यासीन · 35/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
لِيَأْكُلُوا مِن ثَمَرِهِ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ ۝٣٥
Liyaakuloo min samarihee wa maa `amilat-hu aideehim; afalaa yashkuroon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खुदा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لِيَأْكُلُوا – ताकि वे खाएँ
  • مِن ثَمَرِهِ – उसके फलों में से
  • وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ – और जो उनके हाथों ने किया (उगाया/पैदा किया)
  • أَفَلَا يَشْكُرُونَ – तो क्या वे आभार/कृतज्ञता नहीं जताते?

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने यह सारी नेमतें – यानी बाग़, खेत, फल, अनाज और तरह-तरह की पैदावार – इसलिए पैदा कीं ताकि इंसान उनसे खाए और अपनी ज़िंदगी गुज़ार सके। यह ध्यान देने वाली बात है कि ये सब चीज़ें अल्लाह की रहमत से मिलती हैं, न कि सिर्फ़ इंसान की मेहनत या ताक़त से। इंसान ज़मीन जोतता है, बीज बोता है, पानी देता है, लेकिन असल में फल और अनाज पैदा करने वाला अल्लाह ही है। अगर अल्लाह न चाहे तो बीज से पौधा न निकले, बारिश न हो, और ज़मीन कुछ भी न उगाए।

क़ुरआन में यह भी बताया गया है कि इंसान जो कुछ भी अपने हाथों से कमाता है या उगाता है, वह भी अल्लाह ही की देन है। अल्लाह ने ज़मीन, पानी, हवा, धूप और सारे ज़राए उपलब्ध कराए हैं। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह इन नेमतों को देखकर अल्लाह का शुक्र अदा करे, उसकी इबादत करे और उसके साथ किसी को शरीक न करे।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी रोज़ी-रोज़गार और खाने-पीने की चीज़ें अल्लाह की तरफ़ से हैं। हमें चाहिए कि हर नेमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करें, क्योंकि शुक्र अदा करने से नेमतें बढ़ती हैं और अल्लाह की मोहब्बत दिल में पैदा होती है। जो इंसान अल्लाह का शुक्र नहीं करता, वह बड़ी नेमत से महरूम रहता है।

याद रखिए! अल्लाह ने यह सब कुछ हमारे लिए बनाया है, और वह चाहता है कि हम उसे पहचानें, उसका शुक्र करें और उसकी इबादत में अपनी ज़िंदगी गुज़ारें। यही इंसान की कामयाबी है – दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 33-37 — यासीन

33وَآيَةٌ لَّهُمُ الْأَرْضُ الْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَاهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
और उनके (समझने) के लिए मेरी कुदरत की एक निशानी मुर्दा (परती) ज़मीन है कि हमने उसको (पानी से) ज़िन्दा कर दिया और हम ही ने उससे दाना निकाला तो उसे ये लोग खाया करते हैं
34وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّاتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ الْعُيُونِ
और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अंगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए
35لِيَأْكُلُوا مِن ثَمَرِهِ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खुदा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते
36سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنبِتُ الْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खुद उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए
37وَآيَةٌ لَّهُمُ اللَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ
और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक्त ये लोग अंधेरे में रह जाते हैं
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अनुवाद — यासीन 35

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सूरा आयत 35/83 — यासीन يس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यासीन सुनें, यासीन अनुवाद, यासीन mp3, यासीन pdf. आयत 33–37. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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