अश-शूरा · 12/53
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शूरा
لَهُ مَقَالِيدُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ۝١٢
Lahoo maqaaleedus samaawaati wal ardi yabsutur rizqa limany yashaaa`u wa yaqdir; innahoo bikulli shai`unw wa Huwas Samee`ul Baseer
📖 हिंदी अर्थ
सारे आसमान व ज़मीन की कुन्जियाँ उसके पास हैं जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ कर देता है (जिसके लिए) चाहता है तंग कर देता है बेशक वह हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ़ है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَقَالِيدُ: चाबियाँ, ख़ज़ानों की कुंजियाँ।
  • يَبْسُطُ: खोलता है, फैलाता है (रिज़्क़ बढ़ाता है)।
  • يَقْدِرُ: तंग करता है, सीमित करता है (रिज़्क़ घटाता है)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ही के पास आसमानों और ज़मीन के सारे ख़ज़ानों की चाबियाँ हैं। उसी के हाथ में रिज़्क़ का पूरा इख़्तियार है — वह जिसे चाहता है खुली रोज़ी देता है और जिसे चाहता है तंग रोज़ी देता है। यह उसकी हिक्मत और मशीयत (इच्छा) पर मुनहसिर है। वह जिसे चाहता है उसकी आज़माइश के लिए रिज़्क़ में कुशादगी (विस्तार) देता है — देखता है कि वह शुक्र करता है या नाशुक्री करता है — और जिसे चाहता है उसकी आज़माइश के लिए तंगी देता है — देखता है कि वह सब्र करता है या क़िस्मत पर बिगड़ता है। यह सब कुछ उसके इल्म के मुताबिक़ होता है, क्योंकि वह हर चीज़ का पूरा जानने वाला है। उसके इल्म से उसके बंदों के मसालिह (भलाई) की कोई चीज़ पोशीदा नहीं है। वह जो कुछ भी करता है अपनी हिक्मत के मुताबिक़ करता है, और उसका हर फ़ैसला अदल और रहमत पर मबनी है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि रिज़्क़ का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है। जब हमें यक़ीन हो जाए कि रोज़ी देने वाला, रोकने वाला और बढ़ाने वाला सिर्फ़ वही है, तो हमारा दिल उसी से जुड़ जाता है। हमें किसी इंसान के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहिए, बल्कि सीधे अल्लाह से माँगना चाहिए। यह आयत हमें सब्र और शुक्र का पाठ पढ़ाती है — कुशादगी में शुक्र करो और तंगी में सब्र करो। याद रखो, अल्लाह जो देता है उसमें हमारी भलाई होती है, चाहे हमें समझ न आए। यही ईमान की निशानी है कि हम उसके हर फ़ैसले पर राज़ी रहें। अल्लाह हमें शुक्रगुज़ार और सब्र करने वाले बंदे बनाए। आमीन।



📜 आयत 10-14 — सूरा अश-शूरा

10وَمَا اخْتَلَفْتُمْ فِيهِ مِن شَيْءٍ فَحُكْمُهُ إِلَى اللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبِّي عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
और तुम लोग जिस चीज़ में बाहम एख्तेलाफ़ात रखते हो उसका फैसला ख़ुदा ही के हवाले है वही ख़ुदा तो मेरा परवरदिगार है मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी की तरफ रूजू करता हूँ
11فَاطِرُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجًا وَمِنَ الْأَنْعَامِ أَزْوَاجًا ۖ يَذْرَؤُكُمْ فِيهِ ۚ لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ
सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (वही) है उसी ने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स के जोड़े बनाए और चारपायों के जोड़े भी (उसी ने बनाए) उस (तरफ) में तुमको फैलाता रहता है कोई चीज़ उसकी मिसल नहीं और वह हर चीज़ को सुनता देखता है
12لَهُ مَقَالِيدُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
सारे आसमान व ज़मीन की कुन्जियाँ उसके पास हैं जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ कर देता है (जिसके लिए) चाहता है तंग कर देता है बेशक वह हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ़ है
13۞ شَرَعَ لَكُم مِّنَ الدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِ نُوحًا وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰ ۖ أَنْ أَقِيمُوا الدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا فِيهِ ۚ كَبُرَ عَلَى الْمُشْرِكِينَ مَا تَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ ۚ اللَّهُ يَجْتَبِي إِلَيْهِ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي إِلَيْهِ مَن يُنِيبُ
उसने तुम्हारे लिए दीन का वही रास्ता मुक़र्रर किया जिस (पर चलने का) नूह को हुक्म दिया था और (ऐ रसूल) उसी की हमने तुम्हारे पास वही भेजी है और उसी का इब्राहीम और मूसा और ईसा को भी हुक्म दिया था (वह) ये (है कि) दीन को क़ायम रखना और उसमें तफ़रक़ा न डालना जिस दीन की तरफ तुम मुशरेकीन को बुलाते हो वह उन पर बहुत शाक़ ग़ुज़रता है ख़ुदा जिसको चाहता है अपनी बारगाह का बरगुज़ीदा कर लेता है और जो उसकी तरफ रूजू करे (अपनी तरफ़ (पहुँचने) का रास्ता दिखा देता है
14وَمَا تَفَرَّقُوا إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى لَّقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّ الَّذِينَ أُورِثُوا الْكِتَابَ مِن بَعْدِهِمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ
और ये लोग मुतफ़र्रिक़ हुए भी तो इल्म (हक़) आ चुकने के बाद और (वह भी) महज़ आपस की ज़िद से और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक वक्ते मुक़र्रर तक के लिए (क़यामत का) वायदा न हो चुका होता तो उनमें कबका फैसला हो चुका होता और जो लोग उनके बाद (ख़ुदा की) किताब के वारिस हुए वह उसकी तरफ से बहुत सख्त शुबहे में (पड़े हुए) हैं
अश-शूराकुरान सूची
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मक्कीअवतरण स्थान
12आयत

अनुवाद — अश-शूरा 12

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Sunday, October 4, 2026

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