Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- وَاقْصِدْ – मध्यम रखो, संतुलित रखो
- فِي مَشْيِكَ – अपनी चाल में
- وَاغْضُضْ – नीचा करो, घटाओ
- مِن صَوْتِكَ – अपनी आवाज़ को
- أَنكَرَ – सबसे बुरा, सबसे घृणित
- لَصَوْتُ الْحَمِيرِ – गधों की आवाज़ ही है
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला हज़रत लुक़मान अलैहिस्सलाम की नसीहतों को बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को सिखाया कि अपनी चाल में मध्यम मार्ग अपनाओ। यानी न तो इतनी तेज़ चलो कि शान-ओ-शौकत और घमंड का पता चले, और न ही इतनी धीमी और सुस्त चलो कि कमज़ोरी और बीमारी का अहसास हो। बल्कि एक ऐसी संतुलित चाल चलो जिसमें वक़ार (गरिमा) और सादगी दोनों हों। यह एक मोमिन की पहचान है कि उसका चलना-फिरना, उठना-बैठना, हर अंदाज़ अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा के अनुकूल हो।
इसी तरह अपनी आवाज़ को भी नीचा रखो और उसे ऊँचा न करो। आवाज़ को मध्यम रखो, न बहुत धीमी कि सुनाई ही न दे और न इतनी ऊँची कि दूसरों को तकलीफ़ हो। बात करने का अंदाज़ नरम और सभ्य होना चाहिए। हाँ, जहाँ ज़रूरत हो, जैसे दुश्मन को डराने के लिए या किसी आवश्यक मामले में ऊँची आवाज़ की इजाज़त है, लेकिन आम हालात में आवाज़ को पस्त रखना सुन्नत और अदब है।
फिर अल्लाह तआला इसका कारण बताते हुए फ़रमाते हैं: "क्योंकि सबसे बुरी और घृणित आवाज़ गधों की आवाज़ है।" गधों की आवाज़ बहुत ऊँची, बेसुरी और कर्कश होती है। उसका आरंभ ज़फ़ीर (साँस खींचने की आवाज़) और अंत शहीक़ (साँस छोड़ने की आवाज़) होता है, जो बहुत बुरा और अप्रिय है। यही हाल उस इंसान का है जो बेवजह चिल्लाता है और अपनी आवाज़ को ऊँचा करता है — उसकी आवाज़ भी गधों की आवाज़ जैसी बुरी और नापसंदीदा होती है।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम हर पहलू में अदब और अच्छाई सिखाता है। एक मुसलमान की पहचान उसके चलने, बोलने और पेश आने के तरीके से होती है। जब हम अपनी चाल में वक़ार और अपनी आवाज़ में नरमी अपनाते हैं, तो हम दूसरों के दिलों में मुहब्बत और इज़्ज़त पैदा करते हैं। अल्लाह तआला हमें ऐसी आवाज़ से बचाना चाहते हैं जो गधों की आवाज़ जैसी हो — यानी बेहूदा, ऊँची और बेसुरी। यह एक खूबसूरत तालीम है कि इंसान अपनी ज़बान और अपने अंदाज़ को संवारे, क्योंकि यही उसके ईमान और अख़लाक़ की निशानी है। आइए हम अपनी ज़िंदगी में इन प्यारी नसीहतों को अपनाएँ और अपने अंदाज़ को अल्लाह के पसंदीदा अंदाज़ में ढालें।
📜 आयत 17-21 — सूरा लुकमान
अनुवाद — लुकमान 19
सूरा लुकमान आयत 19 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और दूसरो से बोलने में अपनी आवाज़ धीमी रखो क्योंकि…सूरा आयत 19/34 — सूरा लुकमान لقمان (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा लुकमान सुनें, सूरा लुकमान अनुवाद, सूरा लुकमान mp3, सूरा लुकमान pdf. आयत 17–21. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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