ग़ाफिर · 42/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
تَدْعُونَنِي لِأَكْفُرَ بِاللَّهِ وَأُشْرِكَ بِهِ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ وَأَنَا أَدْعُوكُمْ إِلَى الْعَزِيزِ الْغَفَّارِ ۝٤٢
Tad`oonanee li-akfura billaahi wa ushrika bihee maa laisa lee bihee `ilmunw wa ana ad`ookum ilal`Azeezil Ghaffaar
📖 हिंदी अर्थ
तुम मुझे बुलाते हो कि मै ख़ुदा के साथ कुफ्र करूं और उस चीज़ को उसका शरीक बनाऊ जिसका मुझे इल्म में भी नहीं, और मैं तुम्हें ग़ालिब (और) बड़े बख्शने वाले ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَدْعُونَنِي: तुम मुझे बुला रहे हो / बुलावा दे रहे हो
  • لِأَكْفُرَ بِاللَّهِ: ताकि मैं अल्लाह का इनकार करूँ
  • وَأُشْرِكَ بِهِ: और उसके साथ किसी को साझी (शरीक) ठहराऊँ
  • مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ: जिसके बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं
  • الْعَزِيزِ: वह जो सब पर ग़ालिब है, जिसे कोई हरा नहीं सकता
  • الْغَفَّارِ: बहुत क्षमा करने वाला

तफ़सीर (व्याख्या):

यह एक ईमान वाले व्यक्ति का वह कथन है जो फ़िरऔन की क़ौम के बीच रहता था और अपनी क़ौम को सच्चाई की ओर बुला रहा था। वह उन्हें समझा रहा है कि तुम मुझसे क्या चाहते हो? तुम मुझे बुला रहे हो कि मैं अल्लाह का इनकार करूँ और उसके साथ उन चीज़ों को साझी ठहराऊँ जिनके बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं है। यानी तुम चाहते हो कि मैं उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की इबादत करूँ जिनके बारे में न तो कोई प्रमाण है और न ही कोई तर्क। यह सबसे बड़ा पाप और सबसे बुरा काम है — अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना, जबकि अल्लाह ने कभी इसकी अनुमति नहीं दी और न ही कोई सही ज्ञान इस ओर ले जाता है।

दूसरी ओर, मैं तुम्हें उस अल्लाह की ओर बुलाता हूँ जो अज़ीज़ है — वह अपनी ताकत और प्रतिशोध में सब पर ग़ालिब है, कोई उसे हरा नहीं सकता, और वह ग़फ़्फ़ार है — वह बहुत क्षमा करने वाला है, जो अपने बंदों के पापों को माफ कर देता है जब वे उसकी ओर लौटते हैं और तौबा करते हैं।

इस आयत में एक बहुत बड़ी सीख है: सच्चा ईमान वाला व्यक्ति कभी भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता, चाहे उसे कितना ही दबाव क्यों न दिया जाए। वह जानता है कि अल्लाह की ताकत और उसकी क्षमा — ये दोनों चीज़ें उसे सच्चाई पर स्थिर रहने की ताकत देती हैं। अल्लाह अज़ीज़ है, इसलिए उसकी नाराज़गी से डरना चाहिए; और वह ग़फ़्फ़ार है, इसलिए उसकी रहमत से उम्मीद रखनी चाहिए। यही संतुलन एक मुसलमान की ज़िंदगी का आधार है — डर और उम्मीद के बीच।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने ईमान पर अटल रहना चाहिए। दुनिया में बहुत से लोग हमें गुमराह करने की कोशिश करेंगे, हमें बुरे रास्ते पर ले जाना चाहेंगे, लेकिन हमें उस अल्लाह पर भरोसा रखना है जो सबसे ताकतवर है और जो अपने सच्चे बंदों के पापों को माफ करने वाला है। जो व्यक्ति अल्लाह की ओर बुलाता है, वह कभी अकेला नहीं होता — अल्लाह उसके साथ होता है। और जो लोग सच्चाई को ठुकराते हैं, वे अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकते। आइए, हम सब उस अज़ीज़ और ग़फ़्फ़ार की ओर लौटें, उसकी इबादत करें और उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें।



📜 आयत 40-44 — ग़ाफिर

40مَنْ عَمِلَ سَيِّئَةً فَلَا يُجْزَىٰ إِلَّا مِثْلَهَا ۖ وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَٰئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ يُرْزَقُونَ فِيهَا بِغَيْرِ حِسَابٍ
जो बुरा काम करेगा तो उसे बदला भी वैसा ही मिलेगा, और जो नेक काम करेगा मर्द हो या औरत मगर ईमानदार हो तो ऐसे लोग बेहिश्त में दाख़िल होंगे वहाँ उन्हें बेहिसाब रोज़ी मिलेगी
41۞ وَيَا قَوْمِ مَا لِي أَدْعُوكُمْ إِلَى النَّجَاةِ وَتَدْعُونَنِي إِلَى النَّارِ
और ऐ मेरी क़ौम मुझे क्या हुआ है कि मैं तुमको नजाद की तरफ बुलाता हूँ और तुम मुझे दोज़ख़ की तरफ बुलाते हो
42تَدْعُونَنِي لِأَكْفُرَ بِاللَّهِ وَأُشْرِكَ بِهِ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ وَأَنَا أَدْعُوكُمْ إِلَى الْعَزِيزِ الْغَفَّارِ
तुम मुझे बुलाते हो कि मै ख़ुदा के साथ कुफ्र करूं और उस चीज़ को उसका शरीक बनाऊ जिसका मुझे इल्म में भी नहीं, और मैं तुम्हें ग़ालिब (और) बड़े बख्शने वाले ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ
43لَا جَرَمَ أَنَّمَا تَدْعُونَنِي إِلَيْهِ لَيْسَ لَهُ دَعْوَةٌ فِي الدُّنْيَا وَلَا فِي الْآخِرَةِ وَأَنَّ مَرَدَّنَا إِلَى اللَّهِ وَأَنَّ الْمُسْرِفِينَ هُمْ أَصْحَابُ النَّارِ
बेशक तुम जिस चीज़ की तरफ़ मुझे बुलाते हो वह न तो दुनिया ही में पुकारे जाने के क़ाबिल है और न आख़िरत में और आख़िर में हम सबको ख़ुदा ही की तरफ लौट कर जाना है और इसमें तो शक ही नहीं कि हद से बढ़ जाने वाले जहन्नुमी हैं
44فَسَتَذْكُرُونَ مَا أَقُولُ لَكُمْ ۚ وَأُفَوِّضُ أَمْرِي إِلَى اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ
तो जो मैं तुमसे कहता हूँ अनक़रीब ही उसे याद करोगे और मैं तो अपना काम ख़ुदा ही को सौंपे देता हूँ कुछ शक नहीं की ख़ुदा बन्दों ( के हाल ) को ख़ूब देख रहा है
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अनुवाद — ग़ाफिर 42

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Tuesday, August 18, 2026

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