यासीन · 34/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّاتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ الْعُيُونِ ۝٣٤
Wa ja`alnaa feehaa jannaatim min nakheelinw wa a`naabinw wa fajjarnaa feeha minal `uyoon
📖 हिंदी अर्थ
और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अंगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • जन्नात (جَنَّاتٍ): बाग़ात, बग़ीचे
  • नख़ील (نَخِيلٍ): खजूर के पेड़
  • अ'नाब (أَعْنَابٍ): अंगूर की बेलें
  • फ़ज्जरना (فَجَّرْنَا): हमने फोड़कर बहाया, प्रवाहित किया
  • अल-'उयून (الْعُيُونِ): चश्मे, सोते, पानी के प्राकृतिक स्रोत

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी महान शक्ति और रहमत के उन नज़ारों की तरफ इशारा किया है जो उसने इस ज़मीन पर पैदा किए हैं। उसने इस धरती में खजूर और अंगूर के हरे-भरे बाग़ात उगाए, जो न सिर्फ़ आँखों के लिए राहत हैं बल्कि इंसान के लिए रिज़्क़ और शिफ़ा का ज़रिया भी हैं। ये वही ज़मीन है जिसमें पहले बंजरपन और सूखा था, लेकिन अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उसमें जान डाल दी।

फिर अल्लाह ने बताया कि उसने उन बाग़ात की सिंचाई के लिए ज़मीन से चश्मे जारी किए — यानी पानी के सोते फोड़कर बहाए। ये पानी के वो प्राकृतिक स्रोत हैं जो ज़मीन की गहराई से निकलते हैं और पेड़-पौधों को सींचते हैं। ग़ौर करने वाली बात है कि अल्लाह ने पानी को ज़मीन के अंदर छुपा रखा है, फिर अपनी हिकमत से उसे बाहर निकालता है — ये उसकी रहमत का इज़हार है।

इस आयत में अल्लाह ने खजूर और अंगूर का ज़िक्र ख़ास तौर पर किया, क्योंकि ये दोनों फल अरब की ज़मीन में सबसे ज़्यादा अहमियत रखते थे और इनमें इंसान के लिए बड़े फ़ायदे हैं। खजूर में ग़िज़ा (पोषण) भी है, मिठास भी, और ताक़त भी। अंगूर में ताज़गी, शिफ़ा और कई और फ़ायदे हैं। ये दोनों जन्नत के फल भी हैं, और दुनिया में भी अल्लाह ने इन्हें रहमत बनाकर भेजा है।

इस आयत से हमें सबक़ लेना चाहिए कि जिस अल्लाह ने बंजर ज़मीन से ये नेअमतें पैदा कीं, वही अल्लाह मुर्दों को भी ज़िन्दा करने पर क़ादिर है। जिस तरह वह बारिश भेजकर मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा कर देता है, उसी तरह क़यामत के दिन वह इंसानों को क़ब्रों से उठाएगा। ये आयत हमें अल्लाह की क़ुदरत पर ईमान लाने और उसके शुक्र अदा करने की तरफ़ बुलाती है।

अल्लाह तआला ने जो ये नेअमतें दीं — खजूर, अंगूर, चश्मे, ज़मीन की उर्वरता — ये सब उसकी मुहब्बत और रहमत की निशानियाँ हैं। हमें चाहिए कि इन नेअमतों को देखकर अल्लाह की तारीफ़ करें, उसका शुक्र अदा करें, और उसकी इबादत में मशग़ूल रहें। ये नेअमतें हमें याद दिलाती हैं कि अल्लाह अपने बंदों पर कितना मेहरबान है — वह उन्हें रिज़्क़ देता है, पानी देता है, और उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखता है। क्या ही अच्छा हो कि हम इन नेअमतों का सही इस्तेमाल करें और अल्लाह की राह में भी ख़र्च करें, ताकि ये नेअमतें हमारे लिए बरकत का ज़रिया बनें।



📜 आयत 32-36 — यासीन

32وَإِن كُلٌّ لَّمَّا جَمِيعٌ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
(हाँ) अलबत्ता सब के सब इकट्ठा हो कर हमारी बारगाह में हाज़िर किए जाएँगे
33وَآيَةٌ لَّهُمُ الْأَرْضُ الْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَاهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
और उनके (समझने) के लिए मेरी कुदरत की एक निशानी मुर्दा (परती) ज़मीन है कि हमने उसको (पानी से) ज़िन्दा कर दिया और हम ही ने उससे दाना निकाला तो उसे ये लोग खाया करते हैं
34وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّاتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ الْعُيُونِ
और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अंगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए
35لِيَأْكُلُوا مِن ثَمَرِهِ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खुदा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते
36سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنبِتُ الْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खुद उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए
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अनुवाद — यासीन 34

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सूरा आयत 34/83 — यासीन يس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यासीन सुनें, यासीन अनुवाद, यासीन mp3, यासीन pdf. आयत 32–36. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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