फातिर · 10/45
अनुवाद उच्चारण — फातिर
مَن كَانَ يُرِيدُ الْعِزَّةَ فَلِلَّهِ الْعِزَّةُ جَمِيعًا ۚ إِلَيْهِ يَصْعَدُ الْكَلِمُ الطَّيِّبُ وَالْعَمَلُ الصَّالِحُ يَرْفَعُهُ ۚ وَالَّذِينَ يَمْكُرُونَ السَّيِّئَاتِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ ۖ وَمَكْرُ أُولَٰئِكَ هُوَ يَبُورُ ۝١٠
Man kaana yureedul `izzata falillaahil `izzatu jamee`aa; ilaihi yas`adul kalimut taiyibu wal`amalus saalihu yarfa`uh; wallazeena yamkuroonas sayyiaati lahum `azaabun shadeed; wa makru ulaaa`ika huwa yaboor
📖 हिंदी अर्थ
जो शख्स इज्ज़त का ख्वाहाँ हो तो ख़ुदा से माँगे क्योंकि सारी इज्ज़त खुदा ही की है उसकी बारगाह तक अच्छी बातें (बुलन्द होकर) पहुँचतीं हैं और अच्छे काम को वह खुद बुलन्द फरमाता है और जो लोग (तुम्हारे ख़िलाफ) बुरी-बुरी तदबीरें करते रहते हैं उनके लिए क़यामत में सख्त अज़ाब है और (आख़िर) उन लोगों की तदबीर मटियामेट हो जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • العزة (इज़्ज़त): प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति और गौरव।
  • الكلم الطيب (कलिम तैय्यिब): पवित्र वचन, जैसे "ला इलाहा इल्लल्लाह" (अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं) और अन्य पुण्यमयी बातें।
  • يرفعه (यरफ़उहु): उसे ऊपर उठाता है, अर्थात अल्लाह उसे स्वीकार करता है और उसका दर्जा बढ़ाता है।
  • يمكرون (यमकुरून): चालें चलते हैं, बुरी साज़िशें करते हैं।
  • يبور (यबूर): नष्ट हो जाता है, बेकार और बेकार हो जाता है, घाटे में रहता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत एक बहुत ही महत्वपूर्ण सत्य को स्पष्ट करती है: जो कोई भी इज़्ज़त (प्रतिष्ठा और सम्मान) चाहता है—चाहे वह दुनिया में हो या आख़िरत में—उसे यह समझ लेना चाहिए कि पूरी इज़्ज़त और सारी शक्ति केवल अल्लाह के हाथ में है। वही सबसे बड़ा सम्मान देने वाला और अपमानित करने वाला है। जो व्यक्ति किसी मख़लूक़ (प्राणी) से इज़्ज़त पाने की कोशिश करता है, अल्लाह उसे अपमानित कर देता है; और जो अल्लाह से इज़्ज़त माँगता है और उसकी आज्ञा का पालन करता है, अल्लाह उसे सच्ची इज़्ज़त प्रदान करता है। इसलिए इज़्ज़त का सही रास्ता यही है कि इसे केवल अल्लाह से माँगा जाए और उसकी इबादत और आज्ञाकारिता में जीवन बिताया जाए।

फिर अल्लाह तआला बताते हैं कि पवित्र वचन (जैसे कलिमा-ए-तैय्यिबा, ज़िक्र, तस्बीह, और अच्छी बातें) अल्लाह की ओर ऊपर उठते हैं। लेकिन अकेले ज़बान से कहना काफ़ी नहीं है; सच्चा नेक अमल (पुण्य कर्म) ही उन वचनों को ऊपर उठाता है और अल्लाह के यहाँ स्वीकार्य बनाता है। यानी जब कोई व्यक्ति ईमान की गवाही देता है और उसके साथ नेक कर्म करता है, तो उसका अमल उसके ईमान को ऊपर उठाता है और अल्लाह उसे क़बूल करता है। यह एक बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी है कि हमारे अच्छे कर्म हमारे दर्जे बुलंद करते हैं और हमें अल्लाह के करीब लाते हैं।

इसके बाद अल्लाह तआला उन लोगों के बारे में बताते हैं जो बुरी साज़िशें करते हैं—जैसे कि मक्का के मुशरिकों ने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नुक़सान पहुँचाने और उनका दीन मिटाने की कोशिशें कीं। ऐसे लोगों के लिए सख़्त अज़ाब है। उनकी सारी चालें और साज़िशें अल्लाह के सामने बेकार और नष्ट हो जाएँगी। उनका मक्र (चाल) उन्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुँचाएगा, बल्कि उल्टा उन्हीं के लिए हानिकारक साबित होगा। अल्लाह की योजना सबसे मज़बूत है और वह अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि असली इज़्ज़त और कामयाबी अल्लाह की राह में है। आज दुनिया में लोग धन, पद, और ताक़त को इज़्ज़त का ज़रिया समझते हैं, लेकिन ये सब चीज़ें फ़ानी हैं। जो इंसान अल्लाह से जुड़ता है, उसकी ज़ुबान पाक होती है और उसके अमल नेक होते हैं, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत दोनों में सच्ची इज़्ज़त देता है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़ुबान को अच्छी बातों से सजाएँ और अपने अमल को नेक बनाएँ, ताकि हमारे वचन और कर्म अल्लाह तक पहुँचें और हमें उसकी रहमत और मग़फ़िरत मिले। याद रखें, बुरी चालें और साज़िशें कभी कामयाब नहीं होतीं, जबकि सच्चाई और नेकी हमेशा बुलंद होती है।



📜 आयत 8-12 — फातिर

8أَفَمَن زُيِّنَ لَهُ سُوءُ عَمَلِهِ فَرَآهُ حَسَنًا ۖ فَإِنَّ اللَّهَ يُضِلُّ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ ۖ فَلَا تَذْهَبْ نَفْسُكَ عَلَيْهِمْ حَسَرَاتٍ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا يَصْنَعُونَ
तो भला वह शख्स जिसे उस का बुरा काम शैतानी (अग़वॉ से) अच्छा कर दिखाया गया है औ वह उसे अच्छा समझने लगा है (कभी मोमिन नेकोकार के बराबर हो सकता है हरगिज़ नहीं) तो यक़ीनी (बात) ये है कि ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसे चाहता है राहे रास्त पर आने (की तौफ़ीक़) देता है तो (ऐ रसूल कहीं) उन (बदबख्तों) पर अफसोस कर करके तुम्हारे दम न निकल जाए जो कुछ ये लोग करते हैं ख़ुदा उससे खूब वाक़िफ़ है
9وَاللَّهُ الَّذِي أَرْسَلَ الرِّيَاحَ فَتُثِيرُ سَحَابًا فَسُقْنَاهُ إِلَىٰ بَلَدٍ مَّيِّتٍ فَأَحْيَيْنَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ كَذَٰلِكَ النُّشُورُ
और ख़ुदा ही वह (क़ादिर व तवाना) है जो हवाओं को भेजता है तो हवाएँ बादलों को उड़ाए-उड़ाए फिरती है फिर हम उस बादल को मुर्दा (उफ़तादा) शहर की तरफ हका देते हैं फिर हम उसके ज़रिए से ज़मीन को उसके मर जाने के बाद शादाब कर देते हैं यूँ ही (मुर्दों को क़यामत में जी उठना होगा)
10مَن كَانَ يُرِيدُ الْعِزَّةَ فَلِلَّهِ الْعِزَّةُ جَمِيعًا ۚ إِلَيْهِ يَصْعَدُ الْكَلِمُ الطَّيِّبُ وَالْعَمَلُ الصَّالِحُ يَرْفَعُهُ ۚ وَالَّذِينَ يَمْكُرُونَ السَّيِّئَاتِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ ۖ وَمَكْرُ أُولَٰئِكَ هُوَ يَبُورُ
जो शख्स इज्ज़त का ख्वाहाँ हो तो ख़ुदा से माँगे क्योंकि सारी इज्ज़त खुदा ही की है उसकी बारगाह तक अच्छी बातें (बुलन्द होकर) पहुँचतीं हैं और अच्छे काम को वह खुद बुलन्द फरमाता है और जो लोग (तुम्हारे ख़िलाफ) बुरी-बुरी तदबीरें करते रहते हैं उनके लिए क़यामत में सख्त अज़ाब है और (आख़िर) उन लोगों की तदबीर मटियामेट हो जाएगी
11وَاللَّهُ خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍ ثُمَّ جَعَلَكُمْ أَزْوَاجًا ۚ وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَمَا يُعَمَّرُ مِن مُّعَمَّرٍ وَلَا يُنقَصُ مِنْ عُمُرِهِ إِلَّا فِي كِتَابٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ
और खुदा ही ने तुम लोगों को (पहले पहल) मिट्टी से पैदा किया फिर नतफ़े से फिर तुमको जोड़ा (नर मादा) बनाया और बग़ैर उसके इल्म (इजाज़त) के न कोई औरत हमेला होती है और न जनती है और न किसी शख्स की उम्र में ज्यादती होती है और न किसी की उम्र से कमी की जाती है मगर वह किताब (लौहे महफूज़) में (ज़रूर) है बेशक ये बात खुदा पर बहुत ही आसान है
12وَمَا يَسْتَوِي الْبَحْرَانِ هَٰذَا عَذْبٌ فُرَاتٌ سَائِغٌ شَرَابُهُ وَهَٰذَا مِلْحٌ أُجَاجٌ ۖ وَمِن كُلٍّ تَأْكُلُونَ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُونَ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَا ۖ وَتَرَى الْفُلْكَ فِيهِ مَوَاخِرَ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
(उसकी कुदरत देखो) दो समन्दर बावजूद मिल जाने के यकसाँ नहीं हो जाते ये (एक तो) मीठा खुश ज़ाएका कि उसका पीना सुवारत (ख़ुश्गवार) है और ये (दूसरा) खारी कड़ुवा है और (इस इख़तेलाफ पर भी) तुम लोग दोनों से (मछली का) तरो ताज़ा गोश्त (यकसाँ) खाते हो और (अपने लिए ज़ेवरात (मोती वग़ैरह) निकालते हो जिन्हें तुम पहनते हो और तुम देखते हो कि कश्तियां दरिया में (पानी को) फाड़ती चली जाती हैं ताकि उसके फज्ल (व करम तिजारत) की तलाश करो और ताकि तुम लोग शुक्र करो
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अनुवाद — फातिर 10

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Tuesday, August 18, 2026

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