अद-दुखान · 30/59
अनुवाद उच्चारण — अद-दुखान
وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنَ الْعَذَابِ الْمُهِينِ ۝٣٠
Wa laqad najjainaa Baneee Israaa`eela minal`azaabil muheen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने बनी इसराईल को ज़िल्लत के अज़ाब से फिरऔन (के पन्जे) से नजात दी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नज्जैना (नजात दी): हमने मुक्त किया, छुटकारा दिलाया।
  • अल-अज़ाब अल-मुहीन: अपमानित करने वाला, ज़लील करने वाला दंड।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में बनी इसराईल (इस्राएल की संतान) पर अपनी बड़ी मेहरबानी और एहसान का ज़िक्र फ़रमाया है। अल्लाह ने उन्हें उस अपमानजनक और ज़लील करने वाली यातना से नजात दी, जो फ़िरऔन और उसकी क़ौम उन्हें देती थी। वह यातना यह थी कि फ़िरऔन के लोग बनी इसराईल के नवजात लड़कों को बेरहमी से ज़बह कर देते थे, ताकि उनकी नस्ल खत्म हो जाए, और उनकी औरतों (लड़कियों) को ज़िंदा रखकर उन्हें अपनी ख़िदमत और गुलामी के लिए इस्तेमाल करते थे। इसके अलावा उन्हें सख्त मेहनत और कठिन कामों में लगाया जाता था, जिससे उनकी कमर टूट जाती थी और उनकी इज़्ज़त और आबरू तार-तार होती थी।

यह वही फ़िरऔन था जिसने अपने मुल्क में बनी इसराईल को सबसे निचले दर्जे पर रखा हुआ था। वह उन्हें हर तरह से अपमानित करता था, उनके बेटों को मारता था और उनकी औरतों को ज़िल्लत के साथ जीने पर मजबूर करता था। यह एक ऐसी यातना थी जिसमें जान का खतरा भी था और इज़्ज़त की रक्षा भी नहीं होती थी। लेकिन अल्लाह ने अपनी कुदरत से उन्हें इस कठिन परिस्थिति से निकाला और उन्हें फ़िरऔन के चंगुल से आज़ाद करवाया।

इस आयत में अल्लाह तआला हमें यह सिखाता है कि जब बंदा अल्लाह पर भरोसा करता है और सब्र करता है, तो अल्लाह उसे हर मुसीबत से निकालने का रास्ता निकालता है। बनी इसराईल सदियों तक फ़िरऔन के ज़ुल्म को सहते रहे, लेकिन अल्लाह ने उनकी फ़रियाद सुनी और उन्हें मुक्त करवाया। यह हमारे लिए एक सबक है कि अल्लाह की रहमत और मदद उसके नेक बंदों के साथ हमेशा होती है, चाहे हालात कितने भी खराब क्यों न हों।

यह भी याद रखने की बात है कि अल्लाह ने बनी इसराईल को सिर्फ इसलिए नजात दी क्योंकि उन्होंने अल्लाह के नबी मूसा (अलैहिस्सलाम) पर ईमान लाया और उनकी पैरवी की। यानी नजात का रास्ता अल्लाह के नबियों की इताअत (आज्ञा पालन) में है। आज भी अगर हम चाहते हैं कि अल्लाह हमें दुनिया और आख़िरत की मुसीबतों से नजात दे, तो हमें अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत पर चलना होगा और अल्लाह के हुक्मों को मानना होगा। यही कामयाबी और नजात का ज़रिया है।



📜 आयत 28-32 — अद-दुखान

28كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَاهَا قَوْمًا آخَرِينَ
और उन तमाम चीज़ों का दूसरे लोगों को मालिक बना दिया
29فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ السَّمَاءُ وَالْأَرْضُ وَمَا كَانُوا مُنظَرِينَ
तो उन लोगों पर आसमान व ज़मीन को भी रोना न आया और न उन्हें मोहलत ही दी गयी
30وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنَ الْعَذَابِ الْمُهِينِ
और हमने बनी इसराईल को ज़िल्लत के अज़ाब से फिरऔन (के पन्जे) से नजात दी
31مِن فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَالِيًا مِّنَ الْمُسْرِفِينَ
वह बेशक सरकश और हद से बाहर निकल गया था
32وَلَقَدِ اخْتَرْنَاهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى الْعَالَمِينَ
और हमने बनी इसराईल को समझ बूझ कर सारे जहॉन से बरगुज़ीदा किया था
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अनुवाद — अद-दुखान 30

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Tuesday, August 18, 2026

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