हें कोई ज्ञान ही नहीं, उसमें भी तुम मुँह मारते चले आ रहे हो। क्या यह तुम्हारी नादानी नहीं है?
अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।" यानी हक़ीक़त का पूरा इल्म सिर्फ़ अल्लाह के पास है। वह जानता है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) असल में किस दीन पर थे, उनका रिश्ता किन लोगों से था और किनसे नहीं। तुम लोग केवल अपने ख़यालात और गुमान पर चल रहे हो। अल्लाह ने क़ुरआन में साफ़ बता दिया कि हज़रत इब्राहीम न तो यहूदी थे और न नसरानी, बल्कि वह एक मुस्लिम (अल्लाह के आज्ञाकारी) और एकेश्वरवादी थे, और वह मुशरिकों में से नहीं थे।
दावत और नसीहत:
इस आयत में हमारे लिए बहुत बड़ी सीख है! कितनी बार हम इंसान उन चीज़ों के बारे में बहस करते हैं, जिनका हमें कोई ज्ञान नहीं होता। हम बिना सोचे-समझे, बिना प्रमाण के ऐसी बातें करते हैं जिनकी हक़ीक़त से हम वाक़िफ़ नहीं होते। यह आयत हमें सिखाती है कि जिस चीज़ का इल्म न हो, उसके बारे में चुप रहना ही बेहतर है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन में हमें सच्चा इल्म दिया है—वह इल्म जो हमें सीधे रास्ते पर चलाता है। हमें चाहिए कि हम क़ुरआन और सुन्नत को अपना मरजा (संदर्भ) बनाएँ, न कि अपने अनुमानों और अटकलों को। अल्लाह से दुआ करें कि वह हमें सही इल्म दे और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन!
📜 आयत 64-68 — आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 66
सूरा आल-इमरान आयत 66 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते? (ऐ लो अरे)…सूरा आयत 66/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 64–68. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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