ऐ अहले किताब तुम इबराहीम के बारे में (ख्वाह मा ख्वाह) क्यों झगड़ते हो कि कोई उनको नसरानी कहता है कोई यहूदी हालॉकि तौरेत व इन्जील (जिनसे यहूद व नसारा की इब्तेदा है वह) तो उनके बाद ही नाज़िल हुई
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اے اہلِ کتاب تم ابراہیم کے بارے میں کیوں جھگڑتے ہو حالانکہ تورات اور انجیل ان کے بعد اتری ہیں (اور وہ پہلے ہو چکے ہیں) تو کیا تم عقل نہیں رکھتے
تُحَاجُّونَ: तुम झगड़ा करते हो, विवाद करते हो, तर्क-वितर्क करते हो।
إِبْرَاهِيمَ: पैगंबर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम)।
مِن بَعْدِهِ: उनके (इब्राहीम के) बाद।
तफसीर:
ऐ किताब वालो (यहूदियों और ईसाइयों)! तुम इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में झगड़ा क्यों करते हो? तुममें से यहूदी दावा करते हैं कि इब्राहीम यहूदी थे, और ईसाई दावा करते हैं कि वे ईसाई थे। जबकि तुम्हें स्वयं यह मालूम है कि तौरात (तोराह) तो मूसा (अलैहिस्सलाम) पर और इंजील ईसा (अलैहिस्सलाम) पर उतारी गई, और ये दोनों किताबें इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बहुत बाद उतारी गईं। इब्राहीम और मूसा के बीच सैकड़ों वर्षों का अंतराल था, और इब्राहीम और ईसा के बीच तो और भी अधिक। फिर यहूदी धर्म और ईसाई धर्म तो इन किताबों के उतरने के बाद ही अस्तित्व में आए। तो फिर तुम कैसे कह सकते हो कि इब्राहीम तुम्हारे धर्म पर थे? क्या तुम अपनी अक्ल से यह नहीं समझते कि तुम्हारा यह दावा बिल्कुल गलत और निराधार है? इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) तो एकेश्वरवादी (हनीफ) थे, उन्होंने अल्लाह के आगे सिर झुकाया और वे मुशरिकों में से नहीं थे। वे उस धर्म पर थे जो अल्लाह ने उन्हें सिखाया था, जो इस्लाम और एकेश्वरवाद का मूल था।
फ़ायदे (लाभ):
तर्क की कमज़ोरी: यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी मामले में बहस करें तो हमारे पास ठोस सबूत और तर्क होने चाहिए। निराधार दावे करना और फिर उस पर अड़े रहना बुद्धिमानी नहीं है।
इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की उच्च स्थिति: यह आयत हमें बताती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के चुने हुए पैगंबर थे और उनका धर्म एकेश्वरवाद (तौहीद) था, जो इस्लाम का ही मूल है। इसलिए हमें उनके नक्शे-कदम पर चलना चाहिए।
अक्ल का इस्तेमाल: अल्लाह तआला हमें बार-बार अपनी अक्ल इस्तेमाल करने की तरगीब देते हैं। जो लोग अक्ल से काम नहीं लेते, वे झूठे दावों में उलझे रहते हैं। सच्चा मुसलमान वही है जो अक्ल और दिल दोनों से अल्लाह की बातों को समझे।
इस्लाम ही सच्चा धर्म है: यह आयत साबित करती है कि इस्लाम ही वह धर्म है जो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से लेकर सभी पैगंबरों का धर्म रहा है। यहूदी और ईसाई धर्म तो बाद में आए, लेकिन इस्लाम का पैगाम हमेशा से एक ही रहा है — अल्लाह की इबादत और उसके आगे सिर झुकाना।
ऐ अहले किताब तुम इबराहीम के बारे में (ख्वाह मा ख्वाह) क्यों झगड़ते हो कि कोई उनको नसरानी कहता है कोई यहूदी हालॉकि तौरेत व इन्जील (जिनसे यहूद व नसारा की इब्तेदा है वह) तो उनके बाद ही नाज़िल हुई
फिर अगर इससे भी मुंह फेरें तो (कुछ) परवाह (नहीं) ख़ुदा फ़सादी लोगों को खूब जानता है (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कहो कि ऐ अहले किताब तुम ऐसी (ठिकाने की) बात पर तो आओ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान यकसॉ है कि खुदा के सिवा किसी की इबादत न करें और किसी चीज़ को उसका शरीक न बनाएं और ख़ुदा के सिवा हममें से कोई किसी को अपना परवरदिगार न बनाए अगर इससे भी मुंह मोडें तो तुम गवाह रहना हम (ख़ुदा के) फ़रमाबरदार हैं
ऐ अहले किताब तुम इबराहीम के बारे में (ख्वाह मा ख्वाह) क्यों झगड़ते हो कि कोई उनको नसरानी कहता है कोई यहूदी हालॉकि तौरेत व इन्जील (जिनसे यहूद व नसारा की इब्तेदा है वह) तो उनके बाद ही नाज़िल हुई
तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते? (ऐ लो अरे) तुम वही एहमक़ लोग हो कि जिस का तुम्हें कुछ इल्म था उसमें तो झगड़ा कर चुके (खैर) फिर तब उसमें क्या (ख्वाह मा ख्वाह) झगड़ने बैठे हो जिसकी (सिरे से) तुम्हें कुछ ख़बर नहीं और (हकॣक़ते हाल तो) खुदा जानता है और तुम नहीं जानते
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