अन-निसा · 80/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۝٨٠
Man yuti`ir Rasoola faqad ataa`al laaha wa man tawallaa famaaa arsalnaaka `alaihim hafeezaa
📖 हिंदी अर्थ
जिसने रसूल की इताअत की तो उसने ख़ुदा की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ ख्याल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ: जो रसूल (ﷺ) की आज्ञा का पालन करे।
  • فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ: तो उसने वास्तव में अल्लाह की आज्ञा का पालन किया।
  • وَمَن تَوَلَّىٰ: और जो (आज्ञा पालन से) मुँह मोड़े।
  • حَفِيظًا: निगरानी करने वाला, रक्षक, हिसाब लेने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत रसूलुल्लाह (ﷺ) की आज्ञा पालन की अहमियत को स्पष्ट करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो व्यक्ति रसूल (ﷺ) की आज्ञा का पालन करता है—यानी जो कुछ वे आदेश दें उसे माने और जिससे रोकें उससे बचे—तो उसने वास्तव में अल्लाह की आज्ञा का पालन किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि रसूल (ﷺ) अपनी तरफ से कुछ नहीं कहते, बल्कि जो अल्लाह की ओर से उन्हें प्रकाशित किया गया है उसी का संदेश देते हैं। इसलिए उनकी आज्ञा का पालन अल्लाह की आज्ञा का पालन है।

फिर अल्लाह तआला रसूल (ﷺ) को तसल्ली देते हुए फ़रमाता है: और जो कोई इस आज्ञा पालन से मुँह मोड़े और अपनी मनमानी करे, तो ऐ रसूल! हमने आपको उन लोगों पर निगरानी रखने वाला और उनके कर्मों का हिसाब लेने वाला नहीं बनाया है। आपका काम केवल संदेश पहुँचाना है। उनके कर्मों का हिसाब लेना और उन्हें उनके कर्मों का बदला देना हमारा काम है। इसलिए उनके इनकार पर आप दुखी न हों और न ही उनकी हिदायत की चिंता में अपने आपको परेशान करें।


फ़ायदे (लाभ):

  1. रसूल (ﷺ) की आज्ञा पालन ही अल्लाह की आज्ञा पालन है — यह आयत सिखाती है कि रसूल (ﷺ) की सुन्नत पर चलना और उनके बताए रास्ते पर जीवन बिताना अल्लाह की रज़ा और उसकी आज्ञा पालन का सबसे अच्छा ज़रिया है। इससे हमें यह समझ मिलती है कि क़ुरआन और सुन्नत दोनों साथ-साथ हैं।
  2. रसूल (ﷺ) की मुहब्बत और सम्मान — यह आयत हमें सिखाती है कि रसूल (ﷺ) की इताअत (आज्ञा पालन) हमारे ईमान का हिस्सा है। जो उनसे मुहब्बत करता है और उनके बताए रास्ते पर चलता है, वह अल्लाह के करीब होता है।
  3. ज़िम्मेदारी का एहसास — यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हर इंसान अपने कर्मों के लिए खुद ज़िम्मेदार है। रसूल (ﷺ) का काम केवल संदेश पहुँचाना था, और हमारा काम उस संदेश को समझकर उस पर अमल करना है। इससे हमें अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होता है।
  4. निराशा से बचाव — जब हम दूसरों को सही रास्ते की दावत देते हैं और वे नहीं मानते, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए। हमारा काम केवल सही बात पहुँचाना है, हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है। यह आयत दावत के काम में लगे लोगों के लिए बहुत बड़ी तसल्ली है।
  5. अल्लाह पर भरोसा — यह आयत हमें सिखाती है कि हर चीज़ का हिसाब अल्लाह के पास है। हमें अपने कर्मों की चिंता करनी चाहिए, दूसरों के कर्मों की नहीं। अल्लाह पर भरोसा रखने वाला कभी परेशान नहीं होता।


📜 आयत 78-82 — अन-निसा

78أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِككُّمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِي بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ ۗ وَإِن تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِ اللَّهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِكَ ۚ قُلْ كُلٌّ مِّنْ عِندِ اللَّهِ ۖ فَمَالِ هَٰؤُلَاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًا
और वहां रेशा (बाल) बराबर भी तुम लोगों पर जुल्म नहीं किया जाएगा तुम चाहे जहॉ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो और उनको अगर कोई भलाई पहुंचती है तो कहने लगते हैं कि ये ख़ुदा की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो (शरारत से) कहने लगते हैं कि (ऐ रसूल) ये तुम्हारी बदौलत है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सब ख़ुदा की तरफ़ से है पस उन लोगों को क्या हो गया है कि र्कोई बात ही नहीं समझते
79مَّا أَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ وَمَا أَصَابَكَ مِن سَيِّئَةٍ فَمِن نَّفْسِكَ ۚ وَأَرْسَلْنَاكَ لِلنَّاسِ رَسُولًا ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا
हालॉकि (सच तो यूं है कि) जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुदा की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुद तुम्हारी बदौलत है और (ऐ रसूल) हमने तुमको लोगों के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा है और (इसके लिए) ख़ुदा की गवाही काफ़ी है
80مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا
जिसने रसूल की इताअत की तो उसने ख़ुदा की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ ख्याल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
81وَيَقُولُونَ طَاعَةٌ فَإِذَا بَرَزُوا مِنْ عِندِكَ بَيَّتَ طَائِفَةٌ مِّنْهُمْ غَيْرَ الَّذِي تَقُولُ ۖ وَاللَّهُ يَكْتُبُ مَا يُبَيِّتُونَ ۖ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَكِيلًا
(ये लोग तुम्हारे सामने) तो कह देते हैं कि हम (आपके) फ़रमाबरदार हैं लेकिन जब तुम्हारे पास से बाहर निकले तो उनमें से कुछ लोग जो कुछ तुमसे कह चुके थे उसके ख़िलाफ़ रातों को मशवरा करते हैं हालॉकि (ये नहीं समझते) ये लोग रातों को जो कुछ भी मशवरा करते हैं उसे ख़ुदा लिखता जाता है पास तुम उन लोगों की कुछ परवाह न करो और ख़ुदा पर भरोसा रखो और ख़ुदा कारसाज़ी के लिए काफ़ी है
82أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ اللَّهِ لَوَجَدُوا فِيهِ اخْتِلَافًا كَثِيرًا
तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते
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अनुवाद — अन-निसा 80

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Tuesday, August 18, 2026

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