अल-अहज़ाब · 38/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
مَّا كَانَ عَلَى النَّبِيِّ مِنْ حَرَجٍ فِيمَا فَرَضَ اللَّهُ لَهُ ۖ سُنَّةَ اللَّهِ فِي الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلُ ۚ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ قَدَرًا مَّقْدُورًا ۝٣٨
Maa kaana `alan nabiyyyi min harajin feemaa faradal laahu lahoo sunnatal laahi fil lazeena khalaw min qabl; wa kaana amrul laahi qadaram maqdooraa
📖 हिंदी अर्थ
जो हुक्म खुदा ने पैग़म्बर पर फर्ज क़र दिया (उसके करने) में उस पर कोई मुज़ाएका नहीं जो लोग (उनसे) पहले गुज़र चुके हैं उनके बारे में भी खुदा का (यही) दस्तूर (जारी) रहा है (कि निकाह में तंगी न की) और खुदा का हुक्म तो (ठीक अन्दाज़े से) मुक़र्रर हुआ होता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • हरज: तंगी, संकट, गुनाह या कोई बोझ।
  • फ़रज़: यहाँ अर्थ है हलाल किया, अनुमति दी।
  • सुन्नतुल्लाह: अल्लाह की चलती आई हुई व्यवस्था और रीति।
  • क़दरन मक़दूरन: अल्लाह का लिखा हुआ फैसला जो अटल है और ज़रूर पूरा होकर रहेगा।

तफ़सीर:

यह आयत नबी करीम ﷺ के उस कार्य की पवित्रता और वैधता को स्पष्ट करती है जिसे कुछ लोग संदेह की नज़र से देखते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि नबी ﷺ पर उस चीज़ में कोई गुनाह, कोई तंगी या कोई बोझ नहीं है जिसे अल्लाह ने उनके लिए हलाल किया है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की वही सुन्नत (रीति) है जो पहले के नबियों में भी जारी रही। हज़रत दाऊद और हज़रत सुलैमान अलैहिमास्सलाम जैसे नबियों के जीवन में भी यही व्यवस्था थी। अल्लाह का फैसला जो उसने अपने नबी के लिए लिख दिया है, वह अटल है, उसे कोई टाल नहीं सकता और न ही कोई उसमें रुकावट डाल सकता है।

इस आयत में एक बहुत बड़ी शिक्षा छिपी है — जब अल्लाह किसी बात को अपने नबी के लिए पसंद करता है और उसे हलाल ठहराता है, तो उस पर किसी को उंगली उठाने का अधिकार नहीं है। नबी ﷺ का हर कार्य अल्लाह की मर्ज़ी के अधीन था, अपनी इच्छा के नहीं। यही उनकी महानता है कि उन्होंने अपने जीवन के हर पहलू में अल्लाह के हुक्म को सबसे आगे रखा।

इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि अल्लाह के फैसलों पर संतुष्ट रहना चाहिए। जो अल्लाह ने तय कर दिया, वह होकर रहता है। नबी ﷺ की ज़िंदगी में हर क़दम अल्लाह की मंशा के अनुसार चला, और यही उनकी उम्मत के लिए सबसे बड़ा नमूना है। हमें भी अपने जीवन में अल्लाह के हुक्म को अपनी इच्छाओं पर तरजीह देनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह जो चाहता है वही बेहतर होता है, भले ही हमारी समझ में वह बात कैसी भी लगे।

यह आयत नबी ﷺ की शान में एक और सबूत है कि वह हर मामले में अल्लाह की रज़ा के ताबे थे, और उनकी हर सुन्नत हमारे लिए रहनुमाई है। जो लोग नबी ﷺ के कार्यों पर एतराज़ करते हैं, वह दरअसल अल्लाह के फैसले पर एतराज़ करते हैं, और यह बहुत बड़ी बात है। हमें चाहिए कि हम नबी ﷺ की हर सुन्नत को मुहब्बत और एहतिराम के साथ क़बूल करें, क्योंकि उनका हर क़दम अल्लाह की तरफ से था।

🎧 सुनें

📜 आयत 36-40 — अल-अहज़ाब

36وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا
और न किसी ईमानदार मर्द को ये मुनासिब है और न किसी ईमानदार औरत को जब खुदा और उसके रसूल किसी काम का हुक्म दें तो उनको अपने उस काम (के करने न करने) अख़तेयार हो और (याद रहे कि) जिस शख्स ने खुदा और उसके रसूल की नाफरमानी की वह यक़ीनन खुल्लम खुल्ला गुमराही में मुब्तिला हो चुका
37وَإِذْ تَقُولُ لِلَّذِي أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِ وَأَنْعَمْتَ عَلَيْهِ أَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللَّهَ وَتُخْفِي فِي نَفْسِكَ مَا اللَّهُ مُبْدِيهِ وَتَخْشَى النَّاسَ وَاللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَاهُ ۖ فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لَا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌ فِي أَزْوَاجِ أَدْعِيَائِهِمْ إِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًا ۚ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ مَفْعُولًا
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब तुम उस शख्स (ज़ैद) से कह रहे थे जिस पर खुदा ने एहसान (अलग) किया था और तुमने उस पर (अलग) एहसान किया था कि अपनी बीबी (ज़ैनब) को अपनी ज़ौज़ियत में रहने दे और खुदा से डेर खुद तुम इस बात को अपने दिल में छिपाते थे जिसको (आख़िरकार) खुदा ज़ाहिर करने वाला था और तुम लोगों से डरते थे हालॉकि खुदा इसका ज्यादा हक़दार है कि तुम उस से डरो ग़रज़ जब ज़ैद अपनी हाजत पूरी कर चुका (तलाक़ दे दी) तो हमने (हुक्म देकर) उस औरत (ज़ैनब) का निकाह तुमसे कर दिया ताकि आम मोमिनीन को अपने ले पालक लड़कों की बीवियों (से निकाह करने) में जब वह अपना मतलब उन औरतों से पूरा कर चुकें (तलाक़ दे दें) किसी तरह की तंगी न रहे और खुदा का हुक्म तो किया कराया हुआ (क़तई) होता है
38مَّا كَانَ عَلَى النَّبِيِّ مِنْ حَرَجٍ فِيمَا فَرَضَ اللَّهُ لَهُ ۖ سُنَّةَ اللَّهِ فِي الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلُ ۚ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ قَدَرًا مَّقْدُورًا
जो हुक्म खुदा ने पैग़म्बर पर फर्ज क़र दिया (उसके करने) में उस पर कोई मुज़ाएका नहीं जो लोग (उनसे) पहले गुज़र चुके हैं उनके बारे में भी खुदा का (यही) दस्तूर (जारी) रहा है (कि निकाह में तंगी न की) और खुदा का हुक्म तो (ठीक अन्दाज़े से) मुक़र्रर हुआ होता है
39الَّذِينَ يُبَلِّغُونَ رِسَالَاتِ اللَّهِ وَيَخْشَوْنَهُ وَلَا يَخْشَوْنَ أَحَدًا إِلَّا اللَّهَ ۗ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ حَسِيبًا
वह लोग जो खुदा के पैग़ामों को (लोगों तक जूँ का तूँ) पहुँचाते थे और उससे डरते थे और खुदा के सिवा किसी से नहीं डरते थे (फिर तुम क्यों डरते हो) और हिसाब लेने के वास्ते तो खुद काफ़ी है
40مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَٰكِن رَّسُولَ اللَّهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
(लोगों) मोहम्मद तुम्हारे मर्दों में से (हक़ीक़तन) किसी के बाप नहीं हैं (फिर जैद की बीवी क्यों हराम होने लगी) बल्कि अल्लाह के रसूल और नबियों की मोहर (यानी ख़त्म करने वाले) हैं और खुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ है
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Tuesday, August 18, 2026

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