लुकमान · 19/34
अनुवाद उच्चारण — सूरा लुकमान
وَاقْصِدْ فِي مَشْيِكَ وَاغْضُضْ مِن صَوْتِكَ ۚ إِنَّ أَنكَرَ الْأَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَمِيرِ ۝١٩
Waqsid fee mashyika waghdud min sawtik; inna ankaral aswaati lasawtul hameer
📖 हिंदी अर्थ
और दूसरो से बोलने में अपनी आवाज़ धीमी रखो क्योंकि आवाज़ों में तो सब से बुरी आवाज़ (चीख़ने की वजह से) गधों की है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَاقْصِدْ – मध्यम रखो, संतुलित रखो
  • فِي مَشْيِكَ – अपनी चाल में
  • وَاغْضُضْ – नीचा करो, घटाओ
  • مِن صَوْتِكَ – अपनी आवाज़ को
  • أَنكَرَ – सबसे बुरा, सबसे घृणित
  • لَصَوْتُ الْحَمِيرِ – गधों की आवाज़ ही है

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला हज़रत लुक़मान अलैहिस्सलाम की नसीहतों को बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को सिखाया कि अपनी चाल में मध्यम मार्ग अपनाओ। यानी न तो इतनी तेज़ चलो कि शान-ओ-शौकत और घमंड का पता चले, और न ही इतनी धीमी और सुस्त चलो कि कमज़ोरी और बीमारी का अहसास हो। बल्कि एक ऐसी संतुलित चाल चलो जिसमें वक़ार (गरिमा) और सादगी दोनों हों। यह एक मोमिन की पहचान है कि उसका चलना-फिरना, उठना-बैठना, हर अंदाज़ अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा के अनुकूल हो।

इसी तरह अपनी आवाज़ को भी नीचा रखो और उसे ऊँचा न करो। आवाज़ को मध्यम रखो, न बहुत धीमी कि सुनाई ही न दे और न इतनी ऊँची कि दूसरों को तकलीफ़ हो। बात करने का अंदाज़ नरम और सभ्य होना चाहिए। हाँ, जहाँ ज़रूरत हो, जैसे दुश्मन को डराने के लिए या किसी आवश्यक मामले में ऊँची आवाज़ की इजाज़त है, लेकिन आम हालात में आवाज़ को पस्त रखना सुन्नत और अदब है।

फिर अल्लाह तआला इसका कारण बताते हुए फ़रमाते हैं: "क्योंकि सबसे बुरी और घृणित आवाज़ गधों की आवाज़ है।" गधों की आवाज़ बहुत ऊँची, बेसुरी और कर्कश होती है। उसका आरंभ ज़फ़ीर (साँस खींचने की आवाज़) और अंत शहीक़ (साँस छोड़ने की आवाज़) होता है, जो बहुत बुरा और अप्रिय है। यही हाल उस इंसान का है जो बेवजह चिल्लाता है और अपनी आवाज़ को ऊँचा करता है — उसकी आवाज़ भी गधों की आवाज़ जैसी बुरी और नापसंदीदा होती है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम हर पहलू में अदब और अच्छाई सिखाता है। एक मुसलमान की पहचान उसके चलने, बोलने और पेश आने के तरीके से होती है। जब हम अपनी चाल में वक़ार और अपनी आवाज़ में नरमी अपनाते हैं, तो हम दूसरों के दिलों में मुहब्बत और इज़्ज़त पैदा करते हैं। अल्लाह तआला हमें ऐसी आवाज़ से बचाना चाहते हैं जो गधों की आवाज़ जैसी हो — यानी बेहूदा, ऊँची और बेसुरी। यह एक खूबसूरत तालीम है कि इंसान अपनी ज़बान और अपने अंदाज़ को संवारे, क्योंकि यही उसके ईमान और अख़लाक़ की निशानी है। आइए हम अपनी ज़िंदगी में इन प्यारी नसीहतों को अपनाएँ और अपने अंदाज़ को अल्लाह के पसंदीदा अंदाज़ में ढालें।



📜 आयत 17-21 — सूरा लुकमान

17يَا بُنَيَّ أَقِمِ الصَّلَاةَ وَأْمُرْ بِالْمَعْرُوفِ وَانْهَ عَنِ الْمُنكَرِ وَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا أَصَابَكَ ۖ إِنَّ ذَٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ
ऐ बेटा नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा कर और (लोगों से) अच्छा काम करने को कहो और बुरे काम से रोको और जो मुसीबत तुम पर पडे उस पर सब्र करो (क्योंकि) बेशक ये बड़ी हिम्मत का काम है
18وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ
और लोगों के सामने (गुरुर से) अपना मुँह न फुलाना और ज़मीन पर अकड़कर न चलना क्योंकि ख़ुदा किसी अकड़ने वाले और इतराने वाले को दोस्त नहीं रखता और अपनी चाल ढाल में मियाना रवी एख्तेयार करो
19وَاقْصِدْ فِي مَشْيِكَ وَاغْضُضْ مِن صَوْتِكَ ۚ إِنَّ أَنكَرَ الْأَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَمِيرِ
और दूसरो से बोलने में अपनी आवाज़ धीमी रखो क्योंकि आवाज़ों में तो सब से बुरी आवाज़ (चीख़ने की वजह से) गधों की है
20أَلَمْ تَرَوْا أَنَّ اللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَأَسْبَغَ عَلَيْكُمْ نِعَمَهُ ظَاهِرَةً وَبَاطِنَةً ۗ وَمِنَ النَّاسِ مَن يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُّنِيرٍ
क्या तुम लोगों ने इस पर ग़ौर नहीं किया कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही ने यक़ीनी तुम्हारा ताबेए कर दिया है और तुम पर अपनी ज़ाहिरी और बातिनी नेअमतें पूरी कर दीं और बाज़ लोग (नुसर बिन हारिस वगैरह) ऐसे भी हैं जो (ख्वाह मा ख्वाह) ख़ुदा के बारे में झगड़ते हैं (हालॉकि उनके पास) न इल्म है और न हिदायत है और न कोई रौशन किताब है
21وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا ۚ أَوَلَوْ كَانَ الشَّيْطَانُ يَدْعُوهُمْ إِلَىٰ عَذَابِ السَّعِيرِ
और जब उनसे कहा जाता है कि जो (किताब) ख़ुदा ने नाज़िल की है उसकी पैरवी करो तो (छूटते ही) कहते हैं कि नहीं हम तो उसी (तरीक़े से चलेंगे) जिस पर हमने अपने बाप दादाओं को पाया भला अगरचे शैतान उनके बाप दादाओं को जहन्नुम के अज़ाब की तरफ बुलाता रहा हो (तो भी उन्ही की पैरवी करेंगे)
लुकमानकुरान सूची
34आयत
मक्कीअवतरण स्थान
19आयत

अनुवाद — लुकमान 19

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Friday, October 2, 2026

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