अन-निसा · 135/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ ۚ إِن يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًا فَاللَّهُ أَوْلَىٰ بِهِمَا ۖ فَلَا تَتَّبِعُوا الْهَوَىٰ أَن تَعْدِلُوا ۚ وَإِن تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا ۝١٣٥
Yaa aiyuhal lazeena aamanoo koonoo qawwa ameena bilqisti shuhadaaa`a lillaahi wa law `alaa anfusikum awil waalidaini wal aqrabeen iny yakun ghaniyyan aw faqeeran fallaahu awlaa bihimaa falaaa tattabi`ul hawaaa an ta`diloo; wa in talwooo aw tu`ridoo fa innal laaha kaana bimaa ta`maloona Khabeera
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानवालों मज़बूती के साथ इन्साफ़ पर क़ायम रहो और ख़ुदा के लये गवाही दो अगरचे (ये गवाही) ख़ुद तुम्हारे या तुम्हारे मॉ बाप या क़राबतदारों के लिए खिलाफ़ (ही क्यो) न हो ख्वाह मालदार हो या मोहताज (क्योंकि) ख़ुदा तो (तुम्हारी बनिस्बत) उनपर ज्यादा मेहरबान है तो तुम (हक़ से) कतराने में ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और अगर घुमा फिरा के गवाही दोगे या बिल्कुल इन्कार करोगे तो (याद रहे जैसी करनी वैसी भरनी क्योंकि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुद उससे ख़ूब वाक़िफ़ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ – न्याय और इंसाफ़ पर स्थापित रहने वाले, अदल को क़ायम करने वाले।
  • شُهَدَاءَ لِلَّهِ – अल्लाह के लिए गवाही देने वाले, यानी गवाही को ख़ालिस अल्लाह के लिए अदा करने वाले।
  • تَلْوُوا – गवाही को मरोड़ना, उसे बदलना या उसके शब्दों को घुमा-फिरा कर पेश करना।
  • تُعْرِضُوا – गवाही देने से मुँह मोड़ना, उसे छिपाना या अदा न करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में ईमानवालों को एक बहुत ही अहम और ऊँचा हुक्म दे रहा है। वह फ़रमाता है: “ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह के लिए न्याय पर क़ायम रहने वाले बनो और इंसाफ़ की गवाही दो — चाहे वह गवाही तुम्हारे अपने ख़िलाफ़ ही क्यों न हो, या तुम्हारे माँ-बाप और रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।”

यानी मोमिन का फ़र्ज़ है कि वह सच्चाई और न्याय का पैरोकार हो, चाहे उसका फ़ायदा किसी और को हो और नुक़सान ख़ुद उसे या उसके अपनों को ही क्यों न पहुँचे। इस्लाम सिखाता है कि रिश्तेदारी, मोहब्बत, दुश्मनी या अपने फ़ायदे की वजह से कभी इंसाफ़ से न हटो। अगर गवाही सच्ची है तो उसे अदा करो, चाहे वह तुम्हारे ही ख़िलाफ़ जाए।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि जिस शख्स के बारे में गवाही दी जा रही है, अगर वह अमीर है या ग़रीब है, तो उसकी हैसियत को देखकर गवाही में फ़र्क़ न डालो। न अमीर की ख़ातिरदारी के लिए सच को छिपाओ, न ग़रीब पर तरस खाकर झूठ बोलो। अल्लाह उन दोनों से ज़्यादा जानता है कि उनके लिए क्या बेहतर है। तुम्हारा काम सिर्फ़ सच बोलना है, फ़ैसला अल्लाह के ज़िम्मे है।

इसके बाद अल्लाह तआला ने साफ़ तौर पर मना किया कि अपनी नफ़्सियानी ख्वाहिशों और जज़्बातों की पैरवी मत करो, क्योंकि यही चीज़ तुम्हें इंसाफ़ से भटका सकती है। और अगर कोई शख्स गवाही को मरोड़े — यानी उसे बदलकर पेश करे — या गवाही देने से मुँह मोड़े — यानी उसे छिपाए या अदा न करे — तो अल्लाह को उसके हर अमल की पूरी ख़बर है, और वह उसे उसका पूरा बदला देगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में इंसाफ़ और सच्चाई की कितनी अहमियत है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह हर हाल में सच बोले, चाहे उसका नुक़सान ही क्यों न हो। यही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह की रज़ा और जन्नत तक पहुँचाता है। अल्लाह हम सबको इंसाफ़ पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 133-137 — अन-निसा

133إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ أَيُّهَا النَّاسُ وَيَأْتِ بِآخَرِينَ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ ذَٰلِكَ قَدِيرًا
ऐ लोगों अगर ख़ुदा चाहे तो तुमको (दुनिया के परदे से) बिल्कुल उठा ले और (तुम्हारे बदले) दूसरों को ला (बसाए) और ख़ुदा तो इसपर क़ादिर व तवाना है
134مَّن كَانَ يُرِيدُ ثَوَابَ الدُّنْيَا فَعِندَ اللَّهِ ثَوَابُ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ سَمِيعًا بَصِيرًا
और जो शख्स (अपने आमाल का) बदला दुनिया ही में चाहता है तो ख़ुदा के पास दुनिया व आख़िरत दोनों का अज्र मौजूद है और ख़ुदा तो हर शख्स की सुनता और सबको देखता है
135۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ ۚ إِن يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًا فَاللَّهُ أَوْلَىٰ بِهِمَا ۖ فَلَا تَتَّبِعُوا الْهَوَىٰ أَن تَعْدِلُوا ۚ وَإِن تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
ऐ ईमानवालों मज़बूती के साथ इन्साफ़ पर क़ायम रहो और ख़ुदा के लये गवाही दो अगरचे (ये गवाही) ख़ुद तुम्हारे या तुम्हारे मॉ बाप या क़राबतदारों के लिए खिलाफ़ (ही क्यो) न हो ख्वाह मालदार हो या मोहताज (क्योंकि) ख़ुदा तो (तुम्हारी बनिस्बत) उनपर ज्यादा मेहरबान है तो तुम (हक़ से) कतराने में ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और अगर घुमा फिरा के गवाही दोगे या बिल्कुल इन्कार करोगे तो (याद रहे जैसी करनी वैसी भरनी क्योंकि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुद उससे ख़ूब वाक़िफ़ है
136يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنزَلَ مِن قَبْلُ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا
ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाज़िल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाज़िल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आख़िरत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के जूर जा पड़ा
137إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَّمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًا
बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फ़िर काफ़िर हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफ़िर हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फ़िरत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा
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अनुवाद — अन-निसा 135

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Tuesday, August 18, 2026

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